पृथक विदर्भ राज्य मिलेगा तो कैसे?

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कैसे अलग राज्य बनेगा विदर्भ? इतने मोर्चे, इतने धरना, इतने कर आंदोलन चुके!… फिर भी कोई सुधि लेने वाला सामने नहीं आया. विदर्भ गीत गाकर जिस-जिसने सत्ता पाई, महाराष्ट्र का ही हो कर गया. विदर्भवादी भी क्या कर रहे हैं… “गरजा महाराष्ट्र माझा…” की धुन पर वे भी तो झूम ही रहे हैं… विदर्भ नाम के नारे लगाते हैं और महाराष्ट्र आइकॉन का, महाराष्ट्र के धुन पर थिरक रहे हैं…

विदर्भ का कहीं कोई सम्मान नहीं, विदर्भ का कहीं कोई गान नहीं, विदर्भ का किसी में कोई सम्मान नहीं…तो क्या केवल सत्तासुख के नाम पर विदर्भ चाहिए?…

विदर्भ ही विदर्भ दिला सकता है…

यह जान लो कि विदर्भ देने वाला भी विदर्भ है… दिलाने वाला भी विदर्भ ही है… कोई गड़करी, कोई फड़णवीस, कोई मोदी, कोई शाह, कोई ठाकरे और न कोई शरद पवार ही विदर्भ दिलाने वाला है… विदर्भ यदि चाहिए तो बस केवल और केवल विदर्भ ही विदर्भ दिला सकता है…तो यदि विदर्भ चाहिए तो केवल विदर्भ का सम्मान करो… विदर्भ की धरती को मां की तरह प्यार करो, मां की तरह सम्मान दो…!

जब तक विदर्भ के लोग स्वयं विदर्भ का, विदर्भ के अपने इतिहास पुरुषों का, विदर्भ के लिए जीवन अर्पित कर देने वालों का, विदर्भ के संत-महात्माओं का, मान करना नहीं सीखेंगे, उन्हें सम्मान नहीं देंगे, तब-तक न तो विदर्भ का मान बढ़ेगा, और न उनको उनकी पहचान मिलेगी….

छत्रपति शिवाजी महाराज समस्त देशवासियों के लिए पूजनीय हैं, उनका हम सभी विदर्भवासी भी मान-सम्मान करते हैं. चौक-चौराहों, सार्वजनिक भवनों, स्टेशन, बस स्थानक, हॉस्पीटल, स्कूल, कालेज इत्यादि को उनका नाम देते हैं. यह अच्छी बात है. लेकिन क्या विदर्भ का और कोई महापुरुष अथवा संत-महात्मा ऐसा नहीं है, जिसको हम मान दे सकें?…

सोचो, विदर्भवादियों सोचो…जो अपनों का मान नहीं करता, उसे कहीं सम्मान या पहचान नहीं मिलती.

विदर्भ के महापुरुषों का सम्मान करो…

विदर्भ के महापुरुषों का सार्वजनिक रूप से सम्मान करो, उनकी जयंती, पुण्यतिथि मनाओ, उनके पुतले लगाओ, उनका सम्मान उद्धव ठाकरे, शरद पवार आदि गैरविदर्भीय लोगों से करवाओ. उन्हें बाध्य करो कि विदर्भ और महाराष्ट्र के लिए विदर्भ के सपूतों और महापुरुषों ने जो कुछ किया है, उसका गुणगान और सम्मान वे भी करें…

कवियों, लेखकों, साहित्यकारों और पत्रकारों को कहो…

विदर्भ के कवियों, लेखकों, साहित्यकारों और पत्रकारों को कहो कि वे विदर्भ की गाएं, विदर्भ की गुनगुनाएं, विदर्भ के इतिहास से लोगों को परिचित कराएं, विदर्भ की लोक कला, लोक कृति, विदर्भ के धार्मिक स्थलों, ऐतिहासिक स्थलों, पर्यटन स्थलों पर अपनी लेखनी चलाएं…

शेष महाराष्ट्र के गुणगान कर बड़ा नहीं बन सकते…

शेष महाराष्ट्र के गुणगान कर अपने को बड़ा कवि, बड़ा लेखक, बड़ा साहित्यिक, बड़ा पत्रकार, बड़ा इतिहासकार, बड़ा नेता समझने वाले विदर्भ के लोगों शर्म करो…!!!..सोचो तुमने विदर्भ के लिए करता किया है?…..सड़कें बनवाने, धरण बनवाने, शाला और महाविद्यालय बनवा कर अपने को धन्य मत समझो……वह सब तुमने नहीं, हम विदर्भ के लोगों के पैसे से अथवा हम विदर्भ के लोगों का हक मार कर इकट्ठा किए गए काले धन से तुम ने बनवाए हैं…

विदर्भ की धरोहर ही तुम्हारी विरासत हैं…

इसलिए महान बनने का नाटक मत करो. विदर्भ का सम्मान करना सीखो, विदर्भ के महापुरुषों और संत-महात्माओं का सार्वजनिक रूप से मान करना सीखो, विदर्भ के धार्मिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक ‌और सांस्कृतिक, स्थलों के साथ ही पर्यटन स्थलों को महत्त्व दो. यही विदर्भ की धरोहर हैं, यही तुम्हारी विरासत हैं…इसे भूल गए तो समझो अपने “बाप” को भूल गए…

ऐसे समाज और ऐसे लोगों का कोई बाहरी या अपना भी सम्मान नहीं करता…अपना सम्मान चाहते हो तो विदर्भ का और विदर्भ की सभी धरोहरों का सम्मान करना सीखो…यह करना सीखो…

झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना आदि के लोगों को ऐसे ही अलग अपना राज्य नहीं मिला!…

अपनी राष्ट्रीयता को पहचान दो, अपने आइकन तैयार करो, “विदर्भ राग” तैयार करो…

नहीं तो पृथक विदर्भ राज्य का सपना देखना बंद कर दो…

नहीं तो ‘गरजा महाराष्ट्र माझा’ गाते रहोगे… महाराष्ट्र का गुणगान करते रहोगे… मुंबई, पुणे के लिए लार टपकाते रहोगे… विदर्भ लेकर करोगे क्या…और कौन है, जो थाली में परोस कर विदर्भ तुम्हें दे देगा?…

सोचो..सोचो…सोचो…विदर्भवादियों जरा सोचो!…

– कल्याण कुमार सिन्हा
Vidarbhaapla Aapla

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