ईपीएस-95 पेंशनर्स : EPFO की क्रूरता को मिली अदालती ताकत

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ईपीएस-95 पेंशनर्स

*रवैये का सवाल-
देश के 65 लाख से अधिक वयोवृद्ध ईपीएस-95 पेंशनर्स के साथ केंद्र सरकार और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) की क्रूरता को अब लगता है कि अदालती ताकत भी मिल गई है. सरकारी कर्मचारियों/ पेंशनरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसलों से यह स्पष्ट है कि नैतिकता के आधार पर ही नहीं, सरकार और उसके संगठन, कर्मचारियों और पेंशनरों को वैधानिक रूप से मिलने वाले आर्थिक लाभ से वंचित नहीं कर सकते.

लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ही EPFO और सरकार के Review Petition और SLP पर एक सुनवाई में इसी वर्ष 24 अगस्त 2021 को बिना जरूरत अपने ही पूर्व के द्वारा अंतिम वेतन पर पेंशन की रकम तय करने के आदेश को कटघरे में खड़े कर चुका है. ईपीएस-95 पेंशनरों के लिए दुःख की बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट की जिस दो सदस्यीय बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के आदेश की वैधता पर विचार के लिए जिस बड़े बेंच के गठन की सिफारिश मुख्य न्यायाधीश से की है, उस बेंच का तीन महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी गठन नहीं किया गया है.


EPS-95 पेंशनरों के मामले को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सरकारी संस्था दूरदर्शन के दो कर्मचारियों के संबंध में दिए गए फैसले से जोड़ कर देखना जरूरी है. क्यों कि सरकारी क्षेत्र और निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों और पेंशनरों के प्रति सुप्रीम कोर्ट दोहरा मापदंड तो नहीं अपना सकता. अब देखें, सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शन कर्मचारी के लिए दिए गए फैसले में सरकार से क्या कहा है-

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र के उस फैसले पर, जिसमें उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए मौद्रिक लाभों को केवल दूरदर्शन के कुछ कर्मचारियों तक सीमित करने का निर्णय करने पर आपत्ति जताई और कहा कि सरकार को अपने कर्मचारियों की देखभाल करने के लिए एक आदर्श नियोक्ता की तरह व्यवहार करना चाहिए, जो देश के लिए काम कर रहे हैं और उनके प्रति उदार रहें.

न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना की पीठ ने केंद्र के उस फैसले पर आपत्ति जताई, जिसमें उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए मौद्रिक लाभों को केवल दूरदर्शन के उन कर्मचारियों तक सीमित करने का फैसला किया गया था, जिन्होंने अदालत में याचिका दायर की थी. केंद्र ने यह आधार लिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का लाभ उन लोगों को नहीं दिया जा सकता, जो बाड़ पर बैठे थे और अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया था.


लेकिन, केंद्र  सरकार के श्रम मंत्रालय के अधीन कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने भी ऐसी नैतिकता कभी नहीं दिखाई. आर.सी. गुप्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के 4 सितंबर 2016 को अंतिम वेतन के आधार पर पेंशन तय कर एरियर के साथ भुगतान करने के आदेश के बाद भी अन्य ईपीएस-95 पेंशनर्स को यह लाभ पाने के लिए संबंधित हाई कोर्ट से आदेश लाने पड़े और जिन-जिन पेंशनरों ने आदेश लाए, उन्हें ही EPFO पुनरीक्षित पेंशन और बकाए का भुगतान किया. लेकिन इस Review Petition और SLP दायर करने के बाद इसे भी EPFO ने रोक दिया. इतना ही नहीं, एरियर की राशि भी वापस लौटाने पर उसने ईपीएस-95 पेंशनर्स को बाध्य किया.  

यहां यह रेखांकित करना जरूरी है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 2016 तक EPFO के लगभग 10 अपीलीय मामलों को और फिर 4-10-2016 को फिर से कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के पक्ष में आर.सी. गुप्ता के मामले में ईपीएस-95 पेंशनर्स के पक्ष में फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को EPFO के वरिष्ठ अधिकारियों की समिति ने 8-12-2016 को, फिर सुप्रीम सेंट्रल बोर्ड ऑफ प्रोविडेंट फंड एसोसिएशन (सीबीटी) ने 19-12-2016 को बरकरार रखा. इसके बाद इसे केंद्र सरकार के पास अनुमोदन के लिए भेजा गया और केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के दिनांक 4-10-2016 के निर्णय को लागू करने के लिए 16-03-2017 को मंजूरी दे दी. उसके बाद 23-03-2017 को EPFO ने सर्कुलर जारी कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने का निर्देश दिया. और तब से, देश में लगभग 27,000 ईपीएस-95 पेंशनर्स की पेंशन फिर से निर्धारित की गई है, और इसके बाद केंद्र सरकार और EPFO के साथ सुप्रीम कोर्ट ने भी 4-10-2016 के फैसले पर रोक लगा दिया है.

अब इसी संदर्भ में दूरदर्शन कर्मचारियों के मामले को देखें- शीर्ष न्यायालय ने 2018 में यह आदेश पारित किया था कि दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो में कार्यरत पत्रकारों को भारतीय प्रसारण (कार्यक्रम) सेवा नियम 1990 के अनुसार पदोन्नति दी जानी चाहिए. अदालत ने सरकार की याचिका को खारिज कर दिया कि टीवी समाचार के पोस्ट संवाददाता और टीवी सहायक समाचार संवाददाता नियमों के तहत शामिल नहीं थे और कनिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (चयन ग्रेड) के पद पर पदोन्नति के लिए विचार नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि उन दो कर्मचारियों को पदोन्नति और बाद में मौद्रिक लाभ दिया जाएं, जिन्होंने 12 साल तक कोई पदोन्नति नहीं दिए जाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी.

सुप्रीम कोर्ट के अनुकूल आदेश के बाद, इसी तरह के कई कर्मचारियों ने उसी राहत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन केंद्र ने उनकी याचिका का विरोध किया. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने तर्क दिया कि इसमें बड़ी संख्या में कर्मचारी शामिल हैं और उन्हें लाभ नहीं दिया जा सकता है. उन्होंने कहा कि पीड़ित कर्मचारियों को पहले से ही अदालत द्वारा तय किए गए मामले में आवेदन दाखिल करने के बजाय अलग कानूनी कार्यवाही शुरू करनी चाहिए.

हालांकि, बेंच ने केंद्र से सहानुभूतिपूर्वक विचार करने को कहा.

इसने कहा कि “भारत सरकार को इस पर विचार करना चाहिए. यदि आप कुछ कर्मचारियों को कुछ लाभ देते हैं तो आप अन्य कर्मचारियों को उन लाभों से कैसे वंचित कर सकते हैं, जो उसी कैडर में और उसी विज्ञापन के तहत भर्ती हुए थे. आपको एक मॉडल नियोक्ता होना चाहिए. सभी को लाभ मिलना चाहिए और हम न्याय करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत आदेश पारित कर सकते हैं.”

कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त हो गए हैं और उन्हें पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी), फिर एचसी और अंत में एससी से लाभ प्राप्त करने के लिए एक नई कानूनी लड़ाई शुरू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, जो उनके सहयोगियों को अनुमति दी गई थी. नहीं चाहते कि 70 के दशक में गरीब नागरिक CAT और HC में कानूनी लड़ाई लड़ें. वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने आपके लिए काम किया और आपकी सेवा करते हुए अपना जीवन समर्पित कर दिया. उन्हें CAT में न जाने दें. वे आपके अधिकारी हैं, “अदालत ने एएसजी को अपनी भावना से संबंधित प्राधिकारी को अवगत कराने के लिए कहा ताकि मामले को सुलझाया जा सके.

शीर्ष न्यायालय के इस फैसले से ऐसी आशंका तो नहीं है कि ईपीएस-95 पेंशनर्स के साथ वह कोई दूसरा मापदंड अपनाएगी. लेकिन जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के दो सदस्यीय बेंच ने ही 4 सितंबर 2016 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वैधता को कटघरे में खड़ा किया है और इस मामले में आगे की सुनवाई का कोई दूर-दूर तक ठिकाना नहीं है तो ईपीएस-95 पेंशनर्स में आशंका तो स्वाभाविक ही है.

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