निर्यात करने बजाय तुअर के आयात में जुटी सरकार

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5,450 रुपए में किसानों से खरीदी किया गया है नया तुअर, रखने की जगह नहीं हैं

– भारी स्टॉक निपटाने के लिए 35 रुपए में बेच रही तुअर
– किसानों को हतोत्साह कर रही सरकार
– देश में दलहनों की हो रही दुर्गति

प्रताप ए. मोटवानी
नागपुर :
इस साल दलहनों की जिस तरह की दुर्गति हुई है, वैसी पिछले 8 वर्षों में नहीं हुई. दो वर्ष पूर्व 200 रुपए किलो बिकने वाली तुअर दाल की हालत ऐसी हो गई है कि सरकार ने 55 रुपए की दर पर बिकने वाली दाल 35 रुपए किलो राशन दुकानों में बेचने का निर्णय लिया है.

सरकार द्वारा 20 रुपए किलो घटाने का प्रमुख कारण यह है कि खुले बाजारों में तुअर दाल होलसेल मार्केट में 50 से 60 रुपए होने पर भी सरकारी दाल नहीं बिक रही थी. दूसरा कारण सरकार द्वारा गत वर्ष 5,050 एमएसपी में खरीदी तुअर भारी मात्रा में जमा है. इस वर्ष नया माल 5,450 में किसानों से खरीदी किया गया है. स्टॉक करने के लिए गोदामों का अभाव और पुराने माल की बिक्री करने से जगह रिक्त होने के साथ भारी स्टॉक से मुक्ति पाना भी था.

35 रुपए किलो दाल राशन में बिक्री से आम जनता को राहत तो मिलेगी. लेकिन दूसरी तरफ यह चिंता का विषय है कि इससे खुले बाजारों में दाल की बिक्री में असर होंगा, भाव घटेंगे, जिससे किसानों और व्यापारियों पर बुरा असर होगा. 5450 एमएसपी की तुअर, अभी से खुले बाजारों में 4,000-4,200 की हो गई है. आयायित तुअर 3800 का मुम्बई में रेट है. सरकार ने 3 लाख टन आयात की अनुमति दी है. सभी परिस्थितियां किसानों और व्यापारियों के दृष्टिकोण से चिंतनीय है.

महाराष्ट्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से बेची गई दाल की कीमत घटाकर 35 रुपए प्रति किलो कर दी है, इसके पहले यह 55 रुपए प्रति किलो थी. इससे जनता को लाभ तो मिलेगा. पर किसान का इसमें नुकसान होगा. स्थिति ऐसी है सरकार के सामने भाव घटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

इस साल सरकार ने किसानों को उनकी फसल के दाम सही मिले एमएसपी तक भाव आए, लेकिन सभी प्रयास विफल ही गए.तुअर के साथ सभी दालों मैं बुरी तरह हालात बदतर है. चना 3,500 बिक रहा है. मूंग, उरद, मसूर सभी दालों के भाव अल्पस्तर पर है.

किसानों ने गत 2 वर्षों से एमएसपी की दर देख रिकॉर्ड दलहनों की पैदावार की. 170 लाख टन से दो वर्षों से दलहन 220-230 लाख टन उत्पादन हो रहा है. मांग और पूर्ति समांतर हो गई है. आयात की स्तिथि समाप्त हो गई है. दालें निर्यात करने की स्थिति में आ गई हैं. दलहनों की दुर्गति देख किसान शायद ही अगली बार दलहन उत्पादन में दिलचस्पी ले. सरकार ने उपरोक्त समस्या को गंभीरता नहीं लिया तो आने वाले वर्षों में स्थिति फिर भयावह हो जाएगी.

-प्रताप ए. मोटवानी, सचिव
The Wholesale Grain and Seeds Merchant Association
नागपुर

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