मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाएंगे, वेलेंटाइन डे अपनी संस्कृति नहीं

मातृ-पितृ पूजन दिवस अपनी संस्कृति के जतन के लिए मनाया जाता है. ...वेलेंटाइन डे मनाना हमारी संस्कृति नहीं है. हम भारतीय सामाजिक प्रेम और सद्भाव में विश्वास करते हैं. इसलिए हम होली का त्यौहार मनाते हैं. हम भारतीयों को वेलेंटाइन डे जैसी विकृत परम्परा का अनुशरण करने की जरूरत नहीं है...

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मातृ-पितृ

नागपुर : वेलेंटाइन डे मनाना हमारी संस्कृति नहीं है, विश्व सिंधी सेवा संगम विदर्भ महिला टीम द्वारा शुक्रवार को जरिफ्टका में सबेरे 11 बजे राजकुमार केवलरमानी स्कूल में मातृ-पितृ दिवस मनाया जाएगा. अध्यक्ष श्रीमती कंचन जग्यासी, उपाध्यक्ष नीलम आहूजा, महासचिव रिचा केवलरमानी, लता भागिया ने बताया इस अवसर स्कूल के बच्चे अपने माता-पिता को पुष्पहार पहनाकर उनकी विधिवत आरती पूजन करेंगे. माथे पर तिलक लगा कर उनकी परिक्रमा कर भगवान से उनकी दीर्धायु की कामना  करेंगे.  

इस अवसर पर माता-पिता भी अपने बच्चों को तिलक लगा कर और पुष्पहार पहनाएंगे और उनके उज्वलमय भविष्य की कामना कर उनका मुंह मीठा करेंगे. वेलेन्टाइन डे की जगह यह मातृ-पितृ पूजन का दिन मना कर भारतीय संस्कृति की परंपरा से बच्चों को परिचित कराया जाएगा. पूजन समारोह में प्रताप मोटवानी, दादा विजय केवलरामनी, विजय विधानी, कैलाश केवलरामनी और विश्व सिंधी सेवा संगम की महिलाएं समिलित होंगी.

भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाएं यह दिन- प्रताप मोटवानी
विश्व सिंधी सेवा संगम की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष प्रताप मोटवानी ने कहा कि मातृ-पितृ पूजन दिवस 14 फरवरी को मनाया जाता है. इस दिन बच्चे माता-पिता का पूजन करते हैं. उन्होंने कहा कि आज सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे दुनियाभर से करोड़ों लोग मातृ-पितृ पूजन दिवस का समर्थन करते हैं. यह अपनी संस्कृति के जतन के लिए मनाया जाता है. उन्होंने कहा कि वेलेंटाइन डे मनाना हमारी संस्कृति नहीं है. हम भारतीय सामाजिक प्रेम और सद्भाव में विश्वास करते हैं. इसलिए हम होली का त्यौहार मनाते हैं. हम भारतीयों को वेलेंटाइन डे जैसी विकृत परम्परा का अनुशरण करने की जरूरत नहीं है.  

गणेश जी ने माता पार्वती और पिता शिव जी की पूजा और परिक्रमा की थी
इस विषय में मोटवानी ने एक पौराणिक कथा किया और बताया कि- एक बार भगवान शंकर जी और पार्वती जी के दोनों पुत्रों कार्तिकेय जी और गणेश जी में होड़ लगी कि कौन बड़ा? निर्णय लेने के लिए दोनों शिव-पार्वती जी के पास गए. शिव-पार्वती ने कहा कि जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुंचेगा, उसी को बड़ा माना जाएगा. कार्तिकेय जी तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गए पृथ्वी की परिक्रमा करने. लेकिन गणेश जी ने ध्यान किया तो उन्हें उपाय मिल गया. फिर गणेश जी ने शिव-पार्वती की सात प्रदक्षिणा कर ली, क्योंकि सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता-पिता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है. तब से गणेश जी प्रथम पूज्य हो गए. और यही भारतीय संस्कृति की सीख है.

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