‘एचएमटी’ चावल के जनक दादाजी खोब्रागड़े का निधन, गृहग्राम नांदेड़ में आज अंतिम संस्कार

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अपनी डेढ़ एकड़ खेत में ही घोर गरीबी के बावजूद चावल की 9 किस्मों का किया था ईजाद

नागपुर : एचएमटी चावल के जनक ‘कृषिभूषण’ दादाजी रामाजी खोब्रागड़े का गढ़चिरोली के सर्च अस्पताल में रविवार, 3 जून की शाम 7.30 बजे निधन हो गया. 80 वर्षीय खोब्रागड़े लम्बे समय से पक्षाघात से पीड़ित थे. आज उनका पार्थिव गढ़चिरोली से नागभीड़ तहसील स्थित उनके गृहग्राम नांदेड़ ले जाया गया.

अंतिम दर्शन के लिए नांदेड़ पहुंचे भारी संख्या में लोग
उनके पुत्र मित्रजीत खोब्रागड़े ने फोन पर ‘विदर्भ आपला’ संवाददाता को बताया कि गांव में आज उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. नांदेड़ से लिये जानकारी के अनुसार दादाजी के निधन की खबर मिलते ही आस-पास के गांवों और विभिन्न जिलों से भारी संख्या में लोग एवं शासकीय अधिकारी उनके अंतिम दर्शन के लिए नांदेड़ पहुंच रहे हैं.

चावल की 9 किस्मों का ईजाद किया
उनके द्वारा ईजाद किए गए चावल की 9 किस्मों में एचएमटी, नांदेड़ चेन्नूर, डीआरके (दादाजी रामाजी खोब्रागड़े), विजय नांदेड़, नांदेड़-92, जय श्रीराम, दीपकरत्न नांदेड़, नांदेड़ हिरा नं.1 और काटे एचएमटी शामिल हैं. इनमें किसानों के लिए सबसे आधी लाभकारी किस्म को उनका नाम “डीआरके” दिया गया है. ‘नॉन बासमती’ किस्म में उनके द्वारा विकसित ‘जय श्रीराम’ उत्तम श्रेणी का चावल माना जाता है.

संघर्ष, उपलब्धियां और कीर्ति
अल्पभूधारक किसान दादाजी खोब्रागड़े ने अपनी डेढ़ एकड़ जमीन पर ही धान की अधिक उपज देने वाली 9 किस्मों की खोज कर डाली थी. पूरे देश में एचएमटी के नाम से अपनी पहचान बना चुकी चावल को विकसित करने में सफल खोब्रागड़े जी ने एक के बाद एक चावल की कुल नौ किस्मों का ईजाद कर डाला. उनकी इन्हीं उपलब्धियों के कारण देश, विदेश में अनेक 12 पुसकारों के साथ अपने राज्य महाराष्ट्र में ‘कृषिभूषण’ का शासकीय पुरस्कार मिला और सरकार की ओर से 10 एकड़ जमीन के साथ 1 लाख रुपए का पुरस्कार भी मिला. अहमदाबामें 2005 को उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों सम्मानित किया गया और 50 हजार रुपए, स्मृति चिह्न और प्रशस्तिपत्र दिए गए. बाद में महाराष्ट्र शासन ने उनका 25 हजार रुपए नकद और 50 ग्राम सोने का पदक भी प्रदान किया. इन सब साथ 2010 में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘फोर्ब्ज’ के पन्नों पर भी अपना स्थान बना लिया. ‘फोर्ब्ज’ की सूची में आने वाले दादा पहले किसान थे.

पाठ्यपुस्तक में दादाजी
बालभारती के कक्षा 6ठवीं की मराठी पाठ्यपुस्तक में दादाजी खोब्रागड़े की ऐसी बड़ी उपलब्धियों को कुछ वर्ष पूर्व ही शामिल किया गया है. इसमें खोब्रागड़े के संघर्ष पूर्ण इस खोज की जानकारी दी गई है. अपने खेत में एचएमटी प्रजाति के धान विकसित करने के बाद दादाजी को अन्य किसानों तक इस किस्म को लोकप्रिय बनाने में काफी संघर्ष करना पड़ा था. चावल की यह किस्म जब स्थानीय बाजारों के व्यापारियों और ग्राहकों में पसंद किया जाने लगा तब पंजाबराव कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विभाग का ध्यान इस ओर गया. लेकिन इसे विकसित करने का श्रेय उन्हें न देकर कृषि विश्वविद्यालय ने उसे अपना नाम ‘पीकीवी-एचएमटी’ दे डाला. इसके बाद उन्हें विश्वविद्यालय संघर्ष करना पड़ा. बाद विजयी हुए और उन्हें एचएमटी चावल के इजाद का श्रेय प्राप्त हुआ.

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