पिछड़ों का मानवाधिकार भी लक्ष्य बना ‘जल योद्धा’ प्रेमजी का

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पिछड़ों

प्रेम कुमार वर्मा ‘समता स्वयंसेवी संगठन’ के सचिव थे. अपने इस संगठन के बैनर तले प्रेम कुमार वर्मा ने बिहार के पिछड़े जिले खगड़िया में लोगों को साफ और शुद्ध पानी मिले इसको लेकर विराट अभियान चलाया. उन्होंने समुदाय आधारित कुआं का जीर्णोद्धार कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. यह उनके समाज सेवा अभियान का वह सोपान था, जिसके बाद उनके इस संघर्ष ने उन्हें ‘जल योद्धा’ की उपाधि दिला दी. वे अति पिछड़ों में सुमार अनुसूचित जाति के मुसहर समुदाय के उत्थान लिए भी समर्पित रहे.  
स्मरण : *कल्याण कुमार सिन्हा
मानव निर्मित बाढ़ की त्रासदी से मुक्ति दिलाने और बिहार के अति पिछड़ों में सुमार अनुसूचित जाति के मुसहर समुदाय के उत्थान लिए समर्पित एक और जीवन का समय से पहले दिल्ली में पिछले 24 अप्रैल को अवसान हो गया. समाज ने एक समर्पित जनसेवी खो दिया. प्रख्यात जल विशेषज्ञ और ‘जलयोद्धा’ के नाम से विख्यात खगड़िया के सन्हौली निवासी प्रेम कुमार वर्मा का 65 वर्ष की आयु में निधन हुआ. वे बीते छह अप्रैल को सपरिवार दिल्ली गए थे. वहां उनके छोटे पुत्र नीतेश रंजन उर्फ मिट्ठू सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं. दिल्ली में ही कुछेक दिनों पहले वे बीमार पड़े और बीते माह शनिवार 24 अप्रैल की देर रात्रि उनका निधन हो गया.
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अपने लोगों के बीच वे प्रेमजी के नाम से जाने जाते थे. प्रेमजी ‘समता स्वयंसेवी संगठन’ के सचिव थे. समता के बैनर तले प्रेमजी ने खगड़िया में लोगों को साफ और शुद्ध पानी मिले, इसको लेकर विराट अभियान चलाया. उन्होंने समुदाय आधारित कुओं का जीर्णोद्धार कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. मटका फिल्टर, जलकोठी और वर्षा जल संग्रह को उन्होंने फरकिया में धरातल पर उतारा. नदी-पानी पर अपने काम के कारण उनकी पहचान देश में थी.
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अन्य की तरह, प्रेमजी ने राम मनोहर लोहिया की शिक्षाओं से प्रभावित एक समाजवादी छात्र नेता के रूप में अपनी कदमताल शुरू की थी. शैक्षणिक क्षेत्र में कोई विशेष उपलब्धियां उन्होंने भले ही हासिल न की, लेकिन उनकी सामाजिक चैतन्यता ने उन्हें एक जनसेवी के रूप में प्रतिष्ठित करना शुरू कर दिया था. 1970 के दशक में, वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे अन्य लोगों के साथ गांधीवादी समाजवादी जयप्रकाश नारायण के अनुयायी बन गए. उनका लक्ष्य जयप्रकाश नारायण की “सम्पूर्ण क्रांति ” के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन बन गया था. उस दौरान बिहार के जयप्रकाश आंदोलन में उनकी सक्रियता ने उन्हें समाज के पिछड़ों का दर्द और पीड़ा को समझने और उसके विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित किया. इसके चलते उन्हें कई बार जेल की यात्रा भी करनी पड़ी.

प्रेमजी बिहार के उस खगड़िया जिले से आते थे. जहां गंगा, कोसी और बागमती नदियों की बाढ़ की विभीषका प्रत्येक वर्ष आम खेतीहर और भूस्वामियों की कमर आर्थिक रूप से तो तोड़ती ही है, भूमिहीन अति पिछड़ों और अछूत समझे जाने वाले समुदाय का तो सर्वस्व ही तबाह कर जाती है. प्रेमजी को ने देखा कि प्राकृतिक आपदा से अधिक यह विभीषिका मानव निर्मित हो चली है. उत्तर बिहार में मानव निर्मित यह बाढ़ सत्ताधारी नेताओं और नौकरशाहों के लिए चौथी फसल बन गई थी. पहले बाढ़ रोकने के उपायों में, फिर बाढ़ आने के बाद राहत कार्य में नेताओं और नौकरशाहों के व्यापक भ्रष्टाचार ने उनकी चेतना को झकझोरना शुरू कर दिया था.

किन्तु इसके विरुद्ध तत्कालीन भारतीय समाज के लिए संघर्ष कठिन काम था. उधर 1975 में आपातकाल से पहले सत्तावाद के बादल मंडरा रहे थे. देश की टुकड़ों में बंटी राजनीतिक पार्टियां. जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति आंदोलन से जुड़ लोकतंत्र, संवैधानिक शासन और न्याय की रक्षा के लिए एकजुट होने में सहमत हो चली थीं. यह कठिन और खतरनाक दौर था. लेकिन इसने बिहार से बाहर निकल कर देश में सामाजिक आंदोलनों के विस्तार की नींव के रूप में काम किया, जिसका नेतृत्व एक समावेशी दृष्टि और समानता और न्याय के मिशन के साथ आदर्शवादी नेताओं के एक समूह के नेतृत्व में किया गया.

प्रेमजी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने संघर्ष को अपना धर्मयुद्ध बनाया. लेकिन उन्हें समझ में आ गया कि सत्ता की ताकत के समर्थन से चल रहे भ्रष्टाचार का ऐसे मुकाबला संभव नहीं है. उन्होंने समाजसेवा के अपने आदर्शों के अनुरूप 1993 समता स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की. समतावादी समाज के लक्ष्य की प्राप्ति के उद्देश्य से ‘समता’ की स्थापना की. पिछड़ों के मानव अधिकारों, बाढ़ राहत और पुनर्वास, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और आजीविका के मुद्दों पर काम को उन्होंने चुना. साथ ही उन्होंने बिहार के सबसे अधिक सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर रहने वाले मुसहर समुदाय पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया. इसके लिए उन्होंने समता जल सुरक्षा सहयोगी, मेघ पायने अभियान शुरू किया जिसमें देश के प्रतिष्ठित एनजीओ भी उनके साथ आए.

देश की जानी-मानी स्वयंसेवी संस्था अर्थात एनजीओ ‘अर्घ्यम फाउंडेशन’ की रोहिणी नीलकेणी और टाटा ट्रस्ट की पूर्व संचालक मयूरी बैश्य, जो अब थाईलैंड के बैंकॉक में कार्यरत हैं, ने विभिन्न अखबार और पोर्टल पर प्रेमजी के निधन को श्रृद्धांजलि अर्पित की है. खगड़िया में बाढ़ पीड़ितों के लिए कार्य करने के दौरान उन्होंने प्रेमजी के कार्यों और क्षेत्र के पिछड़ों के साथ प्रेमजी के गहरे जुड़ाव को देखा है और गरीब पीड़ित ग्रामवासियों के दिलों में प्रेमजी के प्रति सम्मान भी. उन्होंने उनका स्मरण करते हुए उस दौरान अपने आलेख में प्रेमजी की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की है. साथ ही उस दौरान बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत कार्य चलाने में प्रेमजी से मिले बहुमूल्य सहयोग के प्रति कृतज्ञता भी ज्ञापित की है.    

प्रेमजी ने अपने संघर्ष को समाजसेवा से जोड़ दिया था. इस काम में उन्होंने सफलता के साथ असफलताएं भी पाईं और इसके साथ लोगों का ध्यान भी खींचा. सर्वाधिक पिछड़ों में आने वाले मुसहर समुदाय के लिए उनके कार्यों ने उनको विशेष प्रतिष्ठा दिलाई. मुसहर समुदाय में जागरूकता से उनके प्रति सामाजिक अन्याय में भी  केवल कमी आई बल्कि आजीविका का विकल्प भी उन्हें मिला. लेकिन इस समुदाय को पूरी तरह अन्याय मुक्त करने के लिए प्रेमजी की अनुपस्थिति एक बहुत बड़ी क्षति बनकर रह गई.

सफलताओं, असफलताओं के बावजूद, वे सामाजिक परिवर्तन और न्याय के मिशन में जिस प्रकार समर्पित थे, उनके साथ के लोगों को लगता है कि कम से कम और एक दशक का उनका साथ अति पिछड़ों में आने वाले मुसहरों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए निर्णायक होता.

प्रेमजी ने लोहिया और जयप्रकाश नारायण के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के आईने में समाज को गहराई से परखा और समझा था. उन्होंने पाया कि एक समय जमींदारों और सामंतों के इर्द-गिर्द सिमटी सामाजिक सत्ता का शिकंजा भले ही ग्रामीण जनजीवन में ढीला पड़ा हो, लेकिन छूटा नहीं है. राजशाही और जमींदारी के बाद अब “अपनी सरकार” उनकी ही तरह शक्तिशाली हो चली है. आम लोगों को न्याय दिलाने, अन्याय मुक्त करने और लोगों के कल्याण के नाम पर सत्ताशीन होने के बाद जनादेश के नाम पर वह भी जन पर हावी होने और शक्तिशाली होने का दम भरने से बाज नहीं आ रही. प्रेमजी समझ गए थे कि लोकतंत्र के नाम पर ‘लोक का सहारा ले तंत्र’ पर काबिज हो जाना ही राजनेताओं का उद्देश्य रह गया है. सत्ताधारी, समाज के उत्थान के बहाने बाजारवाद को प्रश्रय देकर आम लोगों को फिर से कमजोर करने के ही काम कर रहे हैं, बाजार के नियम आम लोगों पर हावी हो रहे हैं, बाजार की ताकत भी सत्ताधारियों की ताकत बन गई है, समाज, जिसे सर्वोच्च होना था, उसे धीरे-धीरे राज्य की शक्ति और फिर बाजार की शक्ति से बदल दिया गया. अब, समाज सबसे नीचे है और हम नागरिकों के रूप में राज्य और बाजार को हमारे लिए उत्तरदायी बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

समाज और सत्ता के चरित्र का प्रेम जी के इस गहन अध्ययन ने उन्हें जो लक्ष्य दिया, वह सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले के लिए अब संघर्ष का आधार बन सकता है. लेकिन उनकी अनुपस्थिति अब मात्र मार्गदर्शक का ही काम करेगा. समाज, बाजार और सरकार के बीच संतुलन कैसे बहाल हो, इसके केंद्र में सक्रिय नागरिकों और समाज को बनाए रखने के लिए अनवरत काम करना पड़ेगा, ताकि बाजार और राज्य बड़े सार्वजनिक हित के प्रति अधिक जवाबदेह बन सकें. अब प्रेमजी की इस अधूरी यात्रा को मंजिल तक कौन पहुंचा पाता है, यह बड़ा प्रश्न है.

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