त्रिपुरा के बहाने महाराष्ट्र को जलाने की कोशिश

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त्रिपुरा
अमरावती में हिंसक वारदातों के बाद कर्फ्यू

कल्याण कुमार सिन्हा-
विश्लेषण : आश्चर्य की बात है कि त्रिपुरा की घटनाओं की प्रतिक्रिया देश के अन्य राज्यों में नहीं, केवल महाराष्ट्र के तीन शहरों में साम्प्रदायिक प्रदर्शनों और दंगों के रूप में हुई. इसे राज्य में सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोई सोची-समझी साजिश ही कही जाएगी. महाराष्ट्र के अमरावती, नांदेड़ व मालेगांव में शांति व्यवस्था को बिगाड़ने के प्रयास के रूप में ही देखा जाएगा. शुक्र है कि कोई प्राण हानि नहीं हुई एवं ऐसे प्रदर्शन और दंगे राज्य के दूसरे शहरों में फ़ैलाने नहीं दिया गया. लेकिन जिन लोगों या संस्थाओं ने भी ऐसे प्रदर्शनों का आयोजन किया और दंगों के हालात पैदा किए, उनकी पहचान निष्पक्ष रूप से अब करने की जरूरत है.

उत्तर-पूर्व के राज्य त्रिपुरा में पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह निश्चित रूप से निंदनीय है. वहां कुछ उग्रवादी संगठनों ने बांग्लादेश में हुए सांप्रदायिक दंगों की प्रतिक्रिया में एक विशेष समुदाय के लोगों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन किया और उनके पूजा स्थलों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की. साथ ही मुस्लिम समुदाय के लोगों के वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों व उनके घरों पर हमला तक किया. संतोष की बात है कि समय रहते वहां भी इस उपद्रव पर काबू पा लिया गया.

लेकिन समाज विरोधी तत्वों ने इस दुर्भाग्यपूर्ण वारदातों के बारे में सोशल मीडिया पर बहुत ही निंदनीय अफवाह फैलाई. मस्जिद को ध्वस्त करने की झूठी बात भी फैलाई गई. और इधर महाराष्ट्र में तैयार बैठे ऐसे ही तत्वों ने अपनी घृणित सोच को अंजाम दे दिया. केंद्रीय गृह मंत्रालय शनिवार को स्पष्ट कर दिया कि त्रिपुरा के गोमती जिले में एक मस्जिद के क्षतिग्रस्त होने और तोड़फोड़ के बारे में सोशल मीडिया में प्रसारित समाचार फर्जी है और तथ्यों की पूरी तरह से गलत बयानी है.

त्रिपुरा
अमरावती में कर्फ्यू

इन वारदातों के बाद अमरावती शहर में चार दिनों का कर्फ्यू लागू करना पड़ा, इसके साथ ही अमरावती जिले के चार तहसील कस्बों मोर्शी, वरुड, अचलपुर, अंजनगांव सुरजी में प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रदर्शन आयोजित करने के बाद ऐहतियात के तौर पर इन कस्बों में भी कर्फ्यू लागू कर दिया गया. इसके साथ ही पूरे राज्य में निषेधाज्ञा लागू करने के अलावा तमाम तरह के सार्वजनिक आयोजनों पर भी रोक लगा दी गई है. इंटरनेट सेवाओं पर तो पहले से ही प्रतिबंध कायम है.

सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के ऐसे घृणित कृत्यों पर भी राजनीति इस देश का दुर्भाग्य रहा है. त्रिपुरा की घटना के विरोध में महाराष्ट्र में सामने आने वाले संगठन ‘रजा एकेडमी’ का नाम सामने आ रहा है. इसी संगठन ने पूरे राज्य में शुक्रवार, 12 नवंबर को बंद का ऐलान किया था. बंद के दौरान संगठन से जुड़े लोगों ने नादेड़ में खुराफात की शुरूआत कर दी. ऐसा ही अमरावती और मालेगांव में भी किया गया.

रजा एकेडमी को ही राज्य के इन तीन शहरों में दंगों जैसे हालत पैदा करने का दोषी माना जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिन्दू परिषद ने जहां इस संगठन पर बैन लगाने की मांग कर रही है और सरकार के मंत्री नवाब मालिक को निशाना बना रही है, वहीं शिवसेना रजा एकेडमी के बचाव में खड़ी नजर आ रही है. हालांकि राज्य के गृह मंत्री दिलीप वलसे पाटिल ने कहा है कि मामले की जांच की जाएगी. हम उन रैलियों की जांच करेंगे, जो महाराष्ट्र में त्रिपुरा में हुई घटनाओं को लेकर निकाली गई थीं. उन्होंने इन वारदातों के पीछे रजा एकेडमी की संभावित भूमिका की भी जांच कराने बात की है.

इधर, हिंसा को लेकर महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नवाब मलिक ने शिया समुदाय की ओर निशाना साधा है. उनका कहना है कि महाराष्ट्र में त्रिपुरा की घटना और शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी की पुस्तक को लेकर प्रोटेस्ट के दौरान महाराष्ट्र में तीन जगहों पर तोड़फोड़ और पथराव हुआ था.

वहीं, शिवसेना सांसद संजय राऊत का मानना है कि हालांकि रजा एकेडमी का इतिहास भले ही कुख्यात रहा है. लेकिन उसकी इतनी औकात नहीं है कि वह महाराष्ट्र में इस तरह से अलग-अलग शहरों में दंगे भड़काए. राऊत का यह भी मानना है कि ऐसे दंगे के लिए महाराष्ट्र को जानबूझ कर चुना गया. इसके लिए भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाते हुए उनका कहना था कि महाराष्ट्र को अस्थिर करने और देश में तनाव पैदा करने की साजिश रची जा रही है. पिछले दिनों हुए 13 राज्यों में चुनावों के नतीजे भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में नहीं गए हैं. इसलिए माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है.’

भाजपा नेता राम कदम का आरोप है कि महाराष्ट्र की भूमि पर षड्यंत्र के तहत और साजिश के तहत जो सांप्रदायिक दंगे हुए उसके पीछे पूरी तरह से महाराष्ट्र की सरकार है और वे गिरफ्तारी कर रहे हैं भारतीय जनता पार्टी नेता की.

इन आरोपों-प्रत्यारोपों से यह तो साफ है कि राजनीतिक दल ऐसे मौकों पर भी अपनी पार्टी की साख मजबूत करने के लिए बयानबाजी कर स्थिति को बदरंग करने से बाज नहीं आते. जबकि ऐसी घटना की प्रतिक्रिया का हवाला देकर मजहब को राजनीति का शिकार बनाया जाता रहा तो यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, किसी को पता नहीं. इसलिए बहुत जरूरी है कि महाराष्ट्र की साथ त्रिपुरा की घटनाओं की जांच न्यायिक दायरे में होनी चाहिए.

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद ने अपने मुल्क में हुए सांप्रदायिक दंगों में हिंदू नागरिकों पर हुए अत्याचार का बहुत सख्ती से संज्ञान लिया है उन्होंने संदिग्ध दोषियों को जेलों में ठूंस कर उनके ऊपर मुकदमे भी दायर कर दिए. साथ ही आम जनता को आश्वस्त किया कि हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा करने वालों को किसी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा और कानून से उन्हें यथायोग्य सजा दिलाई जाएगी. महाराष्ट्र और त्रिपुरा में भी ऐसी ही निष्पक्षता की जरूरत है. पुलिस ने अमरावती में भाजपा के बंद के बाद हुए बवाल में अब तक कुल 15 FIR दर्ज की है और अभी तक कुल 54 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इसमें भाजपा के नेता और कार्यकर्ता भी शामिल हैं.

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