क्रूर खेल खेला जा रहा है EPS-95 पेंशनरों के साथ

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क्रूर खेल

केंद्र और EPFO के साथ तीसरा पक्ष कहीं देश की सर्वोच्च न्यायपालिका भी तो नहीं बन गई..!

पेंशनरों को सरकार और EPFO के क्रूर खेल से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत पेंशनर्स योद्धाओं में एक दादा झोड़े ने हाल ही में फिर एक बार एक पत्र सुप्रीम कोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस एन. वेंकट रमना को भी भेजा है. उन्होंने एक बार फिर केंद्र सरकार और EPFO की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए लंबित की जा रही याचिकाओं की ओर ध्यान दिलाया है. पत्र में उन्होंने बताया है कि उनकी याचिकाएं मात्र सुप्रीम कोर्ट और देश के कम से कम छह हाईकोर्ट के फैसलों को लागू करने से बचने के उद्देश्य से ही दायर की गई हैं. दादा झोड़े के इसी पत्र के आधार पर प्रस्तुत है यह विवेचना-
 
देश के लगभग 67 लाख वरिष्ठ नागरिक, बूढ़े EPS-95 पेंशनर्स, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. जबकि दुर्भाग्य से उनके जीवन-यापन का आधार पेंशन के इन मामलों से जुड़े 60 मुकदमें सुप्रीम कोर्ट में दो वर्षों से लंबित हैं. EPFO और भारत सरकार के इस क्रूर खेल से लाचार पेंशनरों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं.

उल्लेखनीय है कि EPFO द्वारा दिनांक 1-04-2019 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर एक समीक्षा याचिका और भारत सरकार द्वारा दायर एक अलग SLP अब EPS-95 पेंशनरों के न्यायसंगत अधिकारों को कुचलने का बेशर्म क्रूर खेल बन गया है. स्थिति ऐसे बनती जा रही है, जिसमें यह लगने लगा है कि देश के 67 लाख वयोवृद्ध लाचार पेंशनरों के विरुद्ध देश की सर्वोच्च न्यायपालिका भी केंद्र सरकार और EPFO के साथ तीसरा पक्ष बन गई है.
 
EPFO और केंद्र सरकार की इन याचिकाओं की एक लंबी प्रतीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए 18-01-2021, 29-01-2021, 25-02-2021, 23-03-2021, 25-03-2021, 13- पर सूचीबद्ध किया गया. 13-04-2021, 15-04-2021 और अंतिम रूप से 22-04-2021 को, न्यायालय संख्या 4/3 के समक्ष, माननीय न्यायमूर्ति यू.यू. ललित की अध्यक्षता में पेंशनरों का मामला सामने आया, लेकिन दुर्भाग्य से सुनवाई एक या अन्य कारणों से टाल दिया गया.

और अब, सुप्रीम कोर्ट ने अवकाश कालीन छुट्टी को आगे बढ़ाने का फैसला किया है. इसके तहत अब सुप्रीम कोर्ट 10 मई 2021 से 27 जून 2021 तक काम नहीं करेगा. जाहिर है, बूढ़े और लाचार EPS-95 पेंशनरों के जीवन-यापन से जुड़े इस क्रूर खेल को यदि जानबूझ कर नहीं तो छुट्टी के नाम पर सुप्रीम कोर्ट भी और विलम्बित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा. यह विलंब इस आशंका को बल देता है कि केंद्र सरकार और EPFO को ही फायदा पहुंचाने के लिए तो नहीं किया जा रहा है. न्याय में इस प्रकार की देरी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.

EPS-95 पेंशनर्स, जिन्हें पेंशन  पर 700-800 रुपए मासिक मिल रहे हैं. वे प्रति माह इसी पेंशन राशि से अपने भोजन और दवा के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इस कोरोना महामारी काल में यदि वे कोरोना से नहीं मरते हैं तो वे भोजन और दवा के बिना तो मरने से बच नहीं सकते. EPFO ने चालाकी से इन याचिकाओं की आड़ में अनेक पेंशनरों के संशोधित पेंशन के भुगतान पर रोक लगा दी है.

दुर्भाग्यवश, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 29-01-2021 को माननीय न्यायमूर्ति यू.यू. ललित की अध्यक्षता में EPFO की उपरोक्त समीक्षा याचिका की अनुमति दी और 25-02-2021 को केरल से बाहर के सभी (उच्च न्यायालयों के आदेश और अदालतों के अन्य आदेश का पालन न करने पर दायर)  कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट (न्यायालय की अवमानना) मामलों पर रोक लगा दी गई है. इस रोक से EPFO को इस क्रूर खेल जारी रखने में भरपूर मदद मिली है.

वास्तव में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही 4-10-2016 को न्याय दृष्टांत विवेचना दे दी है, आर.सी. गुप्ता के मामले का निर्णय और दिनांक 1-04-2019 को विचाराधीन आदेश, दिनांक 12-10-2018 के खिलाफ EPFO के एसएलपी को खारिज करते हुए माननीय केरल उच्च न्यायालय के आदेश को सही ठहरा दिया था. इसके बावजूद भारत सरकार और EPFO ने इन आदेशों का पालन करने के बजाय वृद्ध पेंशनरों को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपर्युक्त आदेशों के लाभों से वंचित कर दिया है.

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इन याचिकाओं पर फैसले में लगाता हो रहे विलंब के कारण EPFO और केंद्र सरकार आर.सी. गुप्ता मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की भी अवहेलना कर रहा है.

EPFO ने बहुत से अवैध अधिसूचनाएं जारी कर बिना किसी नोटिस के अनेक पेंशनरों की संशोधित पेंशन रोक दी है. EPFO वास्तव में इन मामलों और कानूनी प्रक्रिया को तय करने में देरी का फायदा उठाकर पुराने वृद्ध गरीब पेंशनरों को प्रताड़ित कर रहा है. इस समय तक, लगभग दो लाख EPS-95 पेंशनरों की मृत्यु उपर्युक्त आदेशों के लाभ के बिना हुई है. इसके बावजूद EPFO या भारत सरकार का क्रूर खेल चल रहा है. उनके द्वारा उन्हें राहत पहुंचाने का कोई प्रयास भी नहीं किया गया है.

फिर भी EPS पेंशनरों का भरोसा अभी भी न्यायपालिका पर पूरी तरह से कायम है. क्योंकि अब तक EPS पेंशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के निर्णय जितने फैसले आए हैं, वे सभी न्याय पर ही आधारित और पेंशनरों के हित में आए हैं. उन्हें विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय आंखें बंद कर और अपने पूर्व के फैसलों की अनदेखी कर सरकार के एसएलपी और रिव्यू पिटीशन के पक्ष में फैसला नहीं दे सकता.

-प्रस्तुति : कल्याण कुमार सिन्हा

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