मोहम्मद रफ़ी : जब याद आए, बहुत याद आए…

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मोहम्मद रफ़ी

जीवंत के. शरण-
पुण्य तिथि :
वह आज का ही दिन (31 जुलाई, 1980) था, जब महान सिने गायक शहंशाह-ए-तरन्नुम मोहम्मद रफ़ी का निधन हुआ था. मुंबई में उनकी अंतिम यात्रा में लगभग दस हजार लोग शामिल हुए थे. वो भी तब, जब कि उस दिन झमाझम बारिश हो रही थी. उस दिन मनोज कुमार ने प्रकृति के उस रूप को देखकर कहा था, ‘सुरों की मां सरस्वती भी आज आंसू बहा रही हैं.’ उनके निधन पर दो दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था.

आज उनचालिस साल बाद भी रफ़ी साहब की आवाज के दिवानों की कमी नहीं है. आज की पीढ़ी भी उन्हें जानती है, सुनती है और उनके जैसा गाने का प्रयास करती है. आइए आज उन्हें एक अलग अंदाज में जानने का प्रयास करते हैं.

– मो. रफी को तेरह साल की उम्र में स्टेज पर गाने का अनायास ही मौका मिल गया. दरअसल एक शो के दौरान अचानक बिजली चली गई. तब के.एल. सहगल ने गाने से मना कर दिया. वहां मौजूद बालक रफ़ी ने गीत गाना शुरू कर दिया. यही अवसर रफ़ी के लिए वरदान साबित हुआ.

– एक पंजाबी फिल्म ‘गुलबलोच’ में पहला गीत गाने का अवसर मिला. फिल्म ‘बैजू बावरा’ में तू गंगा की मौज …., ओ दुनिया के रखवाले…., गीत गाने के बाद रफ़ी ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

– 1976 की फिल्म ‘लैला मजनूं’ के हीरो ऋषि कपूर अपने लिए किशोर कुमार की आवाज चाहते थे. लेकिन विरोध के बावजूद संगीतकार मदन मोहन ने सभी गीत मो. रफी से ही गवाया. बाद में आलम यह कि ऋषि कपूर की आवाज मो. रफी ही बन गए.

– वे हंसमुख और दरियादिल के साथ शर्मिले स्वभाव के थे. रफी पड़ोस की एक विधवा महिला को गुमनाम बन कर पैसे भेजा करते थे. सालो बाद जब मनिऑर्डर आना बंद हुआ, तो खोज-खबर के बाद महिला को मालूम चला कि पैसे भेजने वाले की मौत हो गई है और उस दानदाता का नाम मो. रफी है.

– 1956 – 1965 के दरम्यान उन्हें छह फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया. तब रेडियो सिलोन से प्रसारित ‘बिनाका गीतमाला’ में दो दशक तक उनके ही गीत छाए रहे.

– उन्हें श्रीलंका में स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था. उस दिन उनको सुनने के लिए बारह लाख कोलंबोवासी मौजूद थे. यह उस समय का विश्व रिकॉर्ड था.

– रफी पतंग उड़ाने के बेहद शौकीन थे. जब भी अवसर मिलता वे छत पर चले जाते थे. लेकिन उनके पड़ोसी मन्ना डे अक्सर उनकी पतंग को काट दिया करते थे.

– मो. रफी की पत्नी के अनुसार फिल्म ‘दुलारी’ का गाना ‘सुहानी रात ढल चुकी, न जाने कब तुम आओगे’ उनका पसंदीदा गीत था.

– उनका गाया आखिरी गीत फिल्म ‘आसपास’ के लिए था. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने रफ़ी के निधन के दो दिन पहले गवाया था. बोल है ‘शाम फिर क्यों उदास है दोस्त’.

गायकी के सफर की शुरुआत…
मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर 1924 को अमृतसर, के पास कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था. आरंभिक स्कूली पढ़ाई कोटला सुल्तान सिंह में हुई. जब मोहम्मद रफी करीब सात साल के हुए, तब उनका परिवार रोजगार के सिलसिले में लाहौर आ गया. इनके परिवार का संगीत से कोई खास सरोकार नहीं था. जब रफ़ी छोटे थे तब इनके बड़े भाई की नाई की दुकान थी, रफ़ी का काफी वक्त वहीं पर गुजरता था. कहा जाता है कि रफ़ी जब सात साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे जो उधर से गाते हुए जाया करता था. उसकी आवाज रफ़ी को पसन्द आई और रफ़ी उसकी नकल किया करते थे. उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसन्द आने लगी. लोग नाई की दुकान में उनके गाने की प्रशंशा करने लगे. लेकिन इससे रफ़ी को स्थानीय ख्याति के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला. इनके बड़े भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने को भेजा और फिर एक अवसर आया… जब आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) लाहौर में मशहूर सिने गायक स्व. कुन्दनलाल सहगल को सुनने आए लोगों के बीच उनकी गायकी का सफर शुरू हुआ…

(जीवन काल : 24 दिसंबर 1924-31 जुलाई 1980)

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