दागी भी क्या, बनेंगे दलों के दलदल…? सुधरेगा चुनाव..? 

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दागी

दागी प्रत्याशियों पर राजनीतिक दलों से सफाई मांगेगा चुनाव आयोग, कितना पड़ेगा फर्क..!

*कल्याण कुमार सिन्हा,
आलेख (बिहार विधानसभा चुनाव-2020 के सन्दर्भ में):
दागी को उम्मीदवार – बिहार विधानसभा के आम चुनावों की घोषणा के साथ ही भारत के चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के सर पर एक और तलवार लटका दी है. दागियों के बाहुबल पर सीटें हथियाने की चल रही परम्परा पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार अब पार्टियों को मुश्किलें आने वाली हैं. उन्होंने यदि किसी दागी को उम्मीदवार बनाया तो क्यों बनाया, इसकी सफाई स्थानीय दैनिक अखबारों में तीन बार विज्ञापन के रूप में प्रकाशित करवानी होगी. साथ ही यह सफाई उन्हें अपनी पार्टी के वेबसाइट पर भी बताते रहनी पड़ेगी.
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न्यायालयों में पेंडिंग आपराधिक मामले में लिप्त बाहुबलियों को सभी राजनीतिक दल पहले तक बड़ी आसानी से अपना चुनावी खेवनहार बना लेते रहे हैं. उनसे नेताओं और पार्टी को पैसा तो मिलता ही था, यह आशा भी बनी रहती थी कि अपने बूते दागी पार्टी की एक अपनी सीट तो ले ही आएगा. अब तक राजनीतिक दल ऐसा जो भी करते थे, दागियों के “लोकतांत्रिक अधिकार के खाते में” चला जाता था. न कोइ ऐसा सवाल करने वाला था और न ही उन्हें कहीं ऐसी सफाई देने  जरूरत पड़ी थी. लेकिन अब ऐसा नहीं चल पाएगा.

कोई फर्क नहीं पड़ने वाला…
जानकारों का हालांकि मानना है कि चुनाव आयोग की इस शर्त से राजनीतिक दलों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. वे उन्हें क्षेत्र के रहनुमा, बड़े सामाजिक कार्यकर्ता और गरीबों के मसीहा का मुलम्मा चढ़ा कर पेश कर देंगे. दागियों के नामांकन भरने या चुनाव लड़ने पर तो कोई रोक लग नहीं सकता. ऐसे में जब केवल सफाई ही पेश करनी है तो पेश कर देंगे सफाई..!

चुनाव सुधार की दिशा में एक और कदम..?
इसे चुनाव सुधार की दिशा में एक और कदम बताया जा रहा है. यदि वाकई यह चुनाव सुधार की दिशा में उठाया गया एक और कदम है तो बिहार ही अब इसकी पहली प्रयोग स्थली बनेगी. देखना होगा कि ढह रहे सामाजिक और नैतिक मूल्यों के इस दौर में राजनीतिक दलों में कितनी नैतिकता कायम है. किस हद तक वे जनता के आगे अपने ऐसे दागी पेश करने से बचना चाहेंगे..!
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कहा जाता है, “एक जीवंत लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि देश में सुशासन के लिए सबसे अच्छे नागरिकों को जनप्रतिनिधियों के रूप में चुना जाए. इससे नैतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती है, जो सकारात्मक वोट पर चुनाव जीतते हैं.” लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि ऐसी व्यवस्था लाई जाए, जो राजनीतिक दलों को चुनाव में अच्छे उम्मीदवार उतारने पर मजबूर करे. सुप्रीम कोर्ट ने दागियों के बारे में यह सुझाव दिया और हमारे चुनाव आयोग ने इसे चुनाव आचार संहिता में स्थान दिया. लेकिन इसके छिद्रों से ऐसे हाथियों को पार निकलने से रोकने वाले राजनीतिक दल भी नैतिकता का पालन करने वाले होने चाहिए, जो आज तो किसी दल में नजर नहीं आती.

जाति, धर्म, क्षेत्र और वर्ग के आधार पर वोट बटोरने की परंपरा बरसों से चली आ रही है. चुनाव के वक्त दल-बदल, चुनाव में दागियों और महाबलियों की दबंगई और आपराधिक छवि वाले नेताओं की हुंकार, चुनाव को खेल बना देने वाली छोटी पार्टियों की भरमार और सिर्फ सनक के लिए चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की भीड़, यह सब हमारी चुनाव प्रणाली की परम्परा बनी हुई है.

बाहुबल की बड़ी भूमिका…
हिंसा, धमकी और बूथ कैप्चरिंग में बाहुबल की बड़ी भूमिका होती है. यह समस्या सभी और फ़ैली हुई है. दागी, अपराधी रसूख और जनता में पैठ बनाने के लिए राजनीति में प्रवेश करते हैं और पुरजोर कोशिश करते हैं कि उनके खिलाफ मामलों को समाप्त कर दिया जाए या उन पर कार्रवाई कभी हो ही नहीं. इसमें उनके मददगार हमारे राजनीतिक दलही बनाते हैं जो धन और रसूख के लिए इन्हें चुनाव मैदान में उतारते हैं और बदले में इन्हें राजनीतिक संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करते हैं.  

जाति आधारित राजनीति
ऐसे कई राजनीतिक दल हैं, जो विशेष जाति या समूह से आते हैं. ये जाति, समूह पार्टियों पर भी दबाव डालते हैं कि उन्हें क्षेत्रीय स्वायत्तता और जाति की संख्या के मुताबिक टिकट दिए जाएं. जाति आधारित राजनीति भी हमारे देश की बुनियाद और एकता पर प्रहार कर रही है और आज जाति चुनाव जीतने में एक प्रमुख कारक बन गई है. इस कारण उम्मीदवारों का चयन उम्मीदवार की उपलब्धियों, क्षमता और योग्यता के आधार पर नहीं होता, होता है- जाति, पंथ और समुदाय के आधार पर.

ऐसे तमाम कारण हैं, जिन्होंने गुजरते वक्त के साथ जनतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत नहीं होने दिया है. नि:स्वार्थ सेवा, मूल्यों और आत्मबलिदान को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया है. इसका नतीजा भी सामने है. “दागियों को क्यों प्रत्याशी बनाया, इसकी सफाई देने की बाध्यता,” चुनाव आयोग की यह नई पहल अब कितनी कारगर होगी, इसका जवाब देश को बिहार की आगामी विधान सभा चुनावों से ही मिल पाएगा.

 

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