फर्टिलाइजर के क्षेत्र में चीनी दबदबे को खत्म किया जाएगा- तोमर 

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नागपुर में शुक्रवार,24 दिसंबर को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाक़ात करने पहुंचे विदर्भ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल में VIA के उपाध्यक्ष डॉक्टर सुहास बुद्धे, सॉल्युबल फर्टिलाइजर इंडस्ट्री एसोशिएशन के राष्ट्रिय अध्यक्ष राजीब चक्रवर्ती और VIA के कॉर्डिनेटर समीर काशीकर.

केंद्रीय कृषि मंत्री को नागपुर के उद्यमियों ने विभिन्न अड़चनों से अवगत कराया

 
नागपुर : केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि देश में “घुलनशील खाद” (Soluble Fertiliser) उत्पादन के क्षेत्र में चीनी आयात का दबदबा समाप्त करने और आत्मनिर्भरता के रास्ते आ रही अड़चनों को दूर करने की दिशा में शीघ्र आवश्यक कदम उठाए जाएंगे. उन्होंने सॉल्युबल फर्टिलाइजर इंडस्ट्री एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीब चक्रवर्ती सहित विदर्भ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के प्रतिनिधियों को इस संबंध में शीघ्र ही एक विशेष बैठक में शामिल होने के लिए नई दिल्ली अपने मंत्रालय में आमंत्रित किया. 

पिछले 24 मई को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपने एक दिवसीय दौरे पर नागपुर में आयोजित विदर्भ के सबसे बड़े सालाना कृषि प्रदर्शनी “एग्रो विजन” में शामिल होने आए थे. इस दौरान कृषि जगत से जुड़े नागपुर और आस पास के अनेक विशिष्ट व्यक्तियों ने उनसे मुलाक़ात की. इनमें विदर्भ इंडस्ट्री असोशिएशन (VIA) के उपाध्यक्ष डॉक्टर सुहास बुद्धे, सॉल्युबल फर्टिलाइजर इंडस्ट्री एसोशिएशन के राष्ट्रिय अध्यक्ष राजीब चक्रवर्ती और VIA के कॉर्डिनेटर समीर काशीकर भी शामिल थे.

चक्रवर्ती ने देश के सॉल्युबल फर्टिलाइजर उत्पादकों के लिए चीन के दबदबे के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने कृषि मंत्री को बताया कि सन 2002 में खाद नियंत्रक कानून FCO 1985 में बड़े बदलाव किए गए थे. इन बदलावों के जरिये जोड़े गए आयातित अनुद्रव्य ने भारत के कृषि निर्यातों में क्रांति ला दी थी. उन दिनों यह सारे अनुद्रव्य जिन्हें “घुलनशील खाद” (Soluble Fertiliser) के नाम से भी जाना जाता है, पश्चिमी देशों से आयात किए जाते थे. पिछले एक दशक में विश्व बाजार में हुए परिवर्तनों का “घुलनशील खाद” के उत्पाद पर भी असर पड़ा है और अब यह सारा चीन से आयात किए जाते हैं.

चक्रवर्ती ने बताया कि भारत में इन वस्तुओं का उत्पाद पर सबसे पहला सफलतापूर्वक परीक्षण 2007 में ही हो गया था. कुछ छोटे निर्माता और गिनी-चुनी बड़ी भारतीय कंपनियां इन्हें बनाने की कोशिश कर कर रही हैं, पर घुलनशील खाद की जरूरतों में से 90% से भी ज्यादा के लिए आज भी चीन पर निर्भर रहना पड़ रहा है. यहां तक कि पश्चिमी देश के निर्यातक भी चीन से ही इसे खरीद कर भारत को निर्यात कर रहे हैं.

केंद्रीय मंत्री को चक्रवर्ती ने बताया कि इन दिनों भारत में छोटे उद्योगों की आत्मनिर्भरता को बढ़ाने और चीन के उत्पादों पर निर्भरता घटाने की बात हो रही है. इस संदर्भ में एक बड़ा व्यवधान है, जो भारतीय उद्योग क्षेत्र को अति आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बन पाने से रोक रहा है. ऐसी बाधाओं को दूर करने पर ही देश के कृषि क्षेत्र को बेहतर योगदान दिया जा सकता है.

उन्होंने कृषि मंत्री को जानकारी दी कि इसमें सबसे बड़ी बाधा है- उत्पादन के विकास में दशकों पहले बनी नीतियां, जो एक ओर भारतीय उत्पादों को “लाइसेन्स राज” में जकड़ कर विदेश से आयात को ही प्रोत्साहित कर रही है और देश को आत्मनिर्भर होने से रोक रही है.

बाधा की स्पष्ट जानकारी से कृषि मंत्री को अवगत कराते हुए चक्रवर्ती ने कहा कि भारतीय सॉल्युबल फर्टिलाइजर उत्पादकों को अपने राज्य के साथ-साथ हर उस राज्य में ऑफिस खोलकर लाइसेन्स लेना पड़ता है, जहां उनके उत्पादों को बेचना होता है. देश के अनेक राज्य ऐसे हैं, जो भारतीय कंपनियों को अन्य राज्यों में co–marketing के जरिये अपने उत्पाद बेचने की अनुमति नहीं देती है. गिने-चुने राज्यों में यह संभव तो है, पर यह एक बेहद खर्चीला मामला है. FCO 1985 केंद्र का अधिनियम होते हुए भी राज्यों ने इस तरह के अपने-अपने कानून बना रखे हैं. इन कानूनों के जरिये भारतीय निर्माताओं को रोकने की हर संभव कोशिश होती रहती है. यह नियम सूक्ष्म अनु द्रव्यों के लिए भी लागू है.

इसके ठीक विपरीत चीन के उत्पादक को अपने देश में ही बैठे-बैठे, भारत के किसी आयातक (importer) को केवल एक पत्र देना होता है, जिसे लेकर अलग-अलग राज्यों में बैठे उसके Importer/co-marketer का लाइसेन्स प्राप्त कर व्यापार शुरू कर लेता है.

चक्रवर्ती ने कृषि मंत्री तोमर को बताया जबकि, भारतीय उत्पादक दूसरे राज्यों में आसानी से अपने उत्पाद बेचने में सक्षम नहीं है. उसके लिए तमाम तरह की अड़चनें खड़ी कर दी गई हैं. साथ ही भारत में निर्मित “सॉल्युबल फर्टिलाइजर” को निर्यात की भी अनुमति नहीं है. कुछ है भी तो वह इतना जटिल है कि उसे कार्यान्वित करना भारतीय निर्माताओं के लिए संभव नहीं.

उन्होंने कहा कि एक भारतीय निर्माता को जब तक अपने ही देश में एक विदेशी चाइनीज निर्माता को मिल रही सहूलियतों के बराबर की सहूलियत उपलब्ध नहीं कराई जाएगी, तब तक देश कभी भी चीन से आयात का मुकाबला नहीं कर पाएगा और भारत कृषि क्षेत्र के इस महत्वपूर्ण उत्पाद के मामले में कभी आत्मनिर्भर भी नहीं बन पाएगा.

इन अड़चनों को दूर करने की बारे में केंद्रीय मंत्री को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार इस विषय का संज्ञान ले और FCO 1985 अधिनियम में मामूली परिवर्तन कर भारतीय निर्माताओं को सशक्त किया जाए, तब अपना देश न केवल करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचा पाएगा, साथ ही अन्य देशों में भी इसे निर्यात कर विदेशी मुद्रा भी अर्जित कर पाएगा.
 
केंद्रीय कृषि मंत्री से इस मुलाक़ात में एक बिस्तृत चर्चा के दौरान विदर्भ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के इन तीनों प्रतिनिधियों ने उन्हें कृषि क्षेत्र और खास कर सॉल्युबल फर्टिलाइजर उत्पादन के क्षेत्र में चाइनीज आयात का दबदबा और इससे आत्मनिर्भरता के रास्ते आ रहे अड़चनों के बारे में यह जानकारी दी. 

चक्रवर्ती ने उन्हें पिछले बीस सालों में लघु और मध्यम उद्योग द्वारा स्व उत्पादन की कोशिशों से अवगत कराया और बताया कि किस तरह से इन प्रयासों को भारत सरकार द्वारा सहायता प्रदान कर आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सकती है.
 
डॉक्टर सुहास बुद्धे ने उन्हें आयात अनुरूप नियमों और लाइसेन्स राज तकलीफों से अवगत कराया. उन्होंने कहा कि भारत के लघु उद्यमियों की आत्मनिर्भरता को किस तरह से लाइसेन्स राज ने रोक रखा है और कैसे उनको सहायता कर आयात से निर्भरता घटाई जा सकती है.  

समीर काशीकर ने मंत्री जी को राज्यों द्वारा अलग-अलग कानून बनाए जाने और उससे लघु उद्योग को हो रही समस्यायों से अवगत कराया. आयात और आत्मनिर्भरता के बीच इस असंतुलन को खत्म करने के लिए उन्होंने कई उपाय भी सुझाए. 
 
कृषि मंत्री ने इन सभी समस्याओं पर गंभीरता जताते हुए तीनों उद्यमियों को दिल्ली में एक विशेष बैठक में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया. जनवरी महीने के मध्य में दिल्ली में इस विषय पर आगे की चर्चा होने की उम्मीद है.

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