पीके का अस्तित्व जुड़ा प.बंगाल में ममता, टीएमसी के भविष्य से

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पीके

राज्य विधानसभा चुनाव के मतदान का पहला चरण शनिवार, 27 मार्च को

पीके ने दो महीने पहले ट्वीट कर कहा था, “मीडिया का एक वर्ग भाजपा के समर्थन में माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन असल में भाजपा दहाई के आंकड़े को पार करने के लिए संघर्ष करेगी. इस ट्वीट को सुरक्षित कर लीजिएगा, अगर बंगाल में भाजपा कुछ बेहतर कर लेती है, मुझे जरूर यह स्पेस छोड़ देनी चाहिए.” पीके के इसी विश्वास से जुड़ी ममता बनर्जी भी चुनावी रैलियों में कहती हैं, “भाजपा सिर्फ टीवी चैनलों और पोस्टरों में ही दिखती है.”
*जीवंत के. शरण-
विश्लेषण :
पश्चिम बंगाल में टीएमसी (तृण मूल कांग्रेस) की प्रतिष्ठा के साथ विधानसभा चुनाव हालांकि ममता बनर्जी के लिए भी अस्तित्व की लड़ाई है. लेकिन, इसे जीत में बदलने का सारा दामोदार धुरंधर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर उर्फ ‘ पीके ‘ के कन्धों पर है. राज्य में पहले चरण का मतदान शनिवार, 27 मार्च को होगा. अतः पीके अब टीएमसी के लिए अपनी टीम के साथ युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं. परिणाम भी नजर आ रहा है. भाजपा के तूफानी प्रचार के बीच टीएमसी अभी तक मजबूती के साथ टक्कर देती नजर आ रही है.

पीके को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके के सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी ने टीएमसी का चुनाव राजनीतिकार बनाया है. टीएमसी की प्रतिष्ठा के साथ भाजपा ने इस चुनाव को ममता बनर्जी के लिए जीवन-मरण की लड़ाई बना कर रख दी है. पीके की फर्म ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी’ (IPAC) ने टीएमसी की चुनावी बागडोर तकरीबन अपने एक हजार स्टाफ के साथ संभाल रही है. युद्ध स्तर पर उन्होंने काम शुरू कर दिया है. पार्टी के शीर्ष नेताओं से हरी झंडी मिलने के बाद उनकी चुनावी रणनीति लागू हो गई है और इसके तहत टीएमसी में बड़े पैमाने पर सांगठनिक बदलाव भी कर दिए गए.

लेकिन, यहीं से पीके के खिलाफ पार्टी में माहौल भी बनना आरंभ हो गया. चूंकि पीके को शीर्ष नेताओं का समर्थन है, लिहाजा पार्टी उनकी रणनीति की राह पर आगे चलती जा रही है. दूसरी ओर जमीनी सत्य यह भी है कि कुछ वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी के साथ पार्टी में बाहर से आए व्यक्ति की रणनीति को लागू करना सरल नहीं होता. उनकी रणनीतिक सफलता इस रूप में भी देखा जा रहा है कि मुकाबले में कांग्रेस और सीपीएम मुकाबले में दूर-दूर तक नहीं हैं. लेकिन, वोटों के ध्रूवीकरण में भारतीय जनता पार्टी का बड़े हिस्से पर प्रभाव बढ़ाना, पीके के लिए चिता का विषय बन गया है.

शुभेंदु अधिकारी ने दिया पहला गहरा आघात
शुभेंदु अधिकारी के भाजपा में चले जाने से पीके के विजय अभियान के सुनहरे सपने को पहला गहरा आघात पहुंचा है. इसके बाद यह सिलसिला जारी ही है और इसके साथ पार्टी में विरोध के दबे स्वर भी. उनका ऐसा आंतरिक विरोध सिर्फ टीएमसी में ही नहीं हो रहा. इससे पूर्व भाजपा के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 में बिहार के महागठबंधन के विधानसभा चुनाव में भी विरोध के स्वर उठे थे. लेकिन विगत दोनों चुनावों में उन्हें सफलता मिली और वे हीरो बन कर उभरे. लेकिन इस बार भाजपा की आंधी से बंगाल में लगता है – निश्चोयी खैला होबे..!

पीके ने दो महीने पहले ट्वीट कर कहा था, “मीडिया का एक वर्ग भाजपा के समर्थन में माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन असल में भाजपा दहाई के आंकड़े को पार करने के लिए संघर्ष करेगी. इस ट्वीट को सुरक्षित कर लीजिएगा, अगर बंगाल में भाजपा कुछ बेहतर कर लेती है, मुझे जरूर यह स्पेस छोड़ देनी चाहिए.” पीके के इसी विश्वास से जुड़ी ममता बनर्जी भी चुनावी रैलियों में कहती हैं, “भाजपा सिर्फ टीवी चैनलों और पोस्टरों में ही दिखती है.”

बहरहाल, मतदान का समय आ गया है. चुनाव के पहले चरण की वोटिंग कल (27 मार्च) पांच जिलों में होने जा रही है. दक्षिणी प.बंगाल की 30 विधानसभा सीटों पर 191 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला होने वाला वाला है. टीएमसी के मुकाबले भाजपा ही यहां मैदान में है.

वैसे राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव का खेल अब बेहद निराला हो गया है. ‘अपने नेता’ कब अवसरवादी हो कर पाला बदल ले, राजनीति के मठाधीशों के लिए भी कहना मुश्किल हो गया है. प.बंगाल में टीएमसी नेताओं के पाला बदलने का क्रम थम ही नहीं रहा है. जाहिर तौर पर भाजपा ने अपनी रणनीति कुछ ऐसी ही बनाई है और केन्द्र के स्टार नेताओं के साथ अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया है.  

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