उत्तराधिकार में, गोद लेने से पहले जन्में बच्चों को भी हक

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उत्तराधिकार
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश द्वय न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता इनसेट में.

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले सही ठहराया, अपील खारिज

केस का नाम- कालिंदी दामोदर गर्दे (डी) बनाम मनोहर लक्ष्मण कुलकर्णी
केस नंबर-सिविल अपील नंबर 6642-6643 /2010
कोरम- जस्टिस एल. नागेश्वर राव और हेमंत गुप्ता

नई दिल्ली : गोद और उत्तराधिकार से सबंधित विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा है कि गोद लिए गए किसी व्यक्ति के ऐसे बच्चे जो उसके गोद लेने से पहले जन्मे हैं, उन्हें गोद लेने वाले परिवार से अपने पिता को मिली संपत्ति में अधिकार मिलेगा.

गोद और उत्तराधिकार संबंधी इस अपील के तथ्य दिलचस्प हैं. लक्ष्मण और उनकी पत्नी पद्मावती के पहले से ही तीन बेटे थे, जब उन्हें वर्ष 1935 में एक सरस्वती नामक महिला को गोद दिया गया था. गोद लिए जाने के बाद लक्ष्मण और पद्मावती के घर एक बेटी का जन्म हुआ. लक्ष्मण की मृत्यु के बाद विभाजन का एक मुकदमा उनके तीन बेटों में से एक बेटे ने दायर किया था. जब कि लक्ष्मण को गोद लिए के बाद पैदा हुई उसकी और पत्नी पद्मावती की बेटी कालिंदी का तर्क यह था कि गोद लेने से पहले पैदा हुए बेटों का लक्ष्मण द्वारा पीछे छोड़ी गई दत्तक पारिवार की संपत्ति में कोई अधिकार, हिस्सा या उससे कोई संबंध नहीं है. गोद लेने के बाद लक्ष्मण के घर पैदा हुई बेटी होने के नाते पूरी संपत्ति पर अपनी मां पद्मावती के साथ उसका हक है, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने अस्वीकार कर दिया था.

लक्ष्मण और उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद दायर मुकदमे में बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या लक्ष्मण के तीन बेटे जो 1935 में लक्ष्मण के गोद लिए जाने के पहले पैदा हुए थे, अर्थात, गंगाधर, दत्तात्रय और मनोहर को उनके पिता लक्ष्मण की मौत के बाद गोद लेने वाले परिवार में संपत्ति में अधिकार मिलेगा या नहीं. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 पर भरोसा करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि गोद लेने से पहले पैदा हुए बेटे को अपने पिता की संपत्ति में हक पाने का अधिकार है.

अपील में सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गए विवाद के लिए “कलगावदा तवानप्पा पाटिल बनाम सोमप्पा तमांगवाडा पाटिल” मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर भरोसा जताया. साथ ही दलील दी गई कि एक गोद लिए गए व्यक्ति की पत्नी अपने पति के साथ गोद लिए हुए परिवार में मर गई है, लेकिन गोद लेने से पहले पैदा हुए बेटे नहीं. वे उस परिवार में सदस्य बने रहते हैं, जिसमें उनके पिता प्राकृतिक रूप से पैदा हुए थे.

जस्टिस एल.नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने देखा कि “मार्तंड जीवाजी पाटिल व अन्य बनाम वी.नारायण कृष्ण गुमास्त-पाटिल” मामले में हाईकोर्ट की फुलबेंच ने कहा था कि दत्तक व्यक्ति अपने पुत्र का पिता बना रहेगा. पीठ ने कहा था कि कलगावदा तवानप्पा पाटिल मामले में दिए गए निर्णय को हिंदू कानून के तहत स्वीकार नहीं किया गया है. यह भी कहा गया कि 10 जनवरी, 1987 को लक्ष्मण की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का मामला खोला गया है, इसलिए उत्तराधिकार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होना चाहिए और न कि हिंदू कानून के अनुसार.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि अधिनियम शुरू होने से पहले हिंदू कानून के सभी पाठ, नियम या व्याख्या का तब तक कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जब तक कि अधिनियम में इसके लिए स्पष्ट रूप से कहा नहीं जाता है. यह भी कहा गया कि गोद लिए गए पिता के प्राकृतिक जन्मे बेटे के उत्तराधिकार के अधिकारों को अस्वीकार करने का कोई प्रावधान नहीं है.

अपील को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अधिनियम के प्रावधानों पर ध्यान दिया और कहा कि- “अधिनियम के प्रावधान के अनुसार, एक पिता के गोद लेने के बाद पैदा हुए बेटे या उसके गोद लेने से पहले पैदा हुए बेटे के बीच कोई अंतर नहीं होता है और ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो प्राकृतिक पैदा हुए बेटे को अपने प्राकृतिक पिता की संपत्ति को प्राप्त करने से रोकता हो.” इसलिए, हाईकोर्ट ने लक्ष्मण के पुत्रों के अधिकारों को सही ठहराया है.

मार्तंड जीवाजी पाटिल मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फैसले में, यह माना गया है कि “प्राकृतिक पिता अपने गोद लेने से पहले पैदा हुए बेटे को गोद देने के अधिकार को बरकरार रखता है. इसलिए, अगर उसे अपने बेटे को गोद देने का अधिकार है, तो ऐसे बेटे के पास एक सगोत्र होने के कारण संपत्ति का उत्तराधिकारी होने का अधिकार है. गोद लेने से पहले पैदा हुए तीन बेटों और गोद लेने के बाद पैदा हुई बेटी के बीच पूर्ण रक्त संबंध था.”

लक्ष्मण के सभी बच्चे अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अपने प्राकृतिक पिता और माता की संपत्ति को प्राप्त करने के हकदार हैं, क्योंकि 1987 में लक्ष्मण की मृत्यु के बाद और वर्ष 1992 में मां की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का मामला खोला गया था.

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