LATEST ARTICLES

Labour

Labour Codes : एक और धोखा देने को EPFO तैयार

*Prasoon S. Kandath, नई दिल्ली : वेतन के आधार पर पेंशन निर्धारित करने के केरल हाईकोर्ट के फैसले से बचने के लिए मिल रहे संकेतों के मुताबिक कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) Labour Codes को आधार बना कर नियमों में फेरबदल करने की फिराक में है. यह फेरबदल संसद से हाल ही में पारित Labour Codes (श्रमिक संहिता) में किए गए बदलाव को आधार बनाया जाने वाला है. इसी को ध्यान में रखकर हाल ही में EPFO ने अपने सभी जोनल और रीजनल अधिकारियों को मौखिक रूप से यह निर्देश दे रहा है कि Higher Pension के लिए प्राप्त आवेदनों पर कोई कदम न उठाए, चाहे वह किसी हाईकोर्ट के आदेश के साथ ही क्यों न दिया गया हो. यह चाल केवल अदालती आदेशों को निरस्त बनाने के लिए चली जा रही है. अब इसके लिए Labour codes में संशोधन को आधार बनाया जाएगा अथवा EPF Pension Scheme के नियमों में ही फेरबदल क्यों न करना पड़ेगा. ज्ञातव्य है कि केरल हाईकोर्ट ने साल 2018 में फैसला सुनाया था कि पेंशन वेतन के अनुसार ही दिए जाएं. इसके विरुद्ध EPFO ने अपील की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था. इसके बाद EPFO और केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (Review Petition) दायर किया है, जिसके फैसले का अभी इंतजार है. इस बीच जिन्होंने हाईकोर्टस के सम्बंधित अदालती फैसले के हवाले से higher pension प्राप्त करने में सफल भी रहे, उनके higher pension EPFO ने रुकवा दिए. और अब अपने अधीनस्थ कार्यालयों को यह निदेश दे रहा है कि ऐसे आवेदनों को वे लौटा दिया करें. साथ ही यह भी कहा गया है कि जब तक (Labour Codes के आधार पर) नियमों में सुधार न हो जाए, उनके फाइलों पर कोई पहल न की जाए, चाहे वे कोर्ट से अनुकूल आदेश ही क्यों न प्राप्त कर चुके हों. नए सदस्यों के अधिक रकम के योगदान पर अधिक पेंशन दिए जाने के प्रस्तावित प्रकरण पर ट्रस्ट बोर्ड ने भी अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है, बल्कि इसे टाला ही जा रहा है. इस सन्दर्भ में लोकसभा सदस्य एन.के. प्रेमचंद्रन का निम्नलिखित उद्धरण ध्यान देने योग्य है, उन्होंने बताया है- "यह संशोधन Labour Code में उल्लिखित EPF PENSION संबंधी बातों को आधार बना कर किए जाने की संभावना है. ऐसा संकेत श्रम मंत्री दे चुके हैं. मामला जब कोर्ट तक पहुंचेगा, तब प्रधान मंत्री कार्यालय (PMO) बचाव में हस्तक्षेप करने को तैयार रहेगा. इस मामले में न्यायपालिका के कार्यकलापों को अवरुद्ध करने की बहुत ही चातुर्यपूर्ण (tactical) क्रियाशीलता और षडयंत्र की गहरी साजिश महसूस की जा रही है." (यह समाचार रविवार, 27 सितम्बर 2020 को केरल के मलयाली दैनिक "कौमुदी" के इ-पेपर में प्रकाशित हुआ है.)
कपास

कपास की फसल को अधिक बारिश से महाराष्‍ट्र में नुकसान

*कमल शर्मा, जलगांव : महाराष्‍ट्र के जलगांव, धुले और नंदूरबार जिलों में हुई अधिक बारिश से कपास की फसल को नुकसान हुआ है. कॉटन बॉल में गलन होने से कपास की पहली तुड़ाई (पिकिंग) प्रभावित होगी. बता दें कि कॉटन के एक पौधे से चार बार कपास तोड़ी जा सकती है. लेकिन इस बारिश से कॉटन की पहली तुड़ाई में क्‍वॉलिटी प्रभावित होगी वहीं किसानों की आय पर भी असर पड़ेगा. किसानों का कहना है कि पिछले तीन सप्‍ताह में हुई बारिश से महाराष्‍ट्र के इन तीनों जिलों में कॉटन की फसल प्रभावित हुई है. भारी बारिश एवं कोरोना माहमारी की वजह से रेवेन्‍यू विभाग के अधिकारियों ने प्रभावित इलाकों का अभी तक दौरा नहीं किया है. ऐसे में फसल को नुकसान की रिपोर्ट के बगैर किसानों को मुआवजा कैसे मिलेगा. सोयाबीन की फसल भी इन जिलों में प्रभावित किसानों का कहना है कि इस बारिश से न केवल कॉटन बल्कि सोयाबीन की फसल भी इन जिलों में प्रभावित हुई है. खेतों में काफी पानी भरा होने से उनका आंकलन करना कठिन है. कपास की पहली तुड़ाई लगभग साफ हो गई है. कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मई अंत और जून की शुरुआत में बोई गई कपास सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुई है. यह उपज किसानों को बेहद कम भाव पर बेचने पर मजबूर होना पड़ेगा. बता दें कि केंद्र सरकार ने मीडियम स्‍टेपल कॉटन के लिए 5515 रुपए और लांग स्‍टेपल कपास के लिए 5825 रुपए प्रति क्विंटल न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (एमएसपी) घोषित किया है. क्‍वॉलिटी खराब होने से यह कॉटन 500-1000 रुपए प्रति क्विंटल नीचे बिक सकती है. महाराष्‍ट्र के इन तीनों जिलों में कॉटन की बोआई लगभग 8.5 लाख हैक्‍टेयर में हुई है.
दागी

दागी भी क्या, बनेंगे दलों के दलदल…? सुधरेगा चुनाव..? 

दागी प्रत्याशियों पर राजनीतिक दलों से सफाई मांगेगा चुनाव आयोग, कितना पड़ेगा फर्क..! *कल्याण कुमार सिन्हा, आलेख (बिहार विधानसभा चुनाव-2020 के सन्दर्भ में): दागी को उम्मीदवार - बिहार विधानसभा के आम चुनावों की घोषणा के साथ ही भारत के चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के सर पर एक और तलवार लटका दी है. दागियों के बाहुबल पर सीटें हथियाने की चल रही परम्परा पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार अब पार्टियों को मुश्किलें आने वाली हैं. उन्होंने यदि किसी दागी को उम्मीदवार बनाया तो क्यों बनाया, इसकी सफाई स्थानीय दैनिक अखबारों में तीन बार विज्ञापन के रूप में प्रकाशित करवानी होगी. साथ ही यह सफाई उन्हें अपनी पार्टी के वेबसाइट पर भी बताते रहनी पड़ेगी. न्यायालयों में पेंडिंग आपराधिक मामले में लिप्त बाहुबलियों को सभी राजनीतिक दल पहले तक बड़ी आसानी से अपना चुनावी खेवनहार बना लेते रहे हैं. उनसे नेताओं और पार्टी को पैसा तो मिलता ही था, यह आशा भी बनी रहती थी कि अपने बूते दागी पार्टी की एक अपनी सीट तो ले ही आएगा. अब तक राजनीतिक दल ऐसा जो भी करते थे, दागियों के "लोकतांत्रिक अधिकार के खाते में" चला जाता था. न कोइ ऐसा सवाल करने वाला था और न ही उन्हें कहीं ऐसी सफाई देने  जरूरत पड़ी थी. लेकिन अब ऐसा नहीं चल पाएगा. कोई फर्क नहीं पड़ने वाला... जानकारों का हालांकि मानना है कि चुनाव आयोग की इस शर्त से राजनीतिक दलों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. वे उन्हें क्षेत्र के रहनुमा, बड़े सामाजिक कार्यकर्ता और गरीबों के मसीहा का मुलम्मा चढ़ा कर पेश कर देंगे. दागियों के नामांकन भरने या चुनाव लड़ने पर तो कोई रोक लग नहीं सकता. ऐसे में जब केवल सफाई ही पेश करनी है तो पेश कर देंगे सफाई..! चुनाव सुधार की दिशा में एक और कदम..? इसे चुनाव सुधार की दिशा में एक और कदम बताया जा रहा है. यदि वाकई यह चुनाव सुधार की दिशा में उठाया गया एक और कदम है तो बिहार ही अब इसकी पहली प्रयोग स्थली बनेगी. देखना होगा कि ढह रहे सामाजिक और नैतिक मूल्यों के इस दौर में राजनीतिक दलों में कितनी नैतिकता कायम है. किस हद तक वे जनता के आगे अपने ऐसे दागी पेश करने से बचना चाहेंगे..! कहा जाता है, "एक जीवंत लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि देश में सुशासन के लिए सबसे अच्छे नागरिकों को जनप्रतिनिधियों के रूप में चुना जाए. इससे नैतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती है, जो सकारात्मक वोट पर चुनाव जीतते हैं." लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि ऐसी व्यवस्था लाई जाए, जो राजनीतिक दलों को चुनाव में अच्छे उम्मीदवार उतारने पर मजबूर करे. सुप्रीम कोर्ट ने दागियों के बारे में यह सुझाव दिया और हमारे चुनाव आयोग ने इसे चुनाव आचार संहिता में स्थान दिया. लेकिन इसके छिद्रों से ऐसे हाथियों को पार निकलने से रोकने वाले राजनीतिक दल भी नैतिकता का पालन करने वाले होने चाहिए, जो आज तो किसी दल में नजर नहीं आती. जाति, धर्म, क्षेत्र और वर्ग के आधार पर वोट बटोरने की परंपरा बरसों से चली आ रही है. चुनाव के...
CVC

CVC का बुलावा  : नीरी के दागी नहीं जाएंगे दिल्ली, कोरोना बना बहाना

करोड़ों के घोटाले में पूछताछ के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) ने किया था तलब नागपुर : राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी), नागपुर में करोड़ों के फर्जीवाड़े और घोटाले में 13 लोगों (लिप्त बताए जाने वाले अफसरों और उनमें गवाहों समेत) को केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) ने दिल्ली तलब किया था. नीरी से ऐसी गंभीर शिकायत मिलाने पर सीवीसी ने एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया है. इसी कमेटी के समक्ष सभी को उपस्थित होना था. पता चला कि इन सभी लोगों ने 'कोरोना महामारी के कारण दिल्ली जाना संभव नहीं होना', कारण बताया है. बताया गया कि अब CVC की जांच कमेटी ने सभी संबंधितों को इ-मेल से प्रश्न भेज दिए हैं. इनसे मेल के माध्यम से अपने जवाब 27 सितम्बर तक भेजने का निर्देश दिया गया है. ज्ञातव्य है कि नीरी के कई प्रोजेक्ट में रिसर्च और कंसल्टेंसी के नाम पर फर्जी कंपनियों को करोड़ों का भुगतान किया गया. इनमें से कुछ कंपनियों के डायरेक्टरों में नीरी में ही कार्यरत कुछ डेली वेजेज कर्मियों के भी नाम बताए जाते हैं. कुछ कंपनियों के नाम और पते भी फर्जी पाए गए हैं.     सूत्रों के अनुसार इन घोटालों के अलावा नीरी में पिछले दिनों हुई नियुक्तियों गड़बड़ी की शिकायत भी की गई थी. इसके अलावा संस्थान के माध्यम से कुछ लोगों को अनियमित ढंग से पी.एचडी दिए जाने के भी मामले की शिकायत की गई है. सतर्कता आयोग की जांच कमेटी ने घोटालों के साथ-साथ संबंधितों से इन गड़बड़ियों के बारे में भी सवाल किए हैं. जांच कमेटी को जांच से सम्बंधित अपनी रिपोर्ट आगामी 30 सितंबर तक CVC के महानिदेशक को सौंप देनी है. प्राप्त जानकारी के अनुसार इस प्राथमिक जांच के बाद सतर्कता आयोग (CVC) एक अन्य जांच कमेटी गठित कर सकती है, जो इन सभी से विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी पूछताछ शुरू कर सकती है. अथवा यह जांच समिति नीरी पहुंच कर सभी से प्रत्यक्ष रूप से भी पूछताछ कर सकती है. वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद से संबद्ध नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभि‍यांत्रिकी अनुसंधान संस्‍थान (CSIR-NEERI) भारत सरकार द्वारा बनाया और वित्त पोषित एक शोध संस्थान है.
प्याज निर्यात

प्याज निर्यात बंदी का विरोध : शेतकरी संघटना की ‘राख-रांगोली’

सांसद रामदास तड़स को जिम्मेदार माना, भेंट किया प्याज की "राख-रांगोली" *आश्विन शाह, वर्धा : महाराष्ट्र शेतकरी संघटना की वर्धा जिला शाखा ने यहां द्वारा सांसद रामदास तड़स के निवास के सामने प्याज निर्यात बंदी का कड़ा विरोध जताया. केंद्र सरकार के इस निर्णय के विरोध में सरकार के आदेश की होली जला कर प्याज की राख-रांगोली आंदोलन किया गया. किसानों का बड़ा आर्थिक नुकसान  बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा संसद में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पारित तीन कृषि विधेयकों के विरोध में विरोधी दल एकजुट हो रहे हैं. उनका आरोप है कि सरकार ने ये 3 विधेयक पर लोकसभा व राज्यसभा में विस्तृत चर्चा का विपक्ष को अवसर नही दिया. दूसरी ओर प्याज उत्पादक किसानों को मुश्किल से अभी उचित कीमत मिलना शुरू हुआ ही था कि सरकार ने प्याज की निर्यात पर बंदी लागू कर दी. इससे प्याज उत्पादक किसानों का बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है. सांसद भी किसानों के नुकसान में दोषी  किसानों का मानना है कि इसका किसी भी सांसद ने विरोध नहीं करके किसानों का नुकसान करने में बराबर की भागीदारी निभाई है, इसलिए वे भी दोषी हैं. शेतकरी संघटना उनके विरोध स्वरूप उनके घरों के समक्ष आंदोलन कर रही है. इसी सिलसिले में वर्धा जिले के किसानों ने भी सांसद रामदास तड़स के निवास पर प्रदर्शन किया, विरोधी नारे लगाए और उन्हें प्याज और प्याज की राख भेंट कर विरोध जताया. केंद्र सरकार ने पिछले 14 सितंबर को प्याज की सभी किस्मों के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी  है. सरकार ने यह फैसला देश में प्याज की उपलब्धता को बढ़ाने और घरेलू बाजार में इसकी लगातार बढ़ती कीमत को नियंत्रित करने के लिए लिया है. विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) की ओर से 14 सितंबर को जारी एक अधिसूचना में कहा गया, 'प्याज की सभी किस्मों के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाता है.' डीजीएफटी वाणिज्य मंत्रालय का अंग है, जो आयात-निर्यात संबंधी मामलों को देखता है. बता दें कि दक्षिण भारत के राज्यों में भारी बारिश के चलते इस बार प्याज की फसल को खासा नुकसान हुआ था. इसके चलते घरेलू बाजार में प्याज की कीमतें भी काफी बढ़ रही थीं. थोक मंडियों में आठ अगस्त के बाद से प्याज की कीमत बढ़ रही थी. पिछले साल भी लगाया था प्रतिबंध इससे पहले सरकार ने सितंबर 2019 में भी प्याज के निर्यात पर रोक लगाई थी. उस समय मांग और आपूर्ति में बहुत ज्यादा अंतर आ जाने की वजह से प्याज की कीमतें आसमान छूने लगी थीं. महाराष्ट्र जैसे प्रमुख प्याज उत्पादक राज्यों में बारिश और बाढ़ के चलते प्याज की फसल को भारी नुकसान पहुंचा था.
मराठा समाज

मराठा समाज, वर्धा ने की मराठा आरक्षण लागू करने की मांग

पुलगांव (वर्धा) : मराठा समाज की आरक्षण की मांग का  पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एवं अन्य दलों ने समर्थन किया था. इसके बाद राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने मराठा समाज के लिए 13% आरक्षण की घोषणा की थी. किंतु वर्तमान मे इस आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है मराठा समाज, वर्धा जिला की ओर से समाज को फिर आरक्षण देने एवं अपनी अन्य मांगों का एक ज्ञापन का निवेदन जिलाधिकारी के मार्फत राज्य शाशन को दिया गया. जिसमे प्रमुख मांगे- 1. सर्वोच्च न्यायालया ने SEBC मराठा आरक्षण का विषय संविधान पीठ को सुपूर्द कर रोक लगा दी है, उसे हटवाई जाए और घोषित आरक्षण पूर्ववत की जाए. 2.  मराठा समाज के व्यक्ति को परडी अत्याचार की घटना में सत्र न्यायालय ने आरोपी को दंड दिया है, जिस पर उच्च न्यायालय मे सुनवाई चल रही है, उच्च न्यायालय उस पर शीघ्र निर्णय दे 3. सारथी संस्था के माध्यम से मराठा विध्यार्थी को विविध व्यवसाय संबंधी प्रशिक्षण देकर जिला स्तर पर एक समिति गठीत करे, ताकी मराठा समाज के युवा को उसका लाभ मिले 4. अण्णा साहेब महामंडल पर स्थानीय समिति गठित कर लाभ देने की उपाय योजना लागू करें 5. मराठा आरक्षण के लिए आंदोलन करने वाले सभी लोगों पर दायर केस वापस ली जाए. इनके साथ ही अन्य मांगों का निवेदन दिया गया. निवेदन देते समय जिला अध्यक्ष दीपक कदम, मार्गदर्शक सुरेंद्र जगदाले, पूखराज मापारी, वर्धा शहर अध्यक्ष अरुण जगताप, जिला उपाध्यक्ष चंद्रकांत पवार, जिला प्रचार प्रमुख दिलीप चव्हाण, प्रा वामन पवार, राजेश चिखलठाने, भोसले, महिला अध्यक्ष रोहिणी बाबर, रंजना पवार, अधिवक्ता अभय शिंदे आदि अनेक मान्यवर उपस्थित थे   मराठा आरक्षण के लिए फिर एकजुट हुए सभी दल दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से तमाम बार ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से आरक्षण पर लगी रोक हटाई जा सके. सरकार की इस कोशिश को राज्य की महाअघाड़ी में शामिल दलों के साथ-साथ भाजपा ने भी अपना समर्थन दिया है. साल 2018 में महाराष्ट्र की विधानसभा ने मराठा समुदाय को आरक्षण देने का कानून पास किया था, जिसे राज्यपाल की भी मंजूरी मिली थी. सुप्रीम कोर्ट में उद्धव सरकार ने उतारी वकीलों की फौज बता दें कि महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में मराठा आरक्षण पर लगी रोक को हटवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी. मराठा आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए महाराष्ट्र सरकार ने कई सीनियर वकीलों को खड़ा किया है. इसमें वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी समेत केंद्र सरकार के साथ काम कर चुके तमाम अधिवक्ता शामिल हैं.  
जम्मू

जम्मू-कश्मीर राजभाषा विधेयक, 2020 राज्यसभा से भी पास

130 वर्षों का उर्दू का एकाधिकार समाप्त, पांच भाषाओं को राजभाषा का दर्जा   नई दिल्ली : राज्यसभा ने बुधवार को कश्मीरी और डोगरी सहित पांच भाषाओं को केंद्र शासित प्रदेश की आधिकारिक भाषाओं के रूप में घोषित करने के लिए जम्मू-कश्मीर राजभाषा विधेयक, 2020 पारित किया. इसे मंगलवार को लोकसभा ने पारित किया था. विधेयक में पांच भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में संघ राज्य क्षेत्र के आधिकारिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने का प्रावधान कर दिया गया है. इनमें कश्मीरी, डोगरी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर प्रदेश की राजभाषाएं होंगी. इससे पहले, जम्मू और कश्मीर में 130 वर्षों से उर्दू एकमात्र आधिकारिक भाषा रही है.   जम्मू और कश्मीर HC हिन्दी, अंग्रेजी   केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा और हाईकोर्ट में कार्य-व्यापार अब हिंदी और अंग्रेजी सहित अन्य सभी आधिकारिक भाषाओं में भी किया जाएगा. इसमें आगे स्पष्ट किया गया है कि उन प्रशासनिक और विधायी उद्देश्यों के लिए केंद्र शासित प्रदेश में अंग्रेजी का उपयोग जारी रखा जा सकता है, जिसके लिए अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले इसका उपयोग किया जा रहा था. उल्लेखनीय है कि जम्मू और कश्मीर पुर्नगठन अधिनियम, जम्मू-कश्मीर विधान सभा को आधिकारिक भाषाओं को अपनाने का निर्णय लेने का अधिकार देता है. इस आधार पर कुछ सांसदों ने विधेयक का विरोध किया. हालांकि, सरकार ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया, "भारत के आदेश एसओ संख्या 3937 (ई), 31 अक्टूबर, 2019 को भारत सरकार द्वारा जारी किया गया था, जो कि जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के विधानमंडल या विधानसभा के लिए किसी भी संदर्भ में, जहां तक संबंधित है. संसद के संदर्भ के रूप में, जब तक कि संदर्भ की आवश्यकता नहीं है, तब तक कार्यों और शक्तियों को माना जाता है." इसके अलावा, केंद्र शासित राज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में पंजाबी को भी रखने की कई मांगें थीं, क्योंकि यह स्थानीय लोगों के बीच व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा है.
NDCC

NDCC Bank घोटाला : मंत्री सुनील केदार की मुश्किलें बढ़ीं

छंटने को है 18 वर्षों की धूल, 149 करोड़ रुपए के घोटाले के गवाहों का क्रॉस एक्जामिनेशन अंतिम चरण में नागपुर : महाराष्ट्र के पशु संवर्द्धन एवं युवा कल्याण मंत्री एवं कांग्रेस नेता सुनील केदार की मुश्किलें दबाए नहीं दब रहीं. केदार नागपुर जिला मध्यवर्ती सहकारी (NDCC) बैंक में सन 2002 में हुए 149 करोड़ रुपए के घोटाले के वे मुख्य आरोपी हैं. बैंक के अध्यक्ष रहे 59 वर्षीय केदार पर आरोप है कि उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों की मदद से NDCC बैंक के कोष की 149 करोड़ रुपए की रकम का घोटाला कर बैंक को इतनी बड़ी रकम का नुकसान पहुंचाया. जो गरीब किसानों और निवेशकों का था. गवाहों का क्रॉस एक्जामिनेशन 24 को   मुंबई हाईकोर्ट के नागपुर बेंच के आदेश पर गुरुवार, 24 सितंबर को इस मामले के गवाहों का क्रॉस एक्जामिनेशन होगा. उल्लेखनीय है कि पिछले 18 वर्षों से लंबित इस मामले में अपने पूर्व के आदेशों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट नाराजगी जाहिर की. निचली अदालत में इसकी ट्रायल एक इंच भी आगे नहीं बढ़ रही थी. मामले की सुनवाई अब नागपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) की अदालत में हो रही है. अप्रैल 2002 को पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज हुई थी   वर्ष 2002 में सामने आए इस NDCC बैंक घोटाले की विशेष लेखा परीक्षक विश्वनाथ असवर ने बैंक का ऑडिट कर 29 अप्रैल 2002 को गणेशपेठ पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी. इसके बाद NDCC बैंक के पूर्व अध्यक्ष सुनील केदार, महाप्रबंधक अशोक चौधरी और अन्य के विरुद्ध भादंवि की दफा 406, 409, 468, 112-ब और 34 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था. इस मामले में आरोपियों से नुकसान की वसूली के आदेश जारी किए गए थे. न्यायिक दांव-पेंच, दवाब और राजनीति के कारण इस प्रकरण में वर्षों कोई प्रगति नहीं हो पा रही थी. हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सुप्रीम कोर्ट से सुनील केदार को राज्य सरकार के जांच के आदेश में मिले स्थगन के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पाया था. बाद में हाईकोर्ट के कड़े रुख के कारण अब गवाहों के क्रॉस एक्जामिनेशन तक यह मुकदमा पहुंच रहा है. समझा जाता है कि इसके साथ ही अब यह मामला अपने अंतिम चरण में है.
न्याय

लचर न्याय व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया कमर तोड़ रही आम लोगों की

देश के हाईकोर्ट्स में 51.5 लाख, निचली अदालतों में 3.5 करोड़ केसेस लंबित, सुप्रीम कोर्ट की आंकड़े का पता नहीं *कल्याण कुमार सिन्हा- आलेख : केंद्र सरकार के कानून और न्याय मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी देश की अदालतों में लंबित मामलों के आंकड़े हमारी लचर न्याय व्यवस्था की पोल खोलती है. इन आंकड़ों के अनुसार, देश भर के विभिन्न हाईकोर्ट्स में 51 लाख से अधिक मामले (51,52,921) लंबित हैं और लगभग 3.5 करोड़ मामले (3,44,73,068) देश की निचली अदालतों में लंबित हैं. अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में 7 लाख से अधिक 7 लाख से अधिक अनसुलझे मुकदमों के साथ, इलाहाबाद हाईकोर्ट में उच्च न्यायालयों की सूची में सबसे ऊपर है. उसके बाद पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में 6 लाख लंबित मामलें, मद्रास उच्च न्यायालय ने 5.7 लाख लंबित मामलें और राजस्थान उच्च न्यायालय ने 5 लाख लंबित मामलें लंबित हैं. यह डेटा 16 सितंबर, 2020 तक अपडेट किया गया है. निचली अदालतों में लंबित मामलों में उत्तर प्रदेश अव्वल जिला स्तर पर उत्तर प्रदेश में न्यायालयों में 81,86,410 मुकदमे लंबित हैं, इसके बाद महाराष्ट्र में 42,21,418 और बिहार में 30,94,186 मामले लंबित हैं. यूपी के बाद महाराष्ट्र में लंबित मामलों की संख्या लगभग दोगुनी है. हाल ही में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने भारत में मामलों की पेंडेंसी पर नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्राइंड (NJDG) से डेटा साझा किया था. उन्होंने बताया था कि 24 मई तक भारत में 32.45 मिलियन मामले लंबित थे, और 10% से अधिक मामले 10 साल से अधिक पुराने थे. 24 मई तक देश में 32.45 मिलियन मामले लंबित मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, लोकसभा में उठाए गए एक प्रश्न के लिखित जवाब में सिक्किम उच्च न्यायालय में लंबित मामलों की सबसे कम संख्या है, अर्थात 240. इसके बाद त्रिपुरा के उच्च न्यायालय और मेघालय के 2,127 नंबर हैं, क्रमशः 4,170 मामले. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कोर्ट्स में एक भी लंबित नहीं जिला स्तर पर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के केंद्र शासित प्रदेशों के न्यायालयों में एक भी मामला लंबित नहीं है. 681 मामले लद्दाख की अदालतों में और 1345 नागालैंड की आदलतों में लंबित हैं. अरुणाचल प्रदेश और केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप और पुडुचेरी के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. आंकड़े अब चौंकाते नहीं ये आंकड़े अब चौंकाते नहीं हैं. क्योंकि पिछले अनेक सालों से देश की जनता विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों को केवल बढ़ते हुए ही सुना और देखा गया है. आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कानून मंत्रालय ने हालांकि प्रति वर्ष के बढ़ते आकड़ों का कोई तुलनात्मक विवरण संभवतः बताने की जरूरत नहीं समझी है. सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के बुरे हाल इसके साथ ही मंत्रालय ने देश के सर्वोच्च अदालत के लंबित मामलों को भी पचा गया है. देश के उच्चतम न्यायालय का तो यह हाल है कि राजनीतिक विवादों, हाई प्रोफाइल मामले तो वहां आनन-फानन में निपटा दिए जाते हैं. लेकिन गरीबों और श्रमिकों से संबंधित मामलों में अपने फैसले के विरुद्ध पैसे वालों और सरकारी महकमों के रिव्यू पीटिशन पर पूर्व फैसले पर स्टे तो दे दिए जाते हैं, लेकिन रिव्यू पिटीशन को निपटाने में भी महीनों और वर्षों तक केवल तारीख पर तारीख ही दी जाती है. जजों की अपेक्षित संख्या...
केस

सुशांत केस : नहीं हो पाई AIIMS टीम संग CBI की बैठक, आखिर टली क्यों?

विसरा रिपोर्ट पर होनी थी बात, ड्रग्स मामले में दीपिका सहित और बड़े नाम भी शामिल नई दिल्ली : सुशांत सिंह राजपूत केस में आज का दिन काफी अहम होने वाला था. सुशांत का मर्डर हुआ था या उन्होंने खुदकुशी की थी, इस राज से पर्दा उठने वाला था. लेकिन लगता है ये सच जानने के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा. संभवतः इसलिए टली बैठक...  सुशांत की मौत मामले में आज होने वाली CBI की  AIIMS  की टीम के साथ बैठक टल गई है. ये अहम बैठक यहां दिल्ली में होनी थी. इसमें सुशांत की विसरा और ऑटोप्सी रिपोर्ट पर मंथन होना था. माना जा रहा था कि इसी बैठक में जांच के आधार पर सुशांत केस पर मेडिकल ओपिनियन तैयार होता. ये भी मालूम चलता कि एक्टर की मौत खुदकुशी थी या मर्डर. सूत्रों ने हालांकि इस पर कुछ कहने से इंकार किया, लेकिन समझा जा है कि इससे संबंधित कुछ अहम् सुराग की CBI पहले पुष्टि कर लेना चाहता है.  सुशांत सिंह राजपूत ने 14 जून को अपने बांद्रा स्थित फ्लैट में आत्महत्या की थी. सुशांत के सुसाइड की खबर ने बॉलीवुड में बड़ा तहलका मचा दिया था. एक्टर के परिवार का कहना है कि सुशांत ने खुदकुशी नहीं की है, उन्होंने सुशांत की मौत को मर्डर बताया है. परिवार ने इस केस में रिया चक्रवर्ती को मुख्य आरोपी बताया है. ड्रग्स एंगल के कारण NCB को जांच में आना पड़ा जांच के दौरान सुशांत केस में ड्रग्स का एंगल भी सामने आया. इसके कारण मामले में नारकोटिक कंट्रोल ब्यूरो (NCB) को भी जांच में शामिल होना पड़ा. अब ड्रग्स मामले की की जांच भी जारी है. आज ड्रग्स मामले पर फिर से सुशांत की टैलेंट मैनेजर जया शाह से पूछताछ होगी. वहीं जया की कंपनी की मैनेजर करिश्मा और श्रुति मोदी को भी NCB ने आज पूछताछ के लिए बुलाया है. तीनों को एकसाथ बैठाकर उनसे सवाल जवाब होंगे. दीपिका पादुकोण सहित बड़े नाम भी ड्रग्स मामले में शामिल अभी तक ड्रग्स केस में बॉलीवुड के बड़े नामों में नम्रता शिरोडकर, दीपिका पादुकोण, सारा अली खान, श्रद्धा कपूर, रकुल प्रीत सिंह, प्रोड्यूसर मधु मंटेना वर्मा का नाम सामने आ चुका है. इससे पूर्व सुशांत की गर्ल फ्रेंड रिया चक्रवर्ती और उसके भाई शौविक चक्रवर्ती को NCB गिरफ्तार कर चुकी है. मुंबई के कई ड्रग्स पेडलर्स भी गिरफ्त में आ चुके हैं. रिया से मिले सुरागों ने ही NCB को ड्रग्स पेडलर्स और बड़े बॉलीवुड सितारों तक पहुंचा दिया है. अब जल्द ही और बड़े सितारों की संलिप्तता  सामने आने का रास्ता खुलता चला जा रहा है. NCB बॉलीवुड तक ड्रग्स पहुंचाने वाली पूरी चेन को क्रैक करनी की कोशिशों में जुटी है. NCB की पड़ताल में जांच एजेंसी ने वो चैट खोज निकाली है जिसमें बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण का भी नाम सामने आया है. ड्रग्स एंगल में नाम सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर दीपिका बुरी तरह ट्रोल हो रही हैं. उधर कंगना रनौत ने भी दीपिका पर खुला हमला बोलना शुरू कर दिया है. ड्रग्स केस में दीपिका का नाम सामने आने के बाद अब उनकी एक पुरानी पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल...