‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान का दर्जा के लिए याचिका, सुनवाई आज

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'वंदे मातरम'

नई दिल्ली : बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय रचित ‘वंदे मातरम’ (राष्ट्रगीत) को ‘ जन गण मन’ (राष्ट्रगान) के बराबर का दर्जा दिलाने की मांग अदालत पहुंच गई है. इसको लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है. सोमवार, 22 जुलाई को दाखिल की गई याचिका में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने की मांग की गई है. इस याचिका पर कल मंगलवार, 23 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हो सकती है.

यह याचिका भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है. याचिका में कहा गया है कि ‘वंदे मातरम’ को आज तक राष्ट्रगान के समान दर्जा नहीं मिला. ऐसे में हाईकोर्ट को इस मामले में दखल देना चाहिए. याचिका में उपाध्याय ने मांग की है कि सभी स्कूलों में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के तौर पर बजाया जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने इसके संबंध में एक दिशा निर्देश बनाने की भी मांग की है.

वंदे मातरम का इतिहास
स्व. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने सुविख्यात उपन्यास ‘आनंदमठ’ में वंदे मातरम् का समावेश किया था. लेकिन इस गीत को ‘आनंदमठ’ उपन्यास लिखने के पहले ही उन्होंने रच दिया था. अपने देश को मातृभूमि मानने की भावना को प्रज्वलित करने वाले कई गीतों में यह गीत सबसे पहला है.

‘वंदे मातरम्’ के दो शब्दों ने देशवासियों में देशभक्ति के प्राण फूंक दिए थे और आज भी इसी भावना से ‘वंदे मातरम्’ गाया जाता है. हम यों भी कह सकते हैं कि देश के लिए सर्वोच्च त्याग करने की प्रेरणा देशभक्तों को इस गीत से ही मिली.

‘बंग भंग आंदोलन’ और ‘असहयोग आंदोलन’ में ‘वंदे मातरम्’ की थी प्रभावी भूमिका
पीढ़ियों बाद भी ‘वंदे मातरम्’ का प्रभाव अब भी कायम है. ‘आनंदमठ’ उपन्यास के माध्यम से यह गीत प्रचलित हुआ. उन दिनों बंगाल में ‘बंग-भंग’ का आंदोलन उफान पर था. ‘बंग भंग आंदोलन’ और महात्मा गांधी के ‘असहयोग आंदोलन’ दोनों में ‘वंदे मातरम्’ ने प्रभावी भूमिका निभाई. स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए यह गीत पवित्र मंत्र बन गया था.

‘आनंदमंठ’ 5 वर्ष पहले लिखा गया था ‘वंदे मातरम्’
बंकिम बाबू ने ‘आनंदमठ’ उपन्यास सन् 1880 में लिखा. कलकत्ता की ‘बंग दर्शन’ मासिक पत्रिका में उसे क्रमशः प्रकाशित किया गया. अनुमान है कि ‘आनंदमंठ’ लिखने के करीब 5 वर्ष पहले बंकिम बाबू ने ‘वंदे मातरम्’ को लिख दिया था. गीत लिखने के बाद यह यों ही पड़ा रहा. पर ‘आनंदमठ’ उपन्यास प्रकाशित होने के बाद लोगों को उसका पता चला.

ऐसे रचा गया था वंदे मातरम
इस संबंध में एक दिलचस्प किस्सा है. बंकिम बाबू ‘बंग दर्शन’ के संपादक थे. एक बार पत्रिका का साहित्य कम्पोज हो रहा था. तब कुछ साहित्य कम पड़ गया, इसलिए बंकिम बाबू के सहायक संपादक रामचंद्र बंदोपाध्याय बंकिम बाबू के घर पर गए और उनकी निगाह ‘वंदे मातरम्’ लिखे हुए कागज पर गई. कागज उठाकर श्री बंदोपाध्याय ने कहा, फिलहाल तो मैं इससे ही काम चला लेता हूं. पर बंकिम बाबू तब गीत प्रकाशित करने को तैयार नहीं थे. यह बात सन् 1872 से 1876 के बीच की होगी. बंकिम बाबू ने बंदोपाध्याय से कहा कि आज इस गीत का मतलब लोग समझ नहीं सकेंगे. पर एक दिन ऐसा आएगा कि यह गीत सुनकर सम्पूर्ण देश निद्रा से जाग उठेगा.

एक किस्सा और…
इस संबंध में एक किस्सा और भी प्रचलित है. बंकिम बाबू दोपहर को सो रहे थे. तब बंदोपाध्याय उनके घर गए. बंकिम बाबू ने उन्हें ‘वंदे मातरम्’ पढ़ने को दिया. गीत पढ़कर बंदोपाध्याय ने कहा, ‘गीत तो अच्छा है, पर अधिक संस्कृतनिष्ठ होने के कारण लोगों की जुबान पर आसानी से चढ़ नहीं सकेगा.’ सुनकर बंकिम बाबू हंसे. वे बोले, ‘यह गीत सदियों तक गाया जाता रहेगा.’ सन् 1876 के बाद बंकिम बाबू ने बंग दर्शन की संपादकी छोड़ दी.

सन् 1875 में बंकिम बाबू ने एक उपन्यास ‘कमलाकांतेर दफ्तर’ प्रकाशित किया. इस उपन्यास में ‘आभार दुर्गोत्सव’ नामक एक कविता है. ‘आनंदमठ’ में संत-गणों को संकल्प करते हुए बताया गया है. उसकी ही आवृत्ति ‘कमलाकांतेर दफ्तर’ के कमलकांत की भूमिका निभाने वाले चरित्र के व्यवहार में दिखाई देती है. धीर-गंभीर देशप्रेम और मातृभूमि की माता के रूप में कल्पना करते हुए बंकिम बाबू गंभीर हो गए और अचानक उनके मुंह से ‘वंदे मातरम्’ शब्द निकले. यही इस अमर गीत की कथा है.

कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाया था ‘वंदे मातरम’
सन् 1896 में कलकत्ता में काँग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ. उस अधिवेशन की शुरुआत इसी गीत से हुई और गायक कौन थे पता है आपको? गायक और कोई नहीं, महान साहित्यकार स्वयं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर थे. कितना भाग्यशाली गीत है यह, जिसे सबसे पहले गुरुदेव टैगोर ने गाया.

यह भी माना जाता है कि बंकिम बाबू एक कीर्तनकार द्वारा गाए गए एक कीर्तन गीत ‘एसो एसो बंधु माघ आंचरे बसो’ को सुनकर बेहद प्रभावित हुए. गीत सुनकर गुलामी की पीड़ा का उन्होंने तीव्र रूप से अनुभव किया.

देश को आत्मसम्मान दिया
इस एक गीत ने भारतीय युवकों को एक नई दिशा-प्रेरणा दी, स्वतंत्रता संग्राम का महान उद्देश्य दिया. मातृभूमि को सुजलाम्-सुफलाम् बनाने के लिए प्रेरित किया. ‘वंदे मातरम्’ इन दो शब्दों ने देश को आत्मसम्मान दिया और देशप्रेम की सीख दी. हजारों वर्षों से सुप्त पड़ा यह देश इस एक गीत से निद्रा से जाग उठा. तो ऐसी दिलचस्प कहानी है वंदे मातरम् गीत की.

मुस्लिमों को आपत्ति
वंदे मातरम को सबसे पहले आजादी के आंदोलनों के दौरान बंगाल में गाया जाता था. धीरे-धीरे ये पूरे देश में लोकप्रिय हो गया. इसे कांग्रेस के अधिवेशनों में भी गाया जाता था, लेकिन बाद में इसे लेकर मुस्लिमों को आपत्ति होने लगी. कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर इसलिए आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है.

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