कोश्यारी : बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

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कोश्यारी

*कल्याण कुमार सिन्हा-
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि, हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यूँ मेरा क़ातिल, क्या रहेगा उसकी गर्दन पर वो ख़ूँ,
जो चश्मे-तर (भीगी आँख) से उम्र यूँ दम-ब-दम (प्राय:, बार-बार) निकले

निकलना ख़ुल्द (स्वर्ग) से आदम (पहला मानव) का सुनते आए थे
लेकिन, बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

सूबा-ए-महाराष्ट्र के (पूर्ववर्ती) सदर जनाब भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshyari) का दर्दे-दिल इन दिनों मिर्जा ग़ालिब की दीवाने-ग़ालिब में शामिल उनकी मशहूर ग़ज़लों में इस एक ग़ज़ल की शुरुआती बस इन तीन अंतरों में छलक रहा होगा. कोश्यारी महाराष्ट्र से विदा हो रहे हैं. उनकी जगह झारखंड में राज्यपाल रहे (रायपुर) छत्तीसगढ़ के रमेश बैस आसीन होने वाले हैं. कोश्यारी ने राज भवन ही नहीं, अपने साथ विवादों की एक लंबी फेहरिस्त भी छोड़ी है, जाते जाते विपक्ष को जश्न मनाने का मौका भी दे गए, लेकिन महाराष्ट्र भाजपा के नेता भी काफी राहत महसूस कर रहे होंगे.

हालांकि, जल्द ही बात आई-गई हो जाए, लेकिन महाराष्ट्र में 31 अगस्त 2019 को राज्यपाल के पद पर आसीन हुए भगत सिंह कोश्यारी अपने बयानों के लिए याद किए जाते रहेंगे. उनके कार्यकाल में आधा दर्जन मौके ऐसे आए, जब सार्वजनिक आयोजनों में उनकी मासूम सी लगने वाली विवादित टिप्पणियों ने राज्य के लोगों को खौलने पर मजबूर कर दिया था. साथ ही राज्य में विपक्ष में रही या अब जब सत्ता में शामिल भाजपा को भी अपना या उनका बचाव करने का रास्ता नहीं सूझता था. विपक्षी दल हर बार केंद्र से उन्हें हटाने की मांग करते रहे थे. उन्हें हटाने के लिए तमाम प्रदर्शन, धरना, सभाएं और रैलियां भी निकाली गईं. महाराष्ट्र सरकार में भी शिंदे गुट क्षुब्ध दिखाई दिया. इन परिस्थितियों ने उन्हें राष्ट्रपति के पास अपना इस्तीफा भेजने पर मजबूर कर दिया था. लगभग एक महीने से पेंडिंग पड़ा उनका इस्तीफा अंततः मंजूर हुआ. महाराष्ट्र में वे तकरीबन तीन साल बतौर राज्यपाल रहे हैं.

झेलते रहे अपमान और अपयश

महाराष्ट्र में अपने विवादित बयानों के कारण कोश्यारी चर्चा में रहे, अपमान और अपयश झेलते रहे. विपक्षी नेता न केवल केंद्र से उन्हें हटाने की मांग की, बल्कि यह कहने से भी बाज नहीं आए की वे राज्यपाल जैसे पद के काबिल ही नहीं हैं. राज्य के बड़े नेता शरद पवार ने तो राहत की सांस ली है. उन्होंने कहा है, “उनके जाने की खबर राहत लेकर आई है है. राज्य में ऐसा राज्यपाल पहले कभी नहीं रहा.”

लेकिन, जाते-जाते कोश्यारी जी ने महाराष्ट्र के लोगों के दिलों पर डाले गए जख्मों पर मरहम भी लगाने का भी प्रयास किया है. उन्होंने ट्वीट किया कि “महाराष्ट्र संतों, समाज सुधारकों और वीर योद्धाओं की जन्मस्थली है. यहां बतौर सेवक या राज्यपाल के रूप में काम करना मेरे लिए गर्व की बात है.”

थम नहीं रहा था विवादों का सिलसिला

विभिन्न सरकारी आयोजनों में अपनी दृष्टि में हलके-फुल्के अंदाज में कोश्यारी कुछ ऐसी बातें कह जाते रहे, जो राज्य के लोगों को अपनी अस्मिता पर छींटाकशी वाला महसूस करा जाता था. यही कारण है कि आगामी 16 फरवरी को ही शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर के 59वें दीक्षांत समारोह के लिए उनकी कोल्हापुर की यात्रा को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है. छत्रपति शिवाजी महाराज पर कोश्यारी के बार-बार दिए गए विवादास्पद बयानों से नाराज अनुयायी नहीं चाहते हैं कि वे कोल्हापुर आएं. शिवसेना (उद्धव) के सदस्यों ने तो शनिवार सुबह विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर ‘जेल भरो’ विरोध प्रदर्शन भी किया था.

शिवसेना के जिलाध्यक्ष विजय दीवाने ने कहा कि कोश्यारी लगातार महाराष्ट्र के महान विभूतियों पर निराधार बयान देते रहे हैं. ऐसे व्यक्ति को शिवाजी विश्वविद्यालय प्रशासन कैसे आमंत्रित कर सकता है? अगर कोश्यारी कोल्हापुर आते हैं तो हम काली पट्टी बांधेंगे और दीक्षांत समारोह में खलल डालेंगे. शिव भक्त लोक आंदोलन समिति, सर्वदलीय कार्रवाई समिति और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की एक संयुक्त बैठक भी आयोजित की गई है.

बता दिया- शिवाजी महाराज को पुराने जमाने के हीरो

छत्रपति शिवाजी महाराज को लेकर एक आयोजन में उनके बयान की बानगी सुनें- उन्होंने कहा “जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो हमारे टीचर पूछते थे कि आपके सबसे पसंदीदा नेता कौन हैं? क्लास में लोग अपनी इच्छा से अलग-अलग नाम लेते थे. कोई सुभाष चंद्र बोस को तो कोई जवाहरलाल नेहरू को अपना पसंदीदा नेता बताता था. कोई महात्मा गांधी का नाम लेता था और उन्हें अपना हीरो बताता था. लेकिन मुझे लगता है कि अगर आप से अब कोई पूछे कि आपका पसंदीदा हीरो कौन है तो आप लोगों को कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, सब कुछ आपको यहीं महाराष्ट्र में मिलेगा. शिवाजी महाराज तो पुराने जमाने की बात हैं. मैं नए युग की बात कर रहा हूं, सब यहीं मिल जाएंगे. डॉ. बीआर आंबेडकर से लेकर नितिन गडकरी तक आपको यहीं मिल जाएंगे.”

मांगनी पड़ी थी माफी

कोश्यारी जी ने इससे पहले भी एक विवादित बयान दिया था. मुंबई के अंधेरी में एक कार्यक्रम में उन्होंने कह डाला था, “अगर गुजराती और राजस्थानी लोगों को मुंबई और ठाणे से हटा दिया जाए तो मायानगरी में पैसा नहीं बचेगा.” इस बयान के बाद उनकी काफी किरकिरी हुई थी. उनके इस बयान पर महाराष्ट्र में तब नई-नई बनी देवेंद्र फडणवीस और शिंदे के सरकार बैक फुट पर आ गई थी. विपक्ष ने भाजपा और राज्यपाल दोनों की जमकर क्लास लगा दी थी. हालांकि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को कहना पड़ा था कि राज्यपाल को इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए. बाद में राज्यपाल ने अपने इस बयान पर माफी भी मांगी थी.

छात्रावास का नाम सावरकर करने का विवाद

राज्यपाल कोश्यारी उस समय भी विवादों में घिर गए थे जब मुंबई विश्वविद्यालय में एक भवन के उद्घाटन करने पहुंचे. कोश्यारी ने यहां बने छात्रावास का नाम स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के नाम पर रखने का आदेश विश्वविद्यालय के उप कुलगुरु को दिया था. उनके इस आदेश पर घमासान शुरू हो गया था. मुंबई यूथ कांग्रेस ने भगत सिंह कोश्यारी पर जमकर निशाना साधा और विपक्ष ने एक बार फिर सरकार की धुनाई कर डाली थी.

जाने बिना शिवाजी महाराज के गुरु तक जा पहुंचे

पिछले साल मार्च में औरंगाबाद की घटना है. यहां भी उनका आत्मज्ञान हिलोरे मार बैठा. न केवल उन्होंने स्वामी समर्थ रामदास को छत्रपति शिवाजी महाराज का गुरु बता दिया, बल्कि उन्होंने यह भी कह डाला कि जिस तरह से चाणक्य के बिना चंद्रगुप्त को कौन पूछेगा? उसी तरह से समर्थ के बिना शिवाजी को कौन पूछेगा? जीवन में गुरु का महत्व बताने के उत्साह में उनकी यह गलतबयानी भी उन्हें भारी पड़ी. कोश्यारी के बयान पर आलोचनाओं के बीच एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ के एक आदेश की कॉपी भी ट्वीट की थी. यह आदेश वह था, जिसमें कहा गया कि शिवाजी महाराज और स्वामी समर्थ रामदास के बीच कोई भी गुरु और शिष्य का रिश्ता नहीं था.

सावित्रीबाई फुले को भी नहीं छोड़ा…

भगत सिंह कोश्यारी ने प्रतिष्ठित समाजसेविका और स्त्रियों में शिक्षा का अलख जगाने वाली सावित्रीबाई फुले पर भी अपना ज्ञान कुछ इस अंदाज में उड़ेला, उन्होंने कहा था कि 1833 में उनका जन्म हुआ था. जब वह 10 साल की थीं, तभी उनकी शादी हो गई थी. तब उनके पति 13 साल के थे. अब आप सोचिए इतने छोटे लड़के-लड़की शादी के बाद क्या करते होंगे? सावित्रीबाई फुले पर ऐसी अपमानजनक बयानबाजी भी राज्य के लोगों के लिए असह्य हो गई.

राजनीतिक बयानबाजी से भले ही कोश्यारी दूरी बनाते रहे, लेकिन बिना तथ्यों को जाने, सामाजिक प्रभाव और लोगों की भावनाओं को बिना समझे अपनी मासूमियत भरी हलके बयानों से वे राज्य के लोगों की भावनाओं को छलनी करते गए. अपनी ऐसी नादानियों से उन्होंने न केवल स्वयं अपमान झेला, बल्कि भारतीय जनता पार्टी को भी लज्जित करते चले गए.

बात ही अलग रही कार्यकाल की

गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकार और राज्यपालों के बीच टकराव की स्थिति कोई नई बात नहीं है. बहुत समय से एक दूसरे के कामकाज में रोड़े अटकाए जाने का आरोप लगाया जाता रहा है. लेकिन कोश्यारी के कार्यकाल की बात ही अलग रही. पिछले साल इसी फरवरी के महीने में राज्यपाल कोश्यारी इस वजह से चर्चा में रहे कि महाराष्ट्र की तत्कालीन उद्धव ठाकरे की सरकार ने उन्हें सरकारी विमान उपलब्ध कराने से मना करा दिया था. रिश्तों में जब कड़वाहट हो, तो फिर इस तरह के वाकया होना आम बात हो जाती है.

लंबा रहा है राजनीतिक सफर…

17 जून 1942 को उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर जिले के कपकोट ब्लाक केे एक गांव में जन्में कोश्यारी जी का राजनीतिक सफर संघर्षपूर्ण और लंबा रहा है. आरएसएस से जुड़ने और 1975 के आपात काल में जेल जाने के बाद उनका भाजपा में पदार्पण हुआ था. वर्ष 2000 में उन्हें नए बने राज्य उत्तरांचल (अब उत्तराखण्ड) का ऊर्जा, सिंचाई, कानून और विधायी मामलों का मंत्री नियुक्त किया गया. 2001 में वे नित्यानन्द स्वामी के स्थान पर राज्य के मुख्यमंत्री बने. उत्तराखंड के 2002 में विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार जाने के बाद कोश्यारी को 2002 से 2007 तक विधानसभा में नेता विपक्ष की जिम्मेदारी संभालने का मौक़ा मिला. इसके बाद उन्होंने 2007 से 2009 तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली,

प्रशासनिक योग्यता पर सवाल...

इसी दौरान 2007 में भाजपा की उत्तराखंड की सत्ता में वापसी हुई. लेकिन पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया. इसके बाद पार्टी वह 2008 से 2014 तक उत्तराखंड से राज्यसभा के सदस्य चुने गए थे. 2014 में नैनीताल संसदीय क्षेत्र से जीतकर वे पहली बार लोकसभा सदस्य चुने गए, लेकिन 2019 में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को उनकी प्रशासनिक योग्यता पर विश्वास नहीं था. आरएसएस से उनकी नजदीकी के कारण मोदी सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र के राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंपी. चर्चा है कि अब वे अपने गृह राज्य में अपनी राजनीतिक सक्रियता का परिचय देने वाले हैं.

कोश्यारी
-कल्याण कुमार सिन्हा.

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