अन्याय की आशंका के साथ न्याय का इंतजार है पेंशनरों को

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अन्याय

CJI बोबड़े को ईपीएस 95 पेंशनर्स का उम्मीद भरा पत्र, पूर्व CJI गोगोई के बयान के सन्दर्भ में

 
वरिष्ठ EPS 95 पेंशनर दादा तुकाराम झोड़े ने भारत के सुप्रीम कोर्ट (SC) के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद बोबड़े को हाल ही में एक और पत्र भेजा है. पत्र में उन्होंने गंभीर चिंता जताई है. उनकी यह चिंता SC के ही पूर्व CJI जस्टिस रंजन गोगोई, जो अब राज्यसभा में सरकार के नामित सदस्य भी हैं, के उस बयान को लेकर है, जिसमें उन्होंने जो कुछ भी कहा है, उसका स्पष्ट भावार्थ यही है कि देश के आम आदमी को वर्तमान न्याय व्यवस्था से न्याय नहीं मिलता और उन्हें न्याय की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए. लेकिन अब तो अन्याय होने की आशंका भी सताने लगी है. उन्होंने पत्र में जस्टिस बोबड़े से कहा है कि देश का आम आदमी अदालतों को न्याय का मंदिर मानता है और उससे न्याय पाने की ही उम्मीद भी करता है. इसके साथ ही पत्र में दादा झोड़े ने EPS 95 पेंशनरों की व्यथा भी सुनाई है. झोड़े जी के इस पत्र से देश के असहाय 68 लाख पेंशनरों की पीड़ा और भय दोनों की साफ झलक मिलाती है. आइए, देखें उन्होंने कैसे दर्द बयां की है-  

झोड़े ने बताया है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और अब राज्यसभा के सांसद रंजन गोगोई ने मीडिया में बयान दिया कि “भारतीय न्यायपालिका जीर्ण-शीर्ण है और आम आदमी को अदालतों में न्याय नहीं मिलता है.” माननीय गोगोई न्यायपालिका में सर्वोच्च पद पर रहे हैं और वर्तमान में राज्यसभा के सदस्य हैं. इसलिए, यह स्वाभाविक है कि उनके बयान से लोगों के मन में चिंता और भ्रम पैदा होना चाहिए. 

उन्होंने बताया है कि देश में लगभग 68 लाख ईपीएस 95 सेवानिवृत्त लोगों को सर्वोच्च न्यायालय से न्याय का इंतजार कर रहे हैं. झोड़े ने विस्तार से जानकारी देने का भी प्रयास किया है. उन्होंने बताया है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) से लगभग दस अपीलों को खारिज करने के बाद, आर.सी. गुप्ता के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने पेंशनरों के पक्ष में 4-10-2016 को फिर से फैसला सुनाया. यह रंजन गोगोई की उसी बेंच द्वारा दिया गया था. यह निर्णय EPFO ने अपने DT/23-03-2017 के परिपत्र के अनुसार, सभी पेंशनरों के मामले में इसे लागू करने का निर्णय लिया गया है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया. आज, देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 1,000 से अधिक मामले और सुप्रीम कोर्ट में लगभग 60 मामले दर्ज किए गए हैं, और अब तक छह उच्च न्यायालयों ने सेवानिवृत्त लोगों के पक्ष में फैसला सुनाया है, लेकिन बुजुर्ग पेंशनरों को न्याय नहीं मिल रहा है.

परिणामस्वरूप, पिछले तीन वर्षों में लगभग 1 लाख 75 हजार बुजुर्ग पेंशनर्स जान से हाथ धो बैठे, उन्हें न्याय नहीं मिला. इनमें से अधिकांश बुजुर्ग वैसे भी थे, जो अपना वृद्धावस्था जन्य बीमारियों का अपनी अत्यंत अल्प पेंशन राशि से अपना इलाज नहीं करा सके. यह अन्याय नहीं तो और कया है..! 

दूसरे, केरल उच्च न्यायालय ने एक साथ 507 रिट याचिकाओं पर सुनवाई के बाद 12-10-2018 को पेंशनरों के पक्ष में फैसला सुनाया था. EPFO ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 1-04-2019 को खारिज कर दिया था और केरल हाईकोर्ट के फैसले को सही करार देते हुए पेंशनर्स के पक्ष में फैसला सुनाया था. 

जब रंजन गोगोई मुख्य न्यायाधीश थे, तब मुख्य न्यायाधीश सहित तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा यह फैसला दिया गया था. लेकिन EPFO ने इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर कर दी है. यह पुनर्विचार याचिका 2019 से 2021 तक लंबित थी और अब, लगभग दो साल बाद, मुख्य न्यायाधीश की तीन-न्यायाधीश पीठ ने इसे मंजूरी दे दी और उच्चतम न्यायालय (कोर्ट नंबर 4, माननीय) से 1-04-2019 का निर्णय पारित किया.(जस्टिस उदय उमेश ललित की बेंच, आदेश दिनांक 29-01-2021) को रद्द कर दिया गया और मूल याचिका को नए सिरे से सुनवाई के लिए लिया गया. नतीजतन, बुजुर्ग गरीब पेंशनर्स के लिए न्याय में न केवल देरी रही है, बल्कि अन्याय की आशंका होने लगी है. 

सुप्रीम कोर्ट ने 4-10-2016 को आर.सी. गुप्ता मामले में पेंशनरों के पक्ष में फैसला दिया था. उसके बाद, पिछले चार वर्षों से, वरिष्ठ पेंशनर्स अपने जीवन के अंतिम वर्षों के लिए अपनी सेवानिवृत्ति के लिए लड़ रहे हैं. लेकिन उन्हें अभी तक न्याय नहीं मिला है. 

यह कैसी सरकार है, जो बुजुर्ग पेंशनरों के लिए न्याय के रास्ते में रुकावट पैदा कर रही है.इतना ही नहीं, देश के महाधिवक्ता (अटॉर्नी जनरल) ने सुप्रीम कोर्ट में गैर-जिम्मेदाराना बयान देकर अदालत को गुमराह करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और कानून के फैसले के अनुसार पेंशन का भुगतान करना संभव नहीं है.
 
ईपीएस 95 रिटायरमेंट स्कीम भारत सरकार की एक कल्याणकारी योजना है और इसी कारण से सुप्रीम कोर्ट ने पहले फैसला दिया था कि यह योजना संविधान के दायरे में उपयुक्त है. इसलिए इस योजना को ठीक से लागू करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है. लेकिन अब EPFO और केंद्र सरकार इस योजना को केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजना मानने के लिए तैयार नहीं हैं. अधिकांश सेवानिवृत्त लोग 70 से 80 वर्ष की आयु के हैं और उनमें से अधिकांश को प्रति माह 700 से 800 रुपये पेंशन मिलती है. वे इसमें कैसे रहते हैं? यह नहीं माना जाता है. ऐसे में इस बात को लेकर भ्रम की स्थिति है कि क्या बुजुर्ग गरीब सेवानिवृत्त लोगों को न्याय मिलेगा..? या अन्याय से ही उनका सामना होगा. 

झोड़े ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबड़े से कहा है, “जब, अदालतों को न्याय का मंदिर कहा जाता है और न्यायाधीशों को न्याय का देवता कहा जाता है तो इन बुजुर्ग गरीब पेंशनर्स को न्याय के मंदिर में न्याय के देवता से न्याय मिलने की उम्मीद है और उन्हें मृत्यु से पहले पेंशन और न्याय मिलने की उम्मीद है कानून और वह भी सुप्रीम कोर्ट के पहले के (2016 के) फैसले के अनुसार. लेकिन यह तभी होगा जस्टिस रंजन गोगोई का कथन गलत हो जाए. यह विश्वास पक्का हो सके कि “न्यायालयों में न्याय दिया जाएगा” को मजबूत किया जाएगा और साथ ही, देश के बुजुर्ग पेंशनरों के जीवन का अंतिम चरण सम्मानजनक और सुरक्षित हो सके. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की उम्मीद है.

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