ईपीएस पेंशनरों की त्रासदी : सर्वोच्च अदालत के मंसूबे पर नजर

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ईपीएस पेंशनरों

…हालांकि पूर्व मुख्य न्यायाधीश बोबड़े के समय में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले के विरुद्ध आवाज लगाई थी और सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 01-04-2019 को अपना निर्णय वापस ले लिया था. यह ईपीएस पेंशनरों के हित में बिलकुल ही नहीं था, फिर भी ईपीएस पेंशनरों की आशाएं अभी भी न्यायपालिका पर पूरी तरह से जमी हुई है. क्योंकि अब तक ईपीएस पेंशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के निर्णय जितने फैसले आए हैं, वे सभी न्याय पर ही आधारित और पेंशनरों के हित में आए हैं. उन्हें भरोसा है कि सर्वोच्च न्यायालय आंखें बंद कर और अपने पूर्व के फैसलों की अनदेखी कर सरकार के एसएलपी और रिव्यू पिटीशन के पक्ष में फैसला नहीं दे सकती.
आलेख :
देश के लाखों की संख्या में
गुजर चुके ईपीएस पेंशनरों में अब भी कम से कम 60 लाख ही जीवित बचे हो सकते हैं. इन वयोवृद्ध ईपीएस पेंशनरों पर भी कोरोना का कहर टूटा है. लाखों गुजर जाने वालों में कम से कम हजारों की संख्या में वे भी शामिल हो सकते हैं. लेकिन ऐसी विकट घड़ी में कम से कम देश की कोई मोदी सरकार अथवा उनकी राज्य सरकारें उनके काम नहीं आईं. इनमें से किसी सरकार ने उन्हें वित्तीय राहत पहुंचाना तो दूर, उनके बारे में कुछ सोचना भी गंवारा नहीं किया.

कोरोना महामारी के पहले दौर में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने केंद्रीय कर्मियों, निजी क्षेत्र के श्रमिकों और वर्ग के लोगों के लिए सरकार के खजाने खोल दिए. गरीब-बेसहारा लोगों के लिए मुफ्त राशन का भी प्रबंध किया और वाह-वाही लूटी. कोरोना की दूसरी लहर में फिलहाल सरकार ने अपने सभी संसाधन और तिजोरी ऑक्सीजन, दवाइयों और वैक्सीन के साथ अस्पतालों एवं चिकित्सा कर्मियों के लिए खोल दिए है. पेंशनरों के लिए क्रूर सरकार देश की आम जनता के प्रति अपनी सदासयता तो प्रदर्शित कर रही है. लेकिन लेकिन 700 से दो-ढाई हजार रुपए मासिक ईपीएस पेंशन पाने वाले 60 लाख से अधिक वयोवृद्धों की ओर ध्यान देने की जरूरत अभी नहीं नहीं समझी है.

अपने प्रति केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की इस क्रूरता के बावजूद ये ईपीएस पेंशनर मोदी की ओर ही टकटकी लगाए इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं. क्योंकि और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है. आज स्थिति ऐसी बनी हुई है कि देश की सर्वोच्च अदालत से इंसाफ के लिए भी मोदी सरकार की नजर-ए-इनायत की जरूरत है.

ईपीएस पेंशनरों के लिए नजरें टेढ़ी
प्रधानमंत्री मोदी ने ईपीएस पेंशनरों के लिए अपनी नजरें टेढ़ी कर रखी हैं. भाजपा सांसद एवं मशहूर फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी सहित अन्य सांसद और उनके ही दल के नेता प्रधानमंत्री से मिलकर ईपीएस पेंशनरों को न्यायपूर्ण और जीवन यापन करने लायक 7,500 से 9,000 रुपए मासिक तक का पेंशन देने की गुजारिश कर चुके हैं. उन सभी ने पूरे भरोसे के साथ बताया था कि प्रधानमंत्री जी ने बड़ी गंभीरता और सहानुभूति पूर्वक ध्यान पूर्वक उनकी गुजारिश सुनी और तत्काल विचार और निर्णय के लिए आदेश दिया. उन्होंने पूरे विशवास के साथ ईपीएस पेंशनरों को भरोसा दिलाया कि मोदी आप के लिए अनुकूल निर्णय लेने जा रहे हैं. लेकिन मोदीजी ने भरोसा तोड़ने का क्रम जारी रखा.

पेंशनर यह बात भूल नहीं सकते कि 2014 के पूर्व जब भाजपा विपक्ष में थी, तब वह 2012-2013 में ईपीएस पेंशनरों को न्यायपूर्ण पेंशन दिलाने की वकालत करती रही थी. राज्यसभा में तत्कालीन सांसद प्रकाश जावड़ेकर के प्रयासों से ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पेंशन की रकम तय करने के लिए भाजपा के ही सांसद भगत सिंह कोशियारी (अब महाराष्ट्र के राज्यपाल) की समिति नियुक्त की थी. कोशियारी समिति ने सभी पक्षों की सुनवाई कर न्यूनतम पेंशन 3,000 रुपए करने और साथ में इसे महंगाई निर्देशांक से भी जोड़ने की सिफारिश की. लेकिन अधिकारियों ने कमेटी की सिफारिशों पर कटौती कर सरकार को न्यूनतम पेंशन 1,000 रुपए करने का सुझाव दिया. जिसे तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने स्वीकार कर लिया. लेकिन लागू नहीं कर सकी.

2014 में ही चुनाव के बाद केंद्र में भाजपा की सरकार सत्ता में आई तो चुनाव के दौरान पेंशनरों से किए अपने वादे भूल कर पूर्व की कांग्रेस सरकार द्वारा मंजूर न्यूनतम 1,000 रुपए का पेंशन लागू कर अपनी पीठ थपथपा ली. जावड़ेकर (2014 से केंद्र में मंत्री) और कोशियारी (महाराष्ट्र के राज्यपाल) भी चुप लगा कर पिछले 7 वर्षों से सत्तासुख भोग रहे हैं.

ईपीएस-95 पेंशनर लगातार बहुत बड़ी नाइंसाफी झेलने को विवश हैं
कहां भाजपा सांसद ने 3,000 रुपए न्यूनतम पेंशन की मांग की थी, दूसरे भाजपा सांसद के ही नेतृत्व में गठित समिति ने भी 3,000 रुपए पेंशन और साथ में महंगाई भत्ता देने की सिफारिश की थी, और जब उन्हीं की भाजपा की मोदी सरकार सत्ता में आई तो उसने कांग्रेस सरकार के निर्णय का अनुसरण करते हुए मात्र 1,000 रुपए न्यूनतम ही देकर पेंशन वयोवृद्ध पेंशनरों की लाचारी बढ़ा दी है. जबकि 2014 और 2019 के चुनावों के दौरान भी भाजपा नेताओं ने ईपीएस-95 के पेंशनरों के पेंशन कोशियारी कमेटी की सिफारशों के अनुरूप करने का आश्वासन भी दिया था.

अनसुना कर रही है पेंशनरों की गुहार
आज 1,000 रुपए पेंशन पाते हुए लाखों 80 वर्ष से अधिक आयु वाले पेंशनरों के 7 वर्ष से अधिक बीत गए हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और केरल हाईकोर्ट के आदेश और स्वयं केंद्र की मौजूदा सरकार अपने सांसद दिलीप कुमार मनसुखलाल गांधी (भाजपा) कमेटी की सिफारिशों को भी नजरअंदाज करते हुए लाखों पेंशनरों की गुहार को अनसुना कर रही है.

सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान और पालन भी नहीं करती
ईपीएस पेंशनरों के लिए दुर्भाग्य की बात है कि मोदी सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान और पालन भी नहीं करती. इसका उदाहरण है- 4 सितंबर 2016 को, आरसी गुप्ता के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने पेंशनरों के पक्ष में फैसला सुनाए गए फैसले से अवगत कराया और बताया. लेकिन भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) और केंद्र सरकार ने चार साल बाद भी आदेश को पूरी तरह से लागू नहीं किया है. इन 5 वर्षों में, लगभग दो लाख वरिष्ठ पेंशनरों की मृत्यु उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुसार न्याय पाए बिना हुई है और यह संख्या हर दिन बढ़ रही है. लेकिन क्रूर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लागू करने के लिए असंवेदनशीता, भावहीनता की हद तक अनिच्छुक है.

सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल 2019 को पेंशनरों के पक्ष में एक और फैसला दिया, लेकिन केंद्र सरकार उस फैसले को भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. देश के लोगों को सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलता है, लेकिन सरकार इसकी अनुमति वृद्ध पेंशनरों के लिए नहीं दे रही. स्पष्ट है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं मानती.

इसके बावजूद ईपीएस पेंशनर देश के दो सर्वोच्च संस्थानों के फैसले का इंतजार कर रहे हैं. एक तो है केंद्र की मोदी सरकार और दूसरा है सुप्रीम कोर्ट, देश की सर्वोच्च न्यायपालिका, जो अपने पूर्व के फैसलों के बावजूद मोदी सरकार और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की एसएलपी और रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई के लिए मात्र तिथियां ही निर्धारित कर रही है.

सर्वोच्च न्यायालय के मामले में मामलों की पोस्टिंग
तीन मुख्य न्यायाधीश आए और उनके समय में इन मामलों पर निर्णय लिए जा चुके हैं. जस्टिस गोगई आए और सेवानिवृत्त हुए. जस्टिस बोबड़े आए और सेवानिवृत्त हो गए. हालांकि बोबड़े के समय में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले के विरुद्ध आवाज लगाई थी और सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 01-04-2019 को अपना निर्णय वापस ले लिया था. यह ईपीएस पेंशनरों के हित में बिलकुल ही नहीं था, फिर भी ईपीएस पेंशनरों की आशाएं अभी भी न्यायपालिका पर पूरी तरह से जमी हुई है. क्योंकि अब तक ईपीएस पेंशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के निर्णय जितने फैसले आए हैं, वे सभी न्याय पर ही आधारित और पेंशनरों के हित में आए हैं. उन्हें भरोसा है कि सर्वोच्च न्यायालय आंखें बंद कर और अपने पूर्व के फैसलों की अनदेखी कर सरकार के एसएलपी और रिव्यू पिटीशन के पक्ष में फैसला नहीं दे सकती.

अब ईपीएस पेंशनरों को कोरोना महामारी की दूसरी लहर का सामना करना पड़ रहा है. कई लोग इस महामारी के शिकार हो गए हैं और न्यूनतम पेंशन प्राप्त किए बिना इस दुनिया को छोड़ दिया है. लेकिन क्रूरता के लिए कमर कस चुकी सरकार ने न्यूनतम वित्तीय राहत पर विचार करने के लिए भी ध्यान नहीं दिया, जैसा कि 6 महीने के लिए ईपीएफ योगदान का भुगतान करने के रूप में श्रमिकों को सेवा में दिया गया था.

अब यह कोरोना ईपीएस पेंशनरों सहित गरीबों के अवशेष लूट रहा है. ईपीएस पेंशनर खुद को व्यवस्थित करने में असमर्थ हैं. इस भयानक स्थिति में.उनके पास इंतजार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. ईपीएस पेंशनरों प्रतीक्षा करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.

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