ओबीसी जातीय गणना : रोहिणी आयोग किसके लिए बनेगा ‘ब्रह्मास्त्र’..?

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ओबीसी जातीय

2024 के महासमर के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष में मुद्दों पर घमासान 

विदर्भ आपला डेस्क- 
2024 के महासमर के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच शह मात का खेल पहले से ही जोरों से चल रहा है. लेकिन इसी बीच अचानक संसद के विशेष सत्र की घोषणा कर दी गई. इसके साथ विशेष अधिवेशन को लेकर तमाम तरह की अटकलें चल निकली हैं. विपक्ष की जातीय जनगणना, महंगाई, बेरोजगारी के साथ सोनिया गांधी द्वारा पेश मुद्दों के साथ ताजा तरीन G-20 सम्मलेन पर खर्च का मुद्दा भी जुड़ गया है. सत्ता पक्ष क्या विपक्ष के मिसाइलों से बचाव के लिए अपना कोई ब्रह्मास्त्र तैयार कर रहा है?

पर इन सबके बीच चर्चा का सबसे प्रमुख विषय अन्य पिछड़ा वर्ग के सब-कैटेगराइजेशन (उप वर्गीकरण) है. इस मुद्दे पर गठित न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग की एक रिपोर्ट भी चर्चा में है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि रोहिणी आयोग की यह रिपोर्ट किसका ब्रह्मास्त्र बनेगी, सत्ता पक्ष का या विपक्ष का.  

समझा जा रहा है कि सरकार इसे संसद के विशेष अधिवेशन में पेश कर सकती है. यह रिपोर्ट जुलाई में ही कमीशन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी थीं. यह रिपोर्ट ऐसे समय में सौंपी गई है, जब विपक्ष लगातार  जातीय जनगणना की मांग कर रहा है. दरअसल 26 विपक्षी पार्टियों का गठबंधन INDIA अगले साल होने वाले आम चुनाव में भाजपा को मात देने के लिए पिछड़ी और अनुसूचित जाति के वोटरों को साधने का प्रयास कर रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ओबीसी आरक्षण को सब-कैटेगरी में बांटने का पूरा मामला क्या है और जस्टिस रोहिणी आयोग की रिपोर्ट इतनी अहम क्यों है?

क्या है ओबीसी जातियों का वर्गीकरण के मामला

मंडल कमीशन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में ओबीसी जाति के सभी लोगों को  केंद्रीय एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में नामांकन से लेकर नौकरियों तक में 27 प्रतिशत का आरक्षण मिलता है.

अब दिक्कत ये है कि केंद्र सरकार की ओबीसी लिस्ट में 3,000 जातियां हैं. लेकिन कुछ ही जातियां ऐसी हैं, जो फिलहाल ओबीसी आरक्षण का लाभ उठा पा रही हैं. ऐसे में आरक्षण को सब-कैटेगरी में बांटने को लेकर बहस होती रहती है, ताकि इसका लाभ सभी जातियों को बराबर मिल सके.

सबसे पहले सितंबर 2009 में तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र भेजकर ओबीसी जनगणना की मांग उठाई थी. कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन संप्रग सरकार ने बीपीएल सर्वे में ओबीसी गणना को शामिल किया पर जातिगत जनगणना कराने की जहमत नहीं उठाई. भाजपा ने भी कभी जातिगत जनगणना का खुल कर विरोध नहीं किया. बिहार में तो भाजपा जातिगत जनगणना की मांग करने वाली सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल रही है. राजनाथ सिंह ने भी उत्तर प्रदेश में एक बार जातिगत जनगणना कराने का वादा किया था. पर भाजपा सरकार ने जातीय जनगणना के बजाय ओबीसी जातियों के सब-कैटेगराइजेशन की दिशा में कदम उठाया.

कब और क्यों बनाया गया रोहिणी आयोग

ओबीसी जातियों का वर्गीकरण के बहस के बीच केंद्र सरकार ने 2 अक्टूबर, 2017 को ओबीसी की केंद्रीय लिस्ट को बांटने के मकसद से एक आयोग बनाने की घोषणा की. इसका नाम रखा गया रोहिणी आयोग और दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी इसके अध्यक्ष बने. उनके नाम के कारण ही आयोग का नाम भी रोहिणी आयोग ही रखा गया. 2017 में गठित इस आयोग को अब तक 13 बार विस्तार मिल चुका है.

रोहिणी आयोग को सरकार ने सौंपे थे तीन काम

1. ओबीसी के अंदर अलग-अलग जातियों और समुदायों को आरक्षण का लाभ कितने असमान तरीके से मिल रहा है, इसकी जांच करना.
2. ओबीसी के बंटवारे के लिए तरीका, आधार और मानदंड तय करना और
3. ओबीसी के उपवर्गों में बांटने के लिए उनकी पहचान करना.

वर्गीकरण की जरूरत तो मुस्लिम, ईसाई व आदिवासियों में भी है

लेकिन विचारणीय है कि रोहिणी आयोग का गठन महज ओबीसी जातियों के वर्गीकरण को लेकर है. जबकि वर्गीकरण की जरूरत तो अन्य जातियों में भी है. ऐसे वर्गीकरण की जरूरत तो मुस्लिम, ईसाई सहित आदिवासियों और अन्य जातियों में भी है. इनमें भी ऐसी अनेक उप जातियां हैं, जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता है.

क्यों महत्वपूर्ण है रोहिणी आयोग?

रोहिणी आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत किया गया था. ये आयोग कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अब तक इस अनुच्छेद के तहत दो ही आयोग बनाए गए हैं. जिनमें से एक आयोग का नाम मंडल कमीशन है. मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर ही देश की 52 प्रतिशत आबादी को केंद्र सरकार की नौकरियों में और उच्च शिक्षा में 27 फीसदी आरक्षण दिया जाता है. इसी अनुच्छेद के तहत पहला पिछड़ा वर्ग आयोग यानी काका कालेलकर आयोग बना गया था. यह आयोग मंडल कमीशन से पहले बनाया गया था.

बड़ा वर्ग है ओबीसी का

अब बात रोहिणी आयोग की करें तो इसे बनाने के पीछे तर्क यह था कि देश का एक बड़ा वर्ग ओबीसी का है, जिसके अंदर हजारों जातियां हैं. ये हजारों जातियां सामाजिक विकास के क्रम में अलग-अलग स्थान पर हैं. इनमें से कुछ जातियां ऐसी भी हैं, जो आरक्षण के प्रावधानों का इस्तेमाल करने के लिए बेहतर स्थिति में है. जबकि कुछ ऐसी जातियां हैं, जो जरूरतमंद होने के बाद भी आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाती हैं.

रोहिणी आयोग की रिपोर्ट क्यों है अहम?

जानकारों की कहना है कि केंद्र सरकार ने ये कवायद समाज के ‘सबसे पिछड़े’ लोगों को लुभाने के लिए शुरू की थी. अब रोहिणी आयोग ने राष्ट्रपति को जो रिपोर्ट सौंपी है, वह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि आने वाले लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा से लेकर INDIA तक सभी पार्टियां अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटरों को अपनी तरफ करने की कोशिश में लगी हुई है. भारत में लगभग 40 प्रतिशत से ज्यादा ओबीसी मतदाता हैं और चुनाव से पहले कोई भी पार्टी सबसे बड़े वोट बैंक को छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती है.

ओबीसी वोट कितना अहम है भाजपा के लिए?

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में भाजपा के एक ओबीसी सांसद के हवाले से बताया गया है कि पार्टी ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ के लिए प्रतिबद्ध है. भाजपा यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भारत के सभी समुदायों तक सामाजिक न्याय पहुंचे. उन्होंने कहा कि पार्टी इस विषय की संवेदनशीलता को समझती है, इसलिए वह देखेगी कि कोई भी समुदाय इससे नाराज न हो.

पिछले चुनावों में ओबीसी ने दिया भाजपा का साथ

भाजपा के लिए ओबीसी वोट बैंक कितना जरूरी है, यह पिछले चुनावी नतीजों से साफ हो ही जाता है. साल 1990 के दशक में भारतीय जनता पार्टी को मंडल की राजनीति का मुकाबला करने के लिए बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ा था और इसका काट पार्टी ने हिंदुत्व में खोजने की कोशिश की.

भले ही साल 1998 और साल 1999 के लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कड़ी मेहनत कर जीत हासिल कर ली और गठबंधन सहयोगियों के साथ एनडीए सरकार का बनाने में कामयाब हो गई, लेकिन उस वक्त भी क्षेत्रीय दल बहुत मजबूत बने रहे. साल 1998 और 1999 में क्षेत्रीय दलों को क्रमश: 35.5% और 33.9% वोट मिले. इन क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक का एक बहुत बड़ा हिस्सा ओबीसी वोटरों का है.

यहां तक कि साल साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 31% वोटों के साथ अपने दम पर बहुमत हासिल किया था, क्षेत्रीय दलों को 39 प्रतिशत वोट मिले थे. लोकनीति-सीएसडीएस नेशनल इलेक्शन स्टडीज के आंकड़ों के अनुसार साल 2014 के आम चुनाव में ओबीसी वोटों का 34 प्रतिशत हिस्सा भारतीय जनता पार्टी को, जबकि 43 प्रतिशत हिस्सा क्षेत्रीय दलों को मिला था.

साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर घुसपैठ की और क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक में सेंध लगाई. इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का ओबीसी वोटों में शेयर कम होकर 26.4 प्रतिशत रह गया, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी बढ़त हासिल करते हुए 44 फीसदी ओबीसी वोट अपने पाले में किए.

रोहिणी आयोग में ओबीसी लिस्ट में उन ओबीसी जातियों को भी शामिल करने की सिफारिश की गई है, जिन्हें राज्यों में ओबीसी का दर्जा था पर वे केंद्र की लिस्ट में शामिल नहीं थीं. अति पिछड़ों के नेता ओम प्रकाश राजभर से लेकर संजय निषाद तक ओबीसी आरक्षण को वर्गीकृत करने के मुद्दे को लेकर आंदोलन तक कर चुके हैं. राजनाथ सिंह जब यूपी के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने अतिपिछड़ों को बांटने की कोशिश की पर बाद में कोर्ट में रोक लगा दी.

जून 2001 में राजनाथ सिंह द्वारा गठित सामाजिक न्याय समिति ने सिफारिश की कि 27 प्रतिशत कोटा में, यादवों का हिस्सा 5 प्रतिशत और नौ प्रतिशत में आठ जातियों को हिस्सा दिया जाए. 2002 के विधानसभा चुनावों में, भाजपा 403 में से 88 सीटों पर सिमट गई, जो 1996 में उसकी लगभग आधी थी. चुनावों में भाजपा को मिली बुरी हार के चलते उसकी फिर हिम्मत नहीं हुई कि वह दुबारा इस संबंध में कोशिश करे.

भाजपा के लिए उल्टा भी पड़ सकता है दांव

सत्तारूढ़ दल की निगाहें अपने अतिपिछड़ों वोटों को सहेजने की हैं. समझा जा रहा है कि रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट के माध्यम से OBC के बीच अति पिछड़ों और ‘मजबूत पिछड़ों’ का अंतर दिखाकर राजनीतिक लाभ लिया जा सकता है.

माना जाता रहा है कि उत्तर भारत में ओबीसी आरक्षण का लाभ यादव, कुर्मी, मौर्य, जाट, गुर्जर, लोध, माली जैसी जातियों को ही मिला है. बीजेपी के साथ दिक्कत यह है कि ओबीसी की सभी दबंग और संपन्न जातियां भाजपा की कोर वोटर बन चुकी हैं. यूपी और बिहार में यादव भाजपा के साथ नहीं हैं, पर दूसरे राज्यों में यादव भी भाजपा को वोट दे रहे हैं. रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट में अगर अतिपिछड़ों को फायदा पहुंचाने में इन संपन्न जातियों को नुकसान होता है तो भाजपा  के लिए मुश्किल हो जाएगी.

महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को साधने में सफलता

महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की ओबीसी वर्ग में आरक्षण की मांग की उग्रता थमने की का नाम नहीं ले रही. लेकिन इसे साधने के लिए इसे देखते हुए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बड़ा एलान किया है कि कुनबी जाति का प्रमाणपत्र उन लोगों को देंगे, जिनके पास निजाम काल के रिकॉर्ड हैं.

जालना में अनशन पर बैठे मनोज जारांगे ने मांग की थी कि मराठवाड़ा में मराठा समुदाय के लोगों को कुनबी प्रमाणपत्र दिया जाए. अब राज्य सरकार ने उनकी मांग पर सकारात्मक रुख अपनाया है. मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि आंदोलनकारी मांग कर रहे थे कि कुनबी प्रमाण पत्र उन लोगों को दिया जाना चाहिए, जिनके पास राजस्व और अन्य निजाम युग के रिकॉर्ड हैं.

उनकी मांग के आधार पर पिछली कैबिनेट बैठक में सरकार ने निर्णय लिया कि जिनके पास यह रिकॉर्ड होगा, उन्हें कुनबी प्रमाणपत्र दे दिया जाएगा. इस रिकॉर्ड को सत्यापित करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश संदीप शिंदे और अन्य अधिकारियों की पांच सदस्यीय समिति का गठन किया गया है. मुख्यमंत्री शिंदे ने कहा कि समिति कुछ दिशानिर्देश तय करने का काम करेगी.

लेकिन कुल मिला कर प्रश्न यह है कि जातीय जनगणना मामले की रोहिणी आयोग की यह रिपोर्ट किस करवट लेगी, किसका ब्रह्मास्त्र बनेगी. सत्ता पक्ष लाभ उठाएगा या विपक्ष बाजी मार लेगा.

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