शबनम को मिलेगी फांसी या नरसंहार के अपराध में माफी..!

0
1022
शबनम
शबनम और परिजनों के संहार में मददगार उसका प्रेमी सलीम. 

कानूनी पेंच और दया याचिका में फंस गई है वह तारीख

*जीवंत के. शरण-
प्यार की परिभाषा
सभी अपनी सुविधानुसार गढ़ लेते हैं. लेकिन प्यार केवल जिस्मानी नहीं होता. प्यार में स्वार्थ, हिंसा या किसी विकृति का भी कोई स्थान नहीं होता, होता है तो त्याग या बलिदान. लेकिन प्यार की जिस्मानी खुमार में अधिसंख्य इस कदर अंधे हो जाते हैं कि अनर्थ ही कर डालते हैं. ऐसा ही अनर्थ, जघन्य अपराध किया था उत्तर प्रदेश की शिक्षित परिवार में जन्मी शबनम ने और अब जा पहुंची है फांसी के तख्ते के नजदीक.

उस दिन अमावस की रात भी नहीं थी और ना ही मौसम बेरहम था. बावजूद इसके बेहद साधारण और मासूम सी दिखने वाली बिटिया, जो दो विषयों में एमए कर चुकी थी, ने प्रेमी के साथ मिलकर अपने मां – बाप और दो भाइयों के साथ कुल सात लोगों को मौत की नींद सुला दिया था. यह खूनी खेल अंधे प्यार और लालच के लिए खेला गया था. उत्तर प्रदेश के अमरोहा  का यह घृणित मामला है तो तेरह साल पुराना. लेकिन फिर चर्चा में इसलिए आ गया है, क्यों कि अब उस कातिल बिटिया को फांसी पर लटकाने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है. कभी भी डेथ-वारंट जारी हो सकता है.

वो काली रात
14 अप्रैल, 2008 को अमरोहा के गांव बामन खेड़ी में शबनम के माता-पिता और अन्य गहरी नींद में सोए थे. उसी समय प्रेमी सलीम के आने के बाद दोनों ने मिलकर कुल्हाड़ी से कुल सात लोगों की गर्दन पर वार कर हत्या कर दी थी. दरअसल शबनम के घर के निकट एक आरा मशीन पर सलीम मजदूरी करता था. शबनम पर उसके प्यार का भूत सवार हो गया. घर वालों को वह नींद की गोली दे कर सब को गहरी नींद में सुला दिया करती थी. सलीम के साथ अपनी इस घिनौनी हरकत के बाद शबनम गर्भवती हो गई. लाख मनाने के बावजूद शबनम के घर वाले उसकी शादी सलीम से करने के लिए तैयार नहीं थे. परिणाम भयानक निकला. दोनों ने मिलकर उस रात जघन्य सामूहिक नरसंहार  को अंजाम दे दिया.

गर्भवती थी शबनम
घटना के समय शबनम दो माह की गर्भवती थी. उधर हत्या के बाद सलीम फरार हो गया था. शबनम की मनगढ़ंत कहानियां बनाने के बावजूद शक की बिनाह पर पुलिस उसे हिरासत में ले कर पूछताछ करने लगी. उधर सलीम भी गिरफ्तार हो गया और उसने पूरी खूनी कहानी उगल दी. यही नहीं उसने पुलिस को बतौर सबूत वह कुल्हाड़ी भी बरामद करवाया जिससे हत्या को अंजाम दिया गया था. बाद में शबनम ने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया. प्यार में अंधी शबनम ने एक मात्र जीवित बचे अपने ग्यारह माह के भतीजे को भी गला घोंट कर शांत कर दिया था. शबनम और प्रेमी सलीम दोनों को फांसी की सजा मिली है.

बेटे को पाल रहा पत्रकार
उधर जेल में बंद गर्भवती शबनम की जेल नियमावली के अनुसार स्वास्थ्य सुविधाएं भी दी जा रही थी. उसने मुरादाबाद जेल में ही बेटे को जन्म दिया था. नाम रखा ताज. बेटा सात साल तक जेल में मां के साथ ही रहा. इस दरम्यान एक पत्रकार उस्मान सैफी शबनम पर एक पुस्तक लिखने के लिए अक्सर जेल जाया करते थे. अनेक बार मिलने के कारण उस्मान को ताज से लगाव हो गया. नियमों के अनुसार ताज को चाइल्ड केयर सेंटर भेजने की तैयारी शुरू हो गई थी. लेकिन उस्मान सैफी ने कानूनी कार्यवाही कर ताज को गोद ले लिया. उस्मान और उनकी बेगम अपनी संतान की तरह ताज को पाल रहे हैं. वह अपनी मां की तरह पढ़ाई में भी तेज है और बुलंदशहर के ही एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ाई कर रहा है. उस्मान चाहते हैं कि बच्चा उच्च शिक्षा प्राप्त करे और एक अच्छा इंसान बने, क्यों कि मां के अपराध करने की सजा बच्चे को तो नहीं मिलनी चाहिए. बहरहाल हर महीने जेल जा कर अपनी मां से मिलने वाले ताज ने बेहद भावुकता से भरा पत्र राष्ट्रपति से पत्र लिखकर मां की फांसी रद्द करने के लिए प्रार्थना की है.

उधर फांसी से बचाने के लिए ही उसके वकील ने यह नई दया याचिका रामपुर जेल के जरिए राज्यपाल के पास डलवाई है. इस दया याचिका की वजह से ही शबनम की फांसी की तारीख मुकर्रर नहीं हो पाई. अब उसकी दया याचिका राजभवन से राष्ट्रपति के पास भेजी जाएगी. शबनम के डेथ वारंट पर अगली सुनवाई इस दया याचिका पर राष्ट्रपति के फैसले के बाद ही हो सकेगी.

ताज का पिता सलीम फिलहाल इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद है. सलीम भी दया याचिका दायर करने का हकदार है. उसकी याचिका के कारण भी अभी टल सकती है शबनम की फांसी. वैसे मथुरा जिला कारागार स्थित फांसी घर में उसे लटकाने की पूरी तैयारी भी कर ली गई है. यदि ऐसा होता है, तो फांसी पर लटकने वाली आजाद भारत की शबनम पहली महिला मुजरिम होगी. लेकिन फांसी के तख्ते पर पहुँचाने से पहले अभी कई कानूनी पेंच भी हैं.

चार दिनों में सच आ गया था सामने
पुलिस सबूत जुटाती गई. हत्या का मकसद, सबूत और गवाह के सामने आने के बाद केस चार दिनों में ही सुलझ चुका था. लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 3 अगस्त, 2010 को अमरोहा की जिला एवं सत्र अदालत ने शबनम और सलीम को फांसी की सजा सुनाई थी. बाद में 4 मई, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी फांसी की सजा बरकरार रखी. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2015 में फांसी की सजा को बरकरार रखा. राष्ट्रपति ने भी शबनम की दया याचिका को खारिज कर दिया है. फांसी पर लटकने के पूर्व एक बार फिर शबनम ने फरवरी में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर फांसी की सजा माफ करने की गुहार लगाई है. मुख्य न्यायाधीश एस.के. बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने बहस सुन कर फैसला सुरक्षित रख लिया है. फिलहाल शबनम को रामपुर जेल में बंद है.

NO COMMENTS