जिज्ञासा : क्या पृथ्वी पर दस्तक दे चुके हैं एलियन..!

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कृष्ण किसलय,
एलियन :
क्या सचमुच सुदूर अंतरिक्ष से अपनी आकाशगंगा या किसी दूसरी आकाशगंगा के ग्रहवासी (एलियन) पृथ्वी तक दस्तक दे चुके हैं? नासा के वैज्ञानिक सिल्वानो पी. कोलम्बानो का तो ऐसा ही कहना है. सिल्वानो पी. कोलम्बानो की बात इसलिए गौर करने लायक है कि वह नासा की इंटेलिजेन्स सिस्टम के लिए करते हैं. उनका कहना है कि कि पृथ्वी के मनुष्यों से बेहद अधिक बुद्धिमान एलियन पृथ्वी की यात्रा कर चुके हैं, जिन्हें हम पहचान नहीं पाएं.
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दूसरे ग्रह के वासियों का रूप हमारी कल्पना और समझ से एकदम भिन्न हो सकता है. सिल्वानो पी. कोलम्बानो ने मार्च 1918 में ही डिकोडिंग एलियन इंटेलिजेन्स वर्कशाप में अपने शोधपत्र में बताया था कि एलियन अंतरिक्ष-यात्रा करने में सक्षम हो चुके हैं. नवम्बर 2018 में आयरलैंड के आकाश में चार पायलटों ने अन-आइन्डेन्टीफाइड फ्लाइन्ग आब्जेक्ट (यूएफओ) को देखने का दावा भी किया था. इन पायलटों ने एयर ट्रैफिक कंट्रोल को बताया कि आसमान में बिजली जैसी रफ्तार से तेजी से उड़ती हुई चमकीली चीज दिखी है. पायलटों के कथन ने एलियन के पृथ्वी पर आने की बात को फिर से 21वीं सदी में एक नई हवा दे दी है.

17वीं सदी में शुरू हुई थी उड़नतश्तरियों को देखे जाने की अफवाह
20वीं सदी में अक्सर उड़नतश्तरियों या यूएफओ की खबरें दुनिया भर की पत्र-पत्रिकाओं और सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती थीं. माना जाता था कि यूएफओ हमारे सौरमंडल से बाहर किसी पारग्रहीय सभ्यता के अंतरिक्ष यान हैं. तब यूएफओ का रहस्य जानने के लिए अमेरिकी एयरफोर्स ने वर्ष 1947 में ‘प्रोजेक्ट साइन’ के नाम से खोजी अभियान शुरू किया था. इसके बाद वर्ष 1948 में ‘प्रोजेक्ट स्टार’ और वर्ष 1952 में ‘प्रोजेक्ट ब्लूबुक’ शुरू किए गए. कनाडा के राष्ट्रीय रक्षा विभाग ने भी इस दिशा में शोध कराया था. अगले वर्ष 1953 में तो इस खोज अभियान के लिए अर्द्धसरकारी संगठन ब्रिटिश फ्लाइंग सेन्सर ब्यूरो की स्थापना भी गई थी.
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विज्ञान पत्रकार एडगर प्लन्केट और उनके पुत्र साइंस रिपोर्टर डेनिस प्लन्केट के प्रयास से स्थापित हुई इस अर्द्धसरकारी उपक्रम के अनेक देशों में करीब एक हजार सदस्य बनाए गए, जो विज्ञान की अपेक्षाकृत बेहतर समझ रखते थे. मगर 50 सालों बाद भी कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं मिलने के कारण इस उपक्रम को बंद कर देने की घोषणा की गई. यूएफओ का रहस्य जानने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने भी शोध कराया था, मगर उस शोध में यूएफओ के होने की बात तथ्यात्मक रूप में सामने नहीं आई. यूएफओ को देखे जाने के किस्से या अफवाह 17वीं सदी में शुरू हुई थी और बीती 20वीं सदी में तो ऐसी चर्चा उफान पर थी. अब एक बार फिर नए सिरे से इसकी चर्चा है.

सभ्यता के आरंभ से ही परेशान करता रहा है पृथ्वी से परे जीवन का सवाल
सभ्यता के आरंभ से ही यह सवाल आदमी को परेशान करता आया है कि क्या पृथ्वी के अलावा ब्रह्मांड के अन्य किसी स्थान पर उसके जैसा बुद्धिमान प्राणी है? पुराण कथाओं में देवी-देवता, देवलोक होने की और लोककथाओं में परिलोक होने की बातें शायद इसी सवाल से जुड़े आदमी की कल्पनाएं रही हैं. अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में विशेष प्रगति के बाद 21वीं सदी में आदमी को यह सवाल अधिक परेशान करने लगा है कि क्या सचमुच अंतरिक्ष में बहुत दूर कोई बुदबुदा रहा है?

अति-अति विस्तृत ब्रह्माण्ड में एलियन की तलाश हम बेहद सीमित दायरे में ही कर सके हैं. हमारी तकनीकी क्षमता विशाल अंतरिक्ष के हिसाब से बेहद छोटी है, जिस वजह से एलियन को ढूंढना इन्सानी बूते की बाहर की चीज बनी हुई है. इस मामले में मनुष्य की छोटी उम्र होना भी एक सीमा है और हमारी तकनीकी प्रगति भी बेहद सीमित है. मानव सभ्यता के विकास-क्रम में तकनीक का विकास 10 हजार साल पहले शुरू तो हुआ, मगर सही मायने में विज्ञान-तकनीक की शुरुआत पांच सदी पहले हुई है.

सौरमंडल से बाहर बुद्धिमान और तकनीक समृद्ध प्राणी का विकास संभव
14 अरब साल पुराने अरबों-खरबों तारों वाले ब्रह्माण्ड में कम-से-कम हजारों ग्रह ऐसे हैं, जिन पर जीवन का विकास हो सकता है. अगर अनुकूल ग्रहों पर जीवन का विकास पृथ्वी से कई अरब साल पहले शुरू हुआ हो तो यह संभव है कि अनेक धरती ऐसी हो सकती हैं, जिन पर बहुत बुद्धिमान और बेहद तकनीक समृद्ध प्राणी (एलियन) का विकास हुआ हो.

20वींसदी में पारग्रहीय सभ्यता से संपर्क की चाह में सबसे पहले 1972 में नासा द्वारा अंतरिक्ष यान पायोनियर-10 सौरमंडल से बाहर भेजा गया था. उसमें सोने की प्लेट पर दूसरे ग्रहवासियों के लिए खगोल वैज्ञानिक फ्रैंक ड्रेक और कार्ल सांगा के निर्देशन में संदेश अंकित किया गया था. प्लेट पर आकाशगंगा में सौरमंडल और सौरमंडल में पृथ्वी की स्थिति दर्शाने वाला मानचित्र बनाया गया था, जिसके एक किनारे पर स्त्री-पुरुष की नग्न आकृतियां थीं. ताकि दूसरे ग्रहवासी देखकर समझ सकेें कि हम कहां रहते हैं और आकृति में कैसा दिखते हैं? पायोनियर-10 से आखिरी संदेश 22 जनवरी 2003 को मिलने के बाद नासा से उसका संपर्क टूट गया. तब वह सौरमंडल के आखिरी ग्रह प्लूटो से आगे 7.6 अरब मील दूर जा चुका था.

20वींसदी में 1988 में फ्रैंक ड्रेक ने एरिसेबो बेधशाला से विशेष रेडियो संदेश 2380 मेगा हर्ट्ज फ्रीक्वेंसी पर तीन खरब वाट की ऊर्जा से अंतरिक्ष में किसी पारग्रहीय सभ्यता से संपर्क के लिए प्रसारित किया था. कूट संकेत वाला वह संदेश आकाश में 25 हजार प्रकाश वर्ष (करीब 2.36 खरब किलोमीटर) दूर स्थित तीस लाख तारों के समूह की ओर भेजा गया था. वह संदेश एक तरह से आकाशगंगा के अन्तरतारकीय क्लब में शामिल होने के लिए आवेदन की तरह था. 21वींसदी में 2002 में भी ऐरिसेबो वेधशाला से रेडियो संदेश प्रसारित किया गया था, जिसमें परमाणु संरचना, आदमी के डीएनए की सर्पिल सीढ़ी, मनुष्य की आकृति और आबादी (जनसंख्या) के विवरण कूट संकेत में दिए गए थे.
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मेष-मीन तारासमूहों से आए सिगनल को माना गया पारग्रहीय सभ्यता का संदेश
वर्ष 2003 से 2005 के बीच पृथ्वी से करीब एक हजार प्रकाश वर्ष दूर आकाश के मेष और मीन तारा समूहों की ओर से आया सिगनल ऐरिसेबो रेडियो दूरबीन ने तीन बार ग्रहण किया था. उस सिगनल को वैज्ञानिक बिरादरी के एक समुदाय ने पारग्रहीय सभ्यता की बुदबुदाहट माना और गंभीर होने की जरूरत बताई थी. तब वैज्ञानिकों ने कहा था कि सभी देशों की सरकारों को रेडियो संदेश के रूप में तकनीकी क्षमता अर्जित कर जवाब भेजने की संयुक्त पहल करनी चाहिए. हम भले ही 2018 में मंगल पर इनसाइट लैंडर उतारने में सफल हो चुके हों और हमारी मंगल तक की पहुंच पहले के मुकाबले बेहतर हो चुकी हो, फिर भी हमारी यह कामयाबी विराट ब्रह्माण्ड में बच्चे का पहला कदम चलने के ज्ञान जैसा है. अरबों प्रकाश वर्ष की दूरी में विस्तृत ब्रह्माण्ड में बहुत लंबी अंतरिक्ष-यात्रा करने के लिए तकनीकी विकास के साथ आदमी को समय और ऊर्जा की प्रकृति को भी समझना होगा. इसलिए इंतजार अधिक तकनीकी क्षमता अर्जित करने का तो है ही, अधिक बुद्धिमान होने और अधिक आयुष्मान होने की भी प्रतीक्षा है.

एलियन को ढूंढना पृथ्वीवाासियों के लिए आत्मघाती भी
नासा के कंप्यूटर साइंटिस्ट प्रोफेसर सिल्वानो पी. कोलंबानो ने अपने शोधपत्र में तर्क दिया है कि हो सकता है, एलियन की जैविक संरचना मनुष्यों की तरह परंपरागत कार्बन संरचना पर आधारित नहीं हो. इस कारण एलियन के पृथ्वी पर आने का पता हमें नहींचल सकता. संभव है कि वे इंसानों की कल्पना से बिल्कुल अलग दिखते हों. हो सकता है कि वे आकार में सूक्ष्म हों. यदि एलियन हमसे टेक्नाालजी में काफी आगे होंगे तो हम उन्हें कैसे ढूंढ पाएंगे? जाहिर है, एलियन को लेकर आदमी को अपनी पुरानी धारणा बदलनी होगी. सवाल यह भी है कि पृथ्वी पर एलियन का आगमन कहीं किसी आक्रमणकारी की तरह न हो, जो संसाधन की तलाश में पृथ्वी पर नजर रखे हुए हों. अगर वे हमारे दुश्मन हुए तो क्या हम उनसे बच सकेेंगे? 20-21वीं सदी के अग्रणी वैज्ञानिक प्रो. स्टीफेन हाकिंग ने चेतावनी दी थी कि पृथ्वीवासियों के लिए एलियन को ढूंढऩे का प्रयास किसी बड़े संकट को आमंत्रण देने जैसा आत्मघाती हो सकता है.

संपर्क : कृष्ण किसलय, विज्ञान लेखक
एलियन
समूह संपादक, सोनमाटी मीडिया ग्रुप,
सोनमाटी-प्रेस
डालमियानगर-821305,
डेहरी-आन-सोन, जिला रोहतास (बिहार)

फोन : +91 97087 78136

ई-मेल : krishna.kisalay@gmail.com

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