चीन विवाद पर पवार ने ही राहुल को दिखाया आईना

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नेहरू शासन काल में चीन हथिया चुका था 45,000 वर्ग किलोमीटर भूमि

 
सातारा (महाराष्ट्र) : पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री शरद पवार ने चीन को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बड़बोलेपन के लिए उन्हें आईना दिखा दिया है. राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों का राजनीतिकरण नहीं करने की नसीहत देते हुए उन्होंने कहा कि यह कोई नहीं भूल सकता कि चीन ने 1962 के युद्ध के बाद भारत की 45,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा कर लिया था.

पवार की यह टिप्पणी राहुल गांधी के उस आरोप पर थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन की आक्रामकता के चलते भारतीय क्षेत्र को सौंप दिया. उन्होंने यह भी कहा कि लद्दाख में गलवान घाटी की घटना को रक्षा मंत्री की नाकामी बताने में जल्दबाजी नहीं की जा सकती, क्योंकि गश्त के दौरान भारतीय सैनिक चौकन्ने थे.

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह पूरा प्रकरण संवेदनशील प्रकृति का है. गलवान घाटी में चीन ने उकसावे वाला रुख अपनाया. गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख में 15 जून को चीन के साथ हिंसक झड़प में भारत के 20 सैन्यकर्मी शहीद हो गए थे. पूर्व रक्षामंत्री ने कहा कि भारत संचार उद्देश्यों के लिए अपने क्षेत्र के भीतर गलवान घाटी में एक सड़क बना रहा था.

पवार ने कहा, उन्होंने (चीनी सैनिकों ने) हमारी सड़क पर अतिक्रमण करने की कोशिश की और धक्कामुक्की की. यह किसी की नाकामी नहीं है. अगर गश्त करने के दौरान कोई (आपके क्षेत्र में) आता है तो वे किसी भी समय आ सकते हैं. हम यह नहीं कह सकते कि यह दिल्ली में बैठे रक्षामंत्री की नाकामी है.

उन्होंने कहा, वहां गश्त चल रही थी. झड़प हुई, इसका मतलब है कि आप चौकन्ना थे. अगर आप वहां नहीं होते तो आपको पता भी नहीं चलता कि कब वे (चीनी सैनिक) आए और गए. इसलिए मुझे नहीं लगता कि इस समय ऐसा आरोप लगाना सही है. राहुल गांधी द्वारा लगाए एक आरोप पर जवाब देते हुए पवार ने कहा कि यह कोई नहीं भूल सकता कि दोनों देशों के बीच 1962 के युद्ध के बाद चीन ने भारत की करीब 45,000 वर्ग किलोमीटर की जमीन पर कब्जा कर लिया था.

उन्होंने कहा, यह जमीन अब भी चीन के पास है. मुझे नहीं मालूम कि क्या उन्होंने (चीन) अब फिर से कुछ क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लिया. लेकिन जब मैं आरोप लगाता हूं तो मुझे यह भी देखना चाहिए कि जब मैं सत्ता में था तो क्या हुआ था. अगर इतनी बड़ी जमीन अधिगृहीत की जाती है तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है और मुझे लगता है कि इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए.

इतिहास गवाह है…
इतिहास गवाह है कि 1959 में जैसे ही पता चला कि चीन ने भारत के इलाक़े में घुसपैठ कर ली है प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से लेकर स्वतंत्र पार्टी, लोहिया के समाजवादियों और जनसंघ सभी ने मिलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर ऐसे हमले किए जो उन पर पहले कभी नहीं हुए थे.यहां तक कि कांग्रेस भी नेहरू की चीन नीति से नाखुश थी.

प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नाथ पाई ने लोकसभा में प्रधानमंत्री नेहरू से सवाल पूछा, “अगर हमारी ज़मीन पर चीन द्वारा ठिकाना बना लेने से युद्ध शुरू नहीं हो सका तो हम ये चिंता क्यों करें कि हमारे द्वारा उन ठिकानों को नष्ट किए जाने के बाद युद्ध शुरू हो सकता है?” जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय 24 सिंतबर, 1962 तक ये मांग कर रहे थे कि सरकार चीन को एक अल्टीमेटम दे.

नेहरू की चीन नीति उनकी अपनी पार्टी कांग्रेस को ही रास नहीं आ रही थी. एक बार जब नेहरू ने अक्साई चीन के चीन के नियंत्रण में चले जाने का यह कहकर बचाव किया कि वहां तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता है तो कांग्रेस के ही वरिष्ठ सदस्य महावीर त्यागी ने अपनी टोपी उतार कर अपने गंजे सिर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि यहां भी कुछ नहीं उगता. क्या इसे भी किसी को दे दिया जाना चाहिए?..

 

 

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