भीमा-कोरेगांव हिंसा : नजरबंद बुद्धिजीवियों को नहीं मिली जमानत

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पुणे : राज्य के भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में नजरबंद बुद्धिजीवियों में पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फरेरा और वरनॉन गोंजाल्विस की जमानत याचिका पुणे सेशन कोर्ट ने आज शुक्रवार को रद्द कर दी. जबकि आज ही बॉम्बे हाईकोर्ट ने अरुण फरेरा को अंतरिम जमानत देने और नंजरबंदी खत्म करने की याचिका भी खारिज कर दी. आज उनके नजरबंदी की तारीख खत्म हो रही थी. लेकिन फिलहाल वे नजरबंद ही रहेंगे.

इसके साथ शुक्रवार को हाईकोर्ट ने भी मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और दलित बुद्धिजीवी आनंत तेलतुंबड़े के खिलाफ दायर एफआईआर को रफा-दफा करने के मामले की सुनवाई को 1 नवंबर तक के लिए आगे बढ़ा दिया है. अभी उन पर यह मामला चलता रहेगा.

उल्लेखनीय है‌ कि पुणे पुलिस ने इस साल 1 जनवरी को पुणे के भीमा कोरेगांव युद्ध की वर्षगांठ के बाद हुई हिंसा में कई बुद्धिजीवियों को हिरासत में लिया है. इसी मामले में कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा, वरवर राव और अरुण फरेरा को पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव मामले में अलग-अलग शहरों छापा मारकर हिरासत में लिया था.

सुप्रीम कोर्ट सभी आरोपियों को मामले पर अंतिम फैसले तक उनके घरों में नजरबंद रखने का आदेश दिया था. अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट गौतम नवलखा की नजरबंदी खत्म करने का आदेश दिया था.

क्या है भीमा-कोरेगांव मामला?
महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल 31 दिसंबर को हुए एलगार परिषद सम्मेलन के बाद दर्ज की गई एक प्राथमिकी के सिलसिले में 28 अगस्त को इन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. इस सम्मेलन के बाद राज्य के कोरेगांव – भीमा में हिंसा भड़की थी. पुणे पुलिस ने दावा किया कि माओवादियों ने पीएम नरेंद्र मोदी की आत्मघाती हमलावर से हत्या करवाने की योजना पर भी विचार किया था.

पुलिस ने इस मामले में तेलुगू कवि वरवर राव, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फरेरा और वरनन गोंजाल्विस, मजदूर संघ कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को आोरपी बनाया.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुलिस द्वारा पीएम मोदी की हत्या की साजिश के दावे को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है.

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