जैव विविधता संरक्षण के लिए शहरों में जंगलों का प्रवेश जरूरी

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जैव विविधता

जैव विविधता पर आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में वक्ताओं के विचार

नागपुर : जैव विविधता संरक्षण का अब एक ही उपाय है कि अब शहरों में जंगलों का प्रवेश कराना सुनिश्चित किया जाना चाहिए. यह विचार प्रो. अनिल के. गुप्ता ने प्रस्तुत किए. जैव विविधता संरक्षण पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार में उन्होंने यह बात कही.
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वेबिनार का आयोजन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, गृह मंत्रालय, नई दिल्ली और दादा रामचंद बाखरू सिंधू महाविद्यालय, नागपुर द्वारा संयुक्त रूप से किया गया. एनआईडीएम के कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल मनोज कुमार बिंदल के मार्गदर्शन में इस प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया गया.

एनआईडीएम के ईसीडीआरएम विभाग प्रमुख प्रो. अनिल के. गुप्ता ने अपने मुख्य भाषण में कहा कि अनेक गांव सहित अधिकांश क्षेत्र शहरों में परिवर्तित होते जा रहे हैं, प्राकृतिक जंगल दिन-ब-दिन कमजोर होते जा रहे हैं. यह वायु गुणवत्ता और जल संसाधनों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है. इसका एकमात्र समाधान यह है कि “यदि शहर जंगलों में प्रवेश कर रहे हैं, तो जंगल को भी शहरों में प्रवेश करना चाहिए.” यही कारण है कि “शहरी वन और शहरी विविधता” की नई अवधारणा सामने आई है, और यही कारण है कि नया शहर विकास प्रोटोकॉल कहता है कि शहर के भीतर अब हमारे पास जंगल हैं. यह विश्व स्तर पर नए नियोजन का दृष्टिकोण है.

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए सिंधी हिंदी विद्या समिति के अध्यक्ष एच.आर. बाखरू ने कहा कि भावी पीढ़ी के लिए स्थायी लाभ के लिए जैव विविधता संरक्षण आवश्यक है. यह पेड़ों की कटाई को रोकने, जानवरों के शिकार पर प्रतिबंध लगाने, प्राकृतिक संसाधनों के कुशल उपयोग, राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों, जैव विविधता हॉटस्पॉट और जीन अभयारण्यों की रक्षा से प्राप्त किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज को संरक्षण रणनीति विकसित करनी चाहिए जो कि हमारी भावी पीढ़ी से समझौता किए बिना उनकी जरूरतों को पूरा करे.

सिंधी हिंदी विद्या समिति के चेयरमॅन डॉ. विंकी रूघवानी ने कहा कि आर्थिक विकास बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन फिर हमें विकास और जैव विविधता के बीच संतुलन बनाए रखना होगा, क्योंकि अंततः यह संतुलन ही हमें मानव जीवन में एक अच्छी जीवन शैली देगा.

सिंधी हिंदी विद्या समिति के महासचिव डॉ. आई.पी. केसवानी ने कहा कि इस ब्रह्मांड के प्रत्येक घटक को अपने मूल रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए, इसलिए यदि किसी प्रकार का विकास कहीं होता है और अन्य प्रजातियां प्रभावित होती हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह देखना हमारा कर्तव्य बन जाएगा कि वे संरक्षित हैं.

कार्यक्रम की शुरुआत एनआईडीएम सलाहकार और संकाय सदस्य आशीष कुमार पांडा द्वारा की गई, परिचयात्मक भाषण डीआरबी सिंधू महाविद्यालय के कार्यकारी प्राचार्य डॉ. संतोष वी. कसबेकर द्वारा दिया गया. उपप्राचार्य डॉ. सतीश तेवानी ने समापन भाषण दिया.

वेबिनार के संयोजक और दादा रामचंद बाखरू सिंधू महाविद्यालय के रजिस्ट्रार नवीन महेशकुमार अग्रवाल ने बताया कि जूम मंच पर 100 प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों और प्रतिनिधियों की मौजूदगी और लाइव यूट्यूब स्ट्रीमिंग पर 1000 से अधिक प्रतिभागियों की उपस्थिति के साथ कार्यक्रम ने बड़ी सफलता प्राप्त की. इसमें भारत के लगभग सभी राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ विदेशों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया.

वेबिनार में कुल 4 तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिसमें आशीष कुमार पांडा ने “पर्यावरण में गिरावट और जैव विविधता संरक्षण”: विषय पर, इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी, बरेली, उत्तरप्रदेश के सहायक प्राध्यापक अवधेश कुमार ने “एस.एंडटी. नवाचारों के लिए जैव विविधता संरक्षण” पर, सिंधू महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. मिलिंद शिनखेड़े ने “मधु मक्खियों की विविधता और संरक्षण” विषय पर तथा सहायक प्राध्यापक डॉ. योगेश भूते ने “भारत में जैव विविधता : जोखिम और संरक्षण रणनीति” विषय पर व्याख्यान दिया.

कार्यक्रम का संचालन डीआरबी सिंधू महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ जयंत वालके द्वारा किया गया, जबकि रजिस्ट्रार और कार्यक्रम संयोजक नवीन महेशकुमार अग्रवाल ने धन्यवाद किया.

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