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कोविड -19 : PRSI का देशव्यापी “विजयी भारत अभियान” आरंभ

मानव संसाधन विकास मंत्री पोखरियाल 'निशंक' ने किया शुभारम्भ   नई दिल्ली/नागपुर : PRSI के कोविड -19 कोरोना महामारी के सन्दर्भ में देशव्यापी अभियान का शुभारंभ हो चुका है. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री, डॉ रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने पिछले दिन वेबिनार के माध्यम से पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ इंडिया (PRSI) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कोरोना महामारी के सन्दर्भ में संस्था के "विजयी भारत अभियान" को फ्लैग ऑफ किया. उन्होंने पीआरएसआई के सभी चैप्टर को बधाई और शुभकामनाएं प्रेषित कीं तथा केन्द्रीय टीम व देश भर के चैप्टर के कार्यों की सराहना की.  केंद्रीय मंत्री ने विश्वास जताया कि कोविड -19 संकट से निपटने के साथ-साथ देश में एक नए युग का सुत्रपात होगा. कोरोना महामारी के लिए प्रधानमंत्री द्वारा चलाए गए "विजयी भारत अभियान" देश में उत्साह का संचार हुआ है. इससे देश में "आत्मनिर्भर भारत" और "मेक इन इंडिया" को इससे गति मिल रही है. इससे देश आने वाले दिनों में आर्थिक विकास के एक नए युग में प्रवेश करेगा और हर प्रकार के संकटों पर विजय प्राप्त करने में सफल रहेगा.  PRSI के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अजीत पाठक ने संस्था को मिली मंत्री जी की सराहना पर खुशी व्यक्त की. डॉ. पाठक ने कहाकि कोविड -19 महामारी के संकट से देश जूझ रहा है. ऐसी घड़ी में PRSI भी अपनी भूमिका पूरी लगन के साथ निभा रहा है. देश भर में कोरोना संकट से बचाव के लिए जनजागृति अभियान चलाने में संस्था महत्वपूर्ण योगदान दे रही है. उन्होंने केंद्रीय मंत्री पोखरियाल 'निःशंक' द्वारा इस कार्य में संस्था को मिल रहे समर्थन के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त किया.   PRSI ने विभिन्न चैप्टर के माध्यम से पूरे देश में कोविड -19 महामारी के दौरान जागरूकता फैलाने और जरूरतमंदों की सहायता के सराहनीय कार्य किए और पूरे देश में सकारात्मक माहौल बनाया. इसी क्रम में "विजयी भारत अभियान" शुरू किया गया है. इस बैठक में PRSI राष्ट्रीय कार्यकारिणी तथा सभी चैप्टर से नेशनल कॉउंसिल के सदस्य बड़ी संख्या में शामिल हुए.
ईपीएस-95

ईपीएस-95 सेवानिवृत्तों से भाजपा ने भी की धोखाधड़ी : दादा झोड़े

भगत सिंह कोशियारी समिति की शिफारसों को डस्टबीन दिखाया    नागपुर : ईपीएस-95 के अंतर्गत पेंशनरों के साथ ईपीएफओ जो खेल खेल रहा है, वह तो निंदनीय है ही. मौजूदा केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी सामान रूप से पेंशनरों के साथ धोखाधड़ी में सम्मिलित होने के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत नहीं होगा. ऑल इंडिया ईपीएस-95 कोऑर्डिनेशन कमेटी के लीगल एडवाइजर दादा तुकाराम झोड़े ने इसे केंद्र की भाजपा सरकार की वयोवृद्ध पेंशनरों के साथ बहुत गंभीर धोखाधड़ी बताया है.  2014 में भाजपा सांसद जावड़ेकर ने यह मुद्दा उठाया था कांग्रेस सरकार के समक्ष दादा झोड़े ने बताया कि 2014 में भाजपा सांसद (अब मोदी सरकार के दूसरे काल के भी मंत्री) प्रकाश जावड़ेकर ने एपीएस पेंशनरों को मिल रहे 200-300 रुपए पेंशन से द्रवित होकर तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के समक्ष यह मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया था. कांग्रेस सरकार ने उनकी मांग पर भाजपा के ही सांसद भगत सिंह कोशियारी (फिलहाल महाराष्ट्र के राज्यपाल) के नेतृत्व में एक समिति गठित कर दी थी.  कांग्रेस सरकार ने कोशियारी समिति गठित की थी कोशियारी समिति ने सभी पक्षों की सुनवाई कर न्यूनतम पेंशन 3,000 रुपए करने और साथ में इसे महंगाई निर्देशांक से भी जोड़ने की सिफारिश की. अधिकारियों ने कमेटी की सिफारिशों पर कटौती कर सरकार को न्यूनतम पेंशन 1000 रुपए करने का सुझाव दिया. जिसे तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने स्वीकार कर लिया. लेकिन लागू नहीं कर सकी. 2014 में ही चुनाव के बाद केंद्र में भाजपा की सरकार सत्ता में आई तो चुनाव के दौरान पेंशनरों से किए अपने वादे भूल कर पूर्व की कांग्रेस सरकार द्वारा मंजूर न्यूनतम 1000 रुपए का पेंशन लागू कर अपनी पीठ थपथपा ली. जावड़ेकर और कोशियारी भी चुप लगा कर पिछले 6 वर्षों से सत्तासुख भोग रहे हैं.  वादे से मुकरी भाजपा सरकार  दादा झोड़े ने कहा कि ईपीएस-95 पेंशनरों के साथ यह बहुत बड़ी नाइंसाफी है. कहां भाजपा सांसद ने 3000 रुपए न्यूनतम पेंशन की मांग की थी, दूसरे भाजपा सांसद के ही नेतृत्व में गठित समिति ने भी 3000 रुपए पेंशन और साथ में महंगाई भत्ता देने की सिफारिश की थी, और जब उन्हीं की भाजपा की मोदी सरकार सत्ता में आई तो उसने कांग्रेस सरकार के निर्णय का अनुसरण करते हुए मात्र 1000 रुपए न्यूनतम ही देकर पेंशन वयोवृद्ध पेंशनरों की लाचारी बढ़ा दी है. जबकि 2014 और 2019 के चुनावों के दौरान भी भाजपा नेताओं ने ईपीएस-95 के पेंशनरों के पेंशन कोशियारी कमेटी की सिफारशों के अनुरूप करने का आश्वासन दिया था.  अनसुना कर रही है पेंशनरों की गुहार झोड़े ने कहा कि आज 1000 रुपए पेंशन पाते हुए लाखों 80 वर्ष से अधिक आयु वाले पेंशनरों के 6 वर्ष से अधिक बीत गए हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और केरल हाईकोर्ट के आदेश और स्वयं केंद्र की मौजूदा सरकार अपने सांसद दिलीप कुमार मनसुख लाल गांधी (भाजपा) कमेटी की सिफारिशों को भी नजरंदाज करते हुए लाखों पेंशनरों की गुहार को अनसुना कर रही है. 
BCI

BCI : अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बौद्धिक क्षमता का निर्धारण नहीं करता

बार काउंसिल ऑफ इंडिया CLAT परीक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित करने के पक्ष में नई दिल्ली : भारतीय विधिज्ञ परिषद (बार काउंसिल ऑफ इंडिया- BCI) ने कहा कि "अंग्रेजी भाषा का ज्ञान या अभाव बुद्धि, क्षमता, कौशल, समर्पण, बुद्धि आदि का निर्धारण नहीं करता है. इसलिए, इस परीक्षा को क्षेत्रीय भाषाओं में भी आयोजित किया जाना चाहिए." दिल्ली हाईकोर्ट के याचिकाकर्ताओं प्रथम कौशिक, नवीन कौशिक और अरुण भारद्वाज को संबोधित एक पत्र में, BCI ने यह बात कही है. समिति का गठन किया क्षेत्रीय भाषाओं में कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT) आयोजित करने की मांग से सम्बंधित एक याचिका इन याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर किया है. BCI ने दिली हाईकोर्ट के निर्देश पर अंग्रेजी के अलावा, क्षेत्रीय भाषाओं में राष्ट्रीय विधि स्कूलों में प्रवेश के लिए CLAT आयोजित करने की व्यवहार्यता पर विचार करने के लिए  एक 7 सदस्य समिति का गठन किया है, जिसमें लॉ स्कूल के प्रतिनिधि और अन्य हितधारक (stakeholder) शामिल हैं. BCI ने बताया कि समिति में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के पूर्व और वर्तमान कुलपति, शिक्षाविद और बीसीआई के दो सदस्य शामिल होंगे. इस समिति की अध्यक्षता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश करेंगे. CLAT क्रैक करने में भाषा आड़े नहीं आएगी   काउंसिल ऑफ लीगल एजुकेशन एंड लीगल प्रोफेशन का नियामक होने के नाते, BCI ने आश्वस्त किया है कि प्रथम दृष्टया किसी भी योग्य उम्मीदवार को अंग्रेजी में प्रवीण होने की अक्षमता के कारण CLAT देने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए." उल्लेखनीय है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया अंग्रेजी सहित 11 भाषाओं में ऑल इंडिया बार परीक्षा आयोजित करता है. BCI के अनुसार  समिति यह भी देखेगी कि देश भर में लॉ यूनिवर्सिटीज में कितनी क्षेत्रीय भाषा सेमेस्टर की परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं. इसके अलावा CLAT क्लियर करने के बाद अगला अनुरोध हो सकता है कि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में भी क्षेत्रीय भाषाओं में सेमेस्टर परीक्षा आयोजित की जाए. वर्तमान में कई विश्वविद्यालय अंग्रेजी और राज्य की क्षेत्रीय भाषा में परीक्षा आयोजित की जाती हैं. निजी विश्वविद्यालयों, और इसलिए, इस मुद्दे को एक गहन और विचारशील विचार दिया जाना है."  हालांकि, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की तुलना अन्य राज्य संस्थाओं से नहीं की जा सकती है. फिर भी समिति इन पहलुओं पर भी सुझाव दे सकती है.
सरोज खान

सरोज खान का हमेशा ऋणी रहेगा भारतीय सिनेमा

भारतीय सिनेमा में जीवंत अभिव्यक्ति थीं शास्त्रीय नृत्य शैलियों की *जीवंत के.शरण- सरोज खान.... भारतीय सिनेमा की वह एक महान शख्सियत थीं, उन्होंने देश और दुनिया में भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों को 'सुगम शास्त्रीय नृत्य' के रूप में ख्याति दिलाने में बहुत ही बड़ा योगदान दिया. वे भारतीय सिनेमा में शास्त्रीय नृत्य शैलियों की जीवंत अभिव्यक्ति थीं. यह महान हस्ती भी साल 2020 की दुःखद घटनाओं का हिस्सा बन गईं. सिने जगत की महान हस्ती थीं वे... यह साल देश दुनिया के लिए सुखद कम उद्वेलित करने वाली खबरों का अंबार ले कर आया है. चहुंओर आफत बन कर टूट पड़ा है, कोरोना वायरस. भारत - चीन के बीच तनातनी तमाम कोशिशों के बावजूद अब युद्ध के कगार पर पहुंच चुका है. उधर बॉलीवुड पर तो मानो किसी का काला साया ही मंडरा रहा है. दिग्गज अभिनेता इरफान खान और ऋषि कपूर के साथ सुशांत सिंह राजपूत जैसी फ़िल्मी हतियों के इस दुनिया से असमय जाने के बाद गम का गहराया धुंध अभी छंटा भी नहीं था कि आज शुक्रवार (3 जुलाई 2020) को एक और हस्ती एवं श्रेष्ठ कोरियोग्राफर सरोज खान (71) के निधन की खबर आ गई. वे कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं. 20 जून को हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया. उनका स्वास्थ बेहतर हो रहा था. लेकिन देर रात उनकी तबियत बिगड़ गई और उन्हें बचाया नहीं जा सका। अंतिम समय उनका बेटा और दो बेटियां उनके पास थीं. कुशल नृत्यांगना सरोज खान अपने चेहरे से पूरी कथा परोसने वाली कुशल नृत्यांगना तो थी ही, लेकिन उससे भी ज्यादा उन्हें शोहरत और सम्मान मिला कोरियोग्राफर के रूप में. वह आंखों से बयां करने की कला सिखाने में कितनी पारंगत थीं, इसका ज्वलंत उदाहरण हैं माधुरी दीक्षित.1988 में आई फिल्म 'तेजाब' में गीत एक दो तीन .... 1992 की फिल्म 'बेटा' का गीत धक-धक करने लगा.... में माधुरी दीक्षित के नृत्य को कौन भूल सकता है? सरोज खान की बेहद आज्ञाकारी, परिश्रमी और चहेती रही हैं माधुरी दीक्षित, और यह संयोग ही है कि सरोज जी ने आखिरी बार फिल्म 'कलंक' के गीत तबाह हो गए .... पर माधुरी दीक्षित को ही कोरियोग्राफ किया था. 'कलंक' पिछले साल ही रिलीज हुई है. कच्ची उम्र में किया निकाह 1948 में एक हिंदू परिवार में जन्मी सरोज फिल्म 'नजराना' से बतौर बाल कलाकार अपने करियर की शुरुआत की. पचास के दशक में बैकग्राउंड डांसर के रूप में भी काम करने लगी. उनके डांस के मूव्स बेहद मनमोहक होते थे. उस समय उनके गुरू मास्टर सोहनलाल थे. 13 साल की कच्ची उम्र में सरोज इस्लाम कबूल कर स्वंय से तीस साल बड़े अपने गुरू को ही हमसफर बना लिया. हालांकि, उनका दाम्पत्य जीवन कभी सुखद नहीं रहा. बावजूद इसके वे आजीवन सोहनलाल की हमसफर बन कर ही रहीं. उन्हें बतौर कोरियोग्राफर फिल्म 'गीता मेरा नाम' में पहली बार अवसर मिला था. साथ में हिरोइन थी हेमामालिनी. फिर तो उनकी कोरियोग्राफी का सिक्का बहुत तेजी से चल पड़ा. सिने जगत की पहली महिला कोरियोग्राफर के रूप में उन्होंने चार दशक से ज़्यादा समय तक तकरीबन दो हजार से भी ज्यादा गाने की कोरियोग्राफी कर...
EPS -95

EPS -95 : धूल झोंक रहा है EPFO केंद्र की मोदी सरकार की आंखों...

कर रहा सेवानिवृत्तों के मानवाधिकार, मौलिक अधिकार और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का हनन नागपुर : इम्पलाइज पेंशन स्कीम-95 (EPS -95) में पिछले 1 सितम्बर 2014 को किया गया संशोधन पूर्णतः मानवाधिकार, मौलिक अधिकार और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का हनन है. यह संशोधन, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ EPFO) केंद्र की मोदी सरकार को अंधेरे में रखकर करवाने में सफल रहा है. यह निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र के सेवानिवृत कर्मियों के मानवाधिकार, मौलिक अधिकार और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का हनन है. इस तथ्य को मातोश्री जनसेवा सामाजिक बहुद्देशीय संस्था के अध्यक्ष दादाराव झोड़े ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेज कर उनके संज्ञान में लाने का प्रयास किया है. दादा झोड़े ने प्रधानमंत्री को बताया है कि इस महत्वपूर्ण तथ्य से EPFO और केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने आपके और भारत सरकार के ध्यान में इतनी बड़ी गड़बड़ी छुपा कर यह संशोधन कराने में सफल रहा है. इम्पलाइज पेंशन स्कीम-95 (EPS -95) में यह अनैतिक और अवैधानिक संशोधन पिछले 1 सितम्बर, 2014 से GSR No. 609 (E) / 22-08-2014 के अंतर्गत लागू हो गया है. जिसे हजारों कर्मचारियों और सेवानिवृत्तों को हाईकोर्ट में चुनौती देनी पड़ी. संशोधन से नुकसान EPS- 95 में किए गए इस संशोधन से मुख्य रूप से सेवानिवृत्तों के निम्नलिखित मानवाधिकार और वैधानिक अधिकारों का हनन हुआ है - 1. उच्चतम पेंशन के प्रावधान का विलोपन, 2. पेंशन के गणना में 12 महीनों की बजाय 60 महीनों के अंतिम वेतन का औसत कर दिया जाना, और   3. कर्मचारियों के अंशदान की वैधानिक कटौती से बढ़ कर 1.16 प्रतिशत अधिक राशि की वसूली. इनके अलावा भी इसमें संशोधन के जरिए कर्मचारियों को व्यापक रूप से वंचित करने की कोशिश हुई है. ये संशोधन अत्यंत वयोवृद्ध सेवानिवृत्तों को नुक्सान पहुंचाने वाले और कर्मचारियों के हितों का दमन करने वाले हैं. यह सरकार पहला ऐसा गैरकानूनी संशोधन है, जिसे केंद्र में 26-05-2014 को बनी भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार की आंखों में धूल झोंक पारित करवा कर 1-09-2014 से EPFO लागू करवाने में सफल हो गया. इसे बाद में सरकार द्वारा गठित संसदीय जांच कमेटी, केरल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी खारिज कर चुके हैं. केरल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया... केरल हाईकोर्ट ने 15,000 से अधिक लोगों द्वारा दायर 507 मुकदमों की एकसाथ सुनवाई के पश्चात 12 अक्टूबर 2018 को इस अवैधानिक और अनैतिक संशोधन को खारिज कर दिया. केरल हाईकोर्ट के इस फैसले को EPFO ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के पश्चात EPFO की अपील को खारिज कर दिया और केरल हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए इस संशोधन को अवैधानिक, मनमाना और असंवैधानिक करार देते हुए 1 अप्रैल 2019 को आदेश जारी किया. आश्वासनों से मुकर कर सुप्रीम कोर्ट में दायर कर दी रिव्यू पिटीशन और SLP   दादा झोड़े ने प्रधानमंत्री को बताया है कि भारत सरकार और केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने पहले तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करते हुए सभी पेंशनरों (सेवानिवृत्तों) की शिकायतों का निपटारा करने का आश्वासन दिया. लेकिन तुरंत बाद अपने वचनों से मुकरते हुए सुप्रीम...

सूचना के अधिकार पर ‘Digest of RTI Cases’ शीघ्र  

सूचना अधिकार फिल्ड के चैम्पियन नवीन अग्रवाल की नई कृति नागपुर : सूचना अधिकार विषय पर एक अनूठी पुस्तक "Digest of RTI Cases" शीघ्र रिलीज होने जा रही है. जिसमें RTI से सबंधित सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के लगभग सभी महत्वपूर्ण निर्णयों का समावेश किया गया है. पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई है. इस Digest के सह-रचनाकार हैं- नवीन महेश कुमार अग्रवाल. अग्रवाल दादा रामचंद बाखरू सिंधु महाविद्यालय, नागपुर के रजिस्ट्रार हैं. इस पुस्तक के उनके सहलेखक प्रोफेसर नीरज कुमार और प्रोफेसर (डॉ.) नवीन कुमार अग्रवाल भी सूचना के अधिकार क्षेत्र के बड़े जानकारों में से हैं. इस विषय पर इन दोनों लेखकों की और भी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. प्रोफेसर नीरज कुमार जहां लखनऊ विश्वविद्यालय के बिज़नेस एडमिनिस्ट्रशन विभाग के सेवानिवृत हेड रहे हैं, वही प्रोफेसर (डॉ.) नवीन कुमार अग्रवाल एल.एन. मिश्रा विश्वविद्यालय, दरभंगा (बिहार) के गणित विभार के हेड और विश्वविद्यालय के जनसम्पर्क अधिकारी भी हैं. विषय के गहन अध्येयता नवीन महेश कुमार अग्रवाल- सूचना अधिकार केंद्र, यशदा (महाराष्ट्र शासन की शीर्ष प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्था), पुणे के अतिथि व्याख्याता (सूचना अधिकार अधिनियम, 2005) रहे हैं. वे सचिवालय, प्रशिक्षण तथा प्रबंध संस्थान (आई.एस.टी.एम.), (कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार द्वारा प्रमाणित) के सूचना अधिकार प्रशिक्षक भी हैं. सूचना का अधिकार क्षेत्र में तीनों सहलेखकों की गहरी रुचि, गहन अध्ययन और विशाल अनुभूत जानकारियों का ही परिणाम है कि इस क्षेत्र से सम्बंधित यह सर्वसमावेशी पुस्तक "Digest of RTI Cases" सामने आ रही है.   RTI के अंतर्गत कैसी सूचनाएं मांगी जा सकती हैं, कौनसी सूचनाएं प्रदान की जा सकती है या किन सूचनाओं को देने से मना किया जा सकता है, इन बिंदुओं पर भी विस्तार से पुस्तक में समझाया गया है. नवीन अग्रवाल बताते हैं कि व्यक्तिगत सूचना, थर्ड पार्टी से सम्बंधित सूचना, व्यापक जनहित, अपील प्रक्रिया, दंड, आदि.. को समझने एवं उससे सम्बंधित निर्णय लेने में सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के निर्णयों का सन्दर्भ लेना आवश्यक हो जाता है. क्योंकि विभिन्न विधायी शब्द, अवधारणाएं और पेचीदगियों की व्याख्या उनके द्वारा ही की जाती है. इस पुस्तक में इन विषयों की सारगर्भित जानकारी दी गई है. लेखक अग्रवाल का कहना है कि पुस्तक लोक सूचना अधिकारी (Public Information Officer), प्रथम अपीलीय अधिकारी, अधिवक्ता, सूचना अधिकार प्रशिक्षक, केंद्र एवं राज्य सरकार के अधिकारी, लोक प्राधिकारी, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय एवं शालाओं के प्राचार्य, शिक्षक, प्रशासकीय कर्मचारी, विद्यार्थी एवं जो भी सूचना अधिकार का उपयोग करते हैं, ऐसे सभी नागरिकों के लिए निश्चित रूप से उपयोगी रहेगी.   429 पन्नों की यह पुस्तक हार्ड कॉपी एवं ई बुक दोनों विकल्पों में उपलब्ध हैं. निर्धारित शुल्क प्रदान कर धनश्री बुक एजेंसी, अमेज़ॉन, फ्लिपकार्ट एवं अन्य अनेकों माध्यम से हार्ड कॉपी में तथा यूनिस्टी, गूगल बुक, अमेज़ॉन किंड्ले आदि के माध्यम से ई-बुक के रूप में प्राप्त हो सकती है. *संपर्क- 9273301557 *ईमेल- smv.registrar@gmail.com
चीन

चीन विवाद पर पवार ने ही राहुल को दिखाया आईना

नेहरू शासन काल में चीन हथिया चुका था 45,000 वर्ग किलोमीटर भूमि   सातारा (महाराष्ट्र) : पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री शरद पवार ने चीन को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बड़बोलेपन के लिए उन्हें आईना दिखा दिया है. राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों का राजनीतिकरण नहीं करने की नसीहत देते हुए उन्होंने कहा कि यह कोई नहीं भूल सकता कि चीन ने 1962 के युद्ध के बाद भारत की 45,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा कर लिया था. पवार की यह टिप्पणी राहुल गांधी के उस आरोप पर थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन की आक्रामकता के चलते भारतीय क्षेत्र को सौंप दिया. उन्होंने यह भी कहा कि लद्दाख में गलवान घाटी की घटना को रक्षा मंत्री की नाकामी बताने में जल्दबाजी नहीं की जा सकती, क्योंकि गश्त के दौरान भारतीय सैनिक चौकन्ने थे. पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह पूरा प्रकरण संवेदनशील प्रकृति का है. गलवान घाटी में चीन ने उकसावे वाला रुख अपनाया. गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख में 15 जून को चीन के साथ हिंसक झड़प में भारत के 20 सैन्यकर्मी शहीद हो गए थे. पूर्व रक्षामंत्री ने कहा कि भारत संचार उद्देश्यों के लिए अपने क्षेत्र के भीतर गलवान घाटी में एक सड़क बना रहा था. पवार ने कहा, उन्होंने (चीनी सैनिकों ने) हमारी सड़क पर अतिक्रमण करने की कोशिश की और धक्कामुक्की की. यह किसी की नाकामी नहीं है. अगर गश्त करने के दौरान कोई (आपके क्षेत्र में) आता है तो वे किसी भी समय आ सकते हैं. हम यह नहीं कह सकते कि यह दिल्ली में बैठे रक्षामंत्री की नाकामी है. उन्होंने कहा, वहां गश्त चल रही थी. झड़प हुई, इसका मतलब है कि आप चौकन्ना थे. अगर आप वहां नहीं होते तो आपको पता भी नहीं चलता कि कब वे (चीनी सैनिक) आए और गए. इसलिए मुझे नहीं लगता कि इस समय ऐसा आरोप लगाना सही है. राहुल गांधी द्वारा लगाए एक आरोप पर जवाब देते हुए पवार ने कहा कि यह कोई नहीं भूल सकता कि दोनों देशों के बीच 1962 के युद्ध के बाद चीन ने भारत की करीब 45,000 वर्ग किलोमीटर की जमीन पर कब्जा कर लिया था. उन्होंने कहा, यह जमीन अब भी चीन के पास है. मुझे नहीं मालूम कि क्या उन्होंने (चीन) अब फिर से कुछ क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लिया. लेकिन जब मैं आरोप लगाता हूं तो मुझे यह भी देखना चाहिए कि जब मैं सत्ता में था तो क्या हुआ था. अगर इतनी बड़ी जमीन अधिगृहीत की जाती है तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है और मुझे लगता है कि इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए. इतिहास गवाह है... इतिहास गवाह है कि 1959 में जैसे ही पता चला कि चीन ने भारत के इलाक़े में घुसपैठ कर ली है प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से लेकर स्वतंत्र पार्टी, लोहिया के समाजवादियों और जनसंघ सभी ने मिलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर ऐसे हमले किए जो उन पर पहले कभी नहीं हुए थे.यहां तक कि कांग्रेस भी नेहरू की चीन नीति से नाखुश थी. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नाथ पाई ने लोकसभा में प्रधानमंत्री...
नेपोटिज्म

सुशांत : नेपोटिज्म का विकल्प आत्महत्या तो नहीं हो सकता..!

आखिरी फिल्म 'दिल बेचारा' रिलीज होगा 24 जुलाई को #जीवंत के.शरण- नेपोटिज्म, इसे सरल करें तो भाई-भतीजावाद अधिसंख्य न सिर्फ समझते हैं, बल्कि अवसर मिलने पर करते भी हैं और वो भी डंके की चोट पर. हताशा के बाद आत्महत्या शायद आसान विकल्प होता है...! और अक्सर ऐसी खबरें आती ही हैं, लेकिन जब कोई नामचीन आत्महत्या कर लेता है, बात दूर तलक जाती है. मायानगरी में कम समय में बतौर हीरो पहचान बनाने वाले सुशांत सिंह राजपूत युवा, प्रतिभावान, हंसमुख और सरल स्वभाव अर्थात सर्वगुण सम्पन्न कलाकार थे. उन्होंने सब कुछ अपने बलबूते हासिल किया. हरफन में स्वंय को पारंगत करने की उनकी ललक का नतीजा था कि छोटे पर्दे पर (पवित्र रिश्ता) शोहरत हासिल करने के बाद बिना किसी पैरवी के बड़े पर्दे पर भी उन्होंने अपने लिए एक मुक्कमल जगह बना लिया. सुशांत की मुस्कान, मासूमियत और दरियादिल के सभी कायल थे. बावजूद इसके अल्पायु  (34) में ही प्लान करके हमेशा के लिए 'शांत' होने का निर्णय लेना कितना कठिन होगा, अब इस पर लोग चर्चा करते रहें, अपनी भड़ास निकालते रहें, सुशांत के पिता भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद अब आत्महत्या को स्वीकार चुके हैं. कुछ अंतराल के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा. कोरोना वायरस का कहर भी कम हो जाएगा. छोटे-बड़े पर्दे की गतिविधियां पहले की तरह निर्बाध शुरू हो जाएंगी. हां, कायनात शायद यूं ही चलता है. नेपोटिज्म : बहस हो, लेकिन सार्थक सुशांत के जाने के बाद नेपोटिज्म पर जबरदस्त कोहराम मचा हुआ है. इस पर बहस होनी भी चाहिए. करण जौहर, सलमान खान, महेश भट्ट और आदित्य चोपड़ा जैसे दबंग कलाकार/फिल्मकार पर खूब प्रहार हो रहे हैं. इन सभी पर भाई-भतीजावाद का आरोप है. इन पर शुशांत को दरकिनार करने और नीचा दिखाने का भी आरोप लग रहा है. इस पर बहस तो हो, लेकिन बहस सापेक्ष और सार्थक होनी चाहिए. षडयंत्रकारियों को सजा मिलनी ही चाहिए... नेपोटिज्म तो हर क्षेत्र में है. जो बड़े पद और पहुंच वाला व्यक्ति है, जाहिर है पहले वो अपनों को ही आगे बढ़ाने का प्रयास करेगा. जहां तक बाॅलीवुड का सवाल है तो यहां बड़े बैनर के तहत आरंभ से ही पहले अपने बच्चों को रंगीनियत दी जाती रही है. हां, अपवाद स्वरूप  इंडस्ट्री के बाहर के भी कलाकारों को अवसर मिला है. एक पिता का अपने बच्चों को आगे बढ़ाने के बारे में सोचना कैसे गलत हो सकता है? हां, यह गलत तब होगा, जब इस मोह-माया में पड़ कर बाहर से आई प्रतिभा का शोषण और उसके खिलाफ षडयंत्र रचा जाने लगता है. और सुशांत के मामले में कुछ षडयंत्र तो हुआ ही है. पुलिस तहकीकात कर रही है. यदि वास्तव में ऐसा हुआ है, तो षडयंत्रकारियों को इसकी सजा मिलनी ही चाहिए. लेकिन एक बात और, विचारणीय है- किसी प्रतिभा के शोषण और उसके खिलाफ षडयंत्र या नेपोटिज्म का विकल्प क्या आत्महत्या हो सकता है..? बॉलीवुड में नेपोटिज्म के कोई पहले शिकार नहीं थे सुशांत. नेपोटिज्म के वाबजूद इतने कम समय में उन्होंने तो बॉलीवुड में अपनी प्रतिभा के बल पर वह मुकाम हासिल कर लिया था, जो विरले को ही नसीब हुआ है. कम समय में ही सुशांत के...
सोनिया

सोनिया, राहुल ने चीन से राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए 90 लाख रु. लिए

नई दिल्ली : अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और उनके पुत्र कांग्रेस नेता राहुल गांधी व् पुत्री प्रियंका गांधी वाड्रा पर आरोपों का सिलसिला थम नहीं रहा. या यूं कहें भारत-चीन के बीच लद्दाख में चल रहे सीमा विवाद को लेकर सरकार के विरुद्ध और चीन समर्थक उनके रवैये ने सत्तारूढ़ भाजपा को गड़े मुर्दे उखाड़ने पर मजबूर कर दिया है. एक के बाद दूसरा गंभीर और सनसनी फैलाने वाला मामले आरोपों के रूप में सामने आने लगा है. अब ताजा आरोप यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए चीन से 90 लाख रुपए दान स्वरूप प्राप्त किए हैं. यह ताजा आरोप केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और साथ ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने लगाया है. मध्यप्रदेश में वर्चुअल रैली को संबोधित करने के दौरान कांग्रेस पर उन्होंने जोरदार हमला करते हुए चीन के बहाने कांग्रेस पर जबरदस्त वार किया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि राजीव गांधी फाउंडेशन ने चाइना एंबेसी से डोनेशन के नाम पर मोटी रकम ली है. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कुछ दस्तावेजों को दिखाकर ये दावा किया कि साल 2005-2006 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की फंडिंग का पैसा मिला था. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कुछ दस्तावेजों को दिखाकर ये दावा किया कि साल 2005-2006 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की फंडिंग मिली थी. #IndiaChinaFaceOff #Congress https://t.co/CPpbeeQsuU— ABP News (@ABPNews) June 25, 2020 जे.पी. नड्डा ने टीवी रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि राजीव गांधी फाउंडेशन को 2005-2006 में चीनी दूतावास ने मोटी रकम दिया है. यह है चीन और कांग्रेस का गुपचुप रिश्ता. उन्होंने कहा कि यह परिवार विपक्ष नहीं हो सकता है. 3 हजार यूएस डॉलर लेने वाले मुखर नहीं हो सकते हैं. ये अपने स्वार्थ के जाल में स्वयं उलझे हुए हैं. नड्डा ने कहा कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन ने जो फंडिंग की है, इस पर देश जवाब चाहता है.   I am amazed that the Rajiv Gandhi Foundation received 3 hundred thousand USD from the People's Republic of China & the Chinese Embassy in 2005-06. This is the secret relation of Congress & China: BJP president JP Nadda during Madhya Pradesh Jan Samvad Rally via video conferencing pic.twitter.com/ArA513D0Xr— ANI (@ANI) June 25, 2020 नड्डा ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि ये वहीं लोग हैं, जो चीन से फंड लेकर देश में माहौल बनाते हैं. सभी राजनैतिक दल के लोगों ने पीएम से कहा कि वह सभी देशहित में एक साथ खड़े हैं. एक परिवार ने विरोध किया. इनके खाने के दांत कुछ, और दिखाने के लिए कुछ और हैं. ये चाइना से फंड लेते हैं और उसके बाद वो स्टडी कराते हैं, जो देश के हित में नहीं, और ये उसके लिए वातावरण तैयार करते हैं: श्री @JPNadda #ChineseGandhis #BJPJanSamvad— BJP (@BJP4India) June 25, 2020 साथ ही डोकलाम के वक्त की घटना को नड्डा ने याद दिलाते हुए राहुल गांधी को निशाने पर लिया है. जेपी नड्डा ने कहा कि गलवान घाट की...
रद्द

रद्द होंगी CBSE की 10 और 12 की परीक्षाएं

अब Exams रद्द करने की राह पर CISCE भी   नई दिल्ली : सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) ने COVID-19 महामारी के मद्देनजर 1 से 15 जुलाई तक होने वाली कक्षा 10 और 12 की परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला किया है. सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी गुरुवार को सॉलिसिटर जनरल (एस.जी.) तुषार मेहता ने दी. जस्टिस ए.एम. खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ को एस.जी. मेहता ने बताया कि CBSE परीक्षाएं तब आयोजित करेगा, जब स्थिति अनुकूल होगी. एस.जी. ने कहा कि एक योजना बनाई गई है, जहां कक्षा 12 के छात्र का अंतिम 3 परीक्षाओं के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा. बाद में आयोजित होने वाली परीक्षा के लिए छात्र के पास विकल्प चुनने की सुविधा होगी. CISCE की परीक्षा भी रद्द की जाएगी   CISCE के लिए पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा कि CBSE के सूट के बाद CISCE की परीक्षा भी रद्द कर दी जाएगी. पीठ ने CBSE को आंतरिक मूल्यांकन और परीक्षा के बीच विकल्प के मुद्दों को निर्दिष्ट करने और परिणामों की तिथि को स्पष्ट करने के लिए एक ताजा नोटिफिकेशन के निर्देश देने के बाद सुनवाई कल तक के लिए स्थगित कर दी. उल्लेखनीय है कि गत 23 जून को इस मुद्दे पर हुई पिछली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और CBSE की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल मेहता के अनुरोध पर टाली दी थी. मेहता ने जस्टिस ए.एम. खानविलकर की पीठ को बताया था कि "ये चर्चा एक अंतिम स्तर पर है. जल्द ही निर्णय को अंतिम रूप दिया जाएगा." उन्होंने कहा कि वो छात्रों की चिंता को समझते हैं. इसलिए अदालत फैसले के लिए एक दिन का ओर समय दें. अभिभावकों की ओर से दायर की गई याचिका  बता दें कि अभिभावकों ने आगामी एक जुलाई से बोर्ड (बारहवीं) की शेष परीक्षा आयोजित करने के CBSE के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है और अदालत से यह निर्देश देने का अनुरोध किया था कि COVID-19 महामारी को देखते हुए छात्रों को आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर अंक दिए जाएं. उन्होंने आशंका प्रकट की थी कि उनके बच्चों सहित अन्य छात्रों को देश भर के 15,000 केंद्रों पर आयोजित की जाने वाली परीक्षा में शामिल होने के लिए अपने घरों से बाहर आने पर महामारी का सामना करना पड़ेगा. अतः अभिभावकों ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था. वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर याचिका में कहा गया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय और आईआईटी सहित कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों ने किसी भी परीक्षा का आयोजन नहीं करने का फैसला किया है और CBSE को भी निर्देश दिया गया कि वह शेष विषयों के लिए परीक्षा का आयोजन न करे. उन्होंने कहा है कि छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्य बोर्डों ने छात्रों को घातक वायरस के संपर्क में आने से बचाने के लिए कोई भी परीक्षा आयोजित नहीं करने का फैसला किया है. याचिका में मांग की गई थी कि CBSE बोर्ड को 10 वीं और 12 वीं की परीक्षा रद्द करनी चाहिए और आंतरिक मूल्यांकन या आंतरिक...