एनएमसी बिल : सरकार कर रही डॉक्टरी का इलाज!

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एनसीआई

जीवंत के. शरण
राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (एनएमसी) बिल
के विरोध में पिछले दिनों देश के डॉक्टर तीन दिवसीय हड़ताल समाप्त कर वापस काम पर लौट गए हैं. केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के समझाने के बाद नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक (एनएमसी) का विरोध कर रहे डॉक्टरों ने हड़ताल खत्म कर दी है. डॉक्टर इस बिल को अपने खिलाफ बताते हुए देशभर में लगातार प्रदर्शन कर रहे थे.

तालाब या नदी किनारे बैठ कर कुछ फुर्सत में रहने वाले लोग स्थिर पानी में कंकर फेंक कर जलतरंग का मजा लेते रहे हैं. फिलहाल यही धारणा बनी है कि ठीक यही काम सत्ता में बैठे कुछ चुनिंदा लोग कर रहे हैं. सुधारों के नाम पर अनावश्यक कभी किसी शहर, स्टेशन या किसी संस्था का नाम बदलकर तथा कुछ लोग चमत्कारिक रूप से बदलाव के लिए नीतियों और नियमों में हेरफेर का हो रहे व्यापक विरोध का मजा ले रहे हैं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की अपील
बिल का विरोध कर रहे डॉक्टरों से रविवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने मुलाकात कर हड़ताल को समाप्त करने की अपील की थी. स्वस्थ्य मंत्री ने ट्वीट कर कहा था, ‘आज सुबह, मैं सफदरजंग और एम्स के आरडीए प्रतिनिधियों से मिला. मैंने एनएमसी बिल से संबंधित उनकी शंकाओं और गलतफहमी को स्पष्ट किया. मैंने डॉक्टरों को समझाया है कि एनएमसी बिल चिकित्सा शिक्षा में सबसे बड़े सुधार में से एक है जो देश की 130 करोड़ आबादी के लिए वरदान साबित होगा.’ उन्होंने ट्वीट किया, ‘मैंने डॉक्टरों से अपील की है कि हड़ताल बंद करें, ताकि मरीजों को स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर कोई परेशानी न हो.’

इससे पहले रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के छात्र संघ, दिल्ली ने घोषणा की थी कि वह अपनी अनिश्चितकालीन हड़ताल जारी रखेगा पर तत्काल प्रभाव से आपातकालीन सेवाओं को फिर से शुरू करेगा.

देश के चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रही एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) लम्बे समय से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा था. सुधार की मांग उठती रही थी. इसी बीच केंद्र सरकार ने एमसीआई का नाम बदलकर एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) कर दिया और इसके कुछ प्रारूप भी बदल दिए. सरकार ने इसे एनसीआई बिल के तहत ध्वनिमत से लोकसभा के साथ राज्यसभा से भी मंजूर करा लिया. बावजूद इसके देश भर में आईएमए और रेसिडेंट डाॅक्टर्स एसोसिएशन के बैनर तले विरोध शुरू हो गया.

विरोध का कारण
एनसीआई बिल में सरकार ने उदारता दिखाते हुए आयुर्वेद और होम्योपैथी डॉक्टर को छह महीने का ब्रिज कोर्स कर एलोपैथी की दवाएं लिखने की इजाजत दी है. यही नहीं बिल के 32 वें प्रावधान के तहत अब नर्स, दवा दुकानदार, कम्पाउंडर, फिजियोथेरैपिस्ट, टेक्निशियंस और रेडियोलाॅजिस्ट को भी आयोग में रजिस्टर्ड होने के बाद एडवांस प्रैक्टिस करने का लाइसेंस हासिल करने का इजाजत देता है.

रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के छात्र संघ का विरोध इस बात को लेकर था कि जब ब्रिज कोर्स से ही एलोपैथी डॉक्टर बना जा सकता है, तो फिर साढ़े चार साल का एमबीबीएस कोर्स और एक साल का इंटर्नशिप करने का प्रावधान क्यों है? सरकार को इसमें भी बदलाव लाना चाहिए था.

राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (एनसीआई) ने निजी मेडिकल कॉलेज को पचास प्रतिशत सीटों पर फीस तय करने की छूट दी है. रेजिडेंट डॉक्टरों और मेडिकल छात्र संघ का मानना है कि आयोग के इस कदम से मेडिकल एजुकेशन और महंगी हो जाएगी. निजी मेडिकल कॉलेजों ने तो अविलंब इसका फायदा उठाते हुए चल रहे दाखिले (2019-2020) से ही लाखों रुपए का फीस बढ़ा दिए हैं. उनकी इस आशंका में दम है कि आर्थिक रूप से पिछड़े विद्यार्थियों का डाॅक्टर बनने के सपना कभी पूरा नहीं हो सकेगा.

एमबीबीएस के बाद एक्जिट टेस्ट..?
एनएमसी के ने नियमों के तहत एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिस के लिए अब ‘एक्जिट टेस्ट’ देना अनिवार्य किया गया है. इनमें पास होने के बाद ही लाइसेंस मिलेगा. यही नहीं इसी टेस्ट के आधार पर ही पीजी में दाखिला मिलेगा.

एक्जिट टेस्ट के इस नए प्रावधान ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या सरकार को अपने ही विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों पर भरोसा नहीं रह गया है. एमबीबीएस की डिग्री पूरा करने के लिए चार बार यूनिवर्सिटी परीक्षा ली जाती है. क्या यह परीक्षा विद्यार्थियों को परखने के लिए पर्याप्त नहीं है? सरकार के ‘एक्जिट टेस्ट’ लेने के निर्णय से तो ऐसा ही लगता है. सवाल यह भी है कि शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है?

सुधार की कवायद
हांलाकि एनएमसी बिल में कुछ ऐसे भी बदलाव किए गए हैं, जिससे सीधे मरीजों को फायदा होगा. अब झोला छाप डॉक्टरों की मुसीबत बढ़ेगी. बिना लाइसेंस प्रैक्टिस करने पर वालों को एक साल की जेल और पांच लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जाएगा.

एमसीआई में डाॅक्टरों का ही वर्चस्व रहता था. परिणामतः वहां गुटबाजी ज्यादा होती थी, भ्रष्टाचार भी होना स्वाभाविक था. सुधारों के अंतर्गत अब एनएमसी अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी. हर चार साल पर नए अध्यक्ष का चयन होगा. इसमें सिर्फ पच्चीस सदस्य ही होंगे. इसके साथ ही अब मेडिकल में दाखिले के लिए एक ही टेस्ट होगा. और वो है नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट).

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