ILO से ईपीएस 95 पेंशनरों के लिए हस्तक्षेप का अनुरोध

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ILO

इम्प्लॉइज पेंशन स्कीम 95 कोऑर्डिनेशन कमिटी ने भेजा पत्र, विस्तार से बताया पेंशनर विरोधी सरकारी रवैये के बारे में

ईपीएस 95 पेंशनरों के साथ हो रहे अन्याय के मामले को विभिन्न स्तरों पर और संबंधित संस्थानों तक पहुंचाने का सिलसिला जारी है. अब अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), युगांडा स्थित मुख्यालय में महानिदेशक श्री गाई राइडर और संगठन के अध्यक्ष श्री अपूर्व चंद्र, जो भारत सरकार के श्रम सचिव भी हैं, को भी पत्र भेज कर पेंशनरों की व्यथा और भारत सरकार और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अन्यायपूर्ण रवैये की विस्तार से जानकारी दी गई है.

इम्प्लॉइज पेंशन स्कीम 95 कोऑर्डिनेशन कमिटी के महामंत्री प्रकाश पाठक और कमिटी के राष्ट्रीय विधि सलाहकार दादा झोड़े ने ILO से ईपीएस 95 पेंशनरों के साथ किए जा रहे अन्याय के विरुद्ध हस्तक्षेप के लिए अनुरोध किया है.  

उन्होंने पत्र में सामाजिक न्याय का ध्यान रखते हुए श्रमिक नीतियों के तहत ईपीएस 95 पेंशन योजना का न्यायपूर्ण कार्यान्वयन और भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के कार्यान्वयन की जरूरत की ओर ILO से पहल करने का आग्रह किया है. प्रकाश पाठक और दादा झोड़े ने भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन संचालित “कर्मचारी भविष्य निधि संगठन” (EPFO) के पेंशनर विरोधी नीतियों और उनके नैसर्गिक न्याय को कुचले जाने की ओर विस्तार से ध्यान दिलाया गया है. प्रस्तुत है International Labour Organisation (ILO) को उनके द्वारा भेजे गए पत्र का सार-

माननीय महोदय,
1998, 86वें अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन ने मौलिक सिद्धांतों और काम पर अधिकारों पर घोषणा को अपनाया है. इस घोषणा में चार मूलभूत नीतियां शामिल हैं-
– श्रमिकों के स्वतंत्र रूप से संबद्ध होने और सामूहिक सौदेबाजी करने का अधिकार
– जबरन और अनिवार्य श्रम का अंत
– बाल श्रम का अंत
– श्रमिकों के बीच अनुचित भेदभाव का अंत
उपर्युक्त मौलिक सिद्धांत और अधिकार 1998 में ILO ने स्थापित किए थे.

भारत में कर्मचारी पेंशन योजना 1995 (EPS-95) के सदस्य पेंशनभोगियों की त्रासदी
यह पत्र लगभग 67 लाख पेंशनभोगियों और 17.2 करोड़ कार्यरत कर्मचारियों से संबंधित है. इन पेंशनभोगियों ने अपने पूरे जीवन में अधिकतम 30-35 वर्षों तक काम किया है और वे बहुत वृद्ध हैं. पेंशन नीतियों के अनुचित कार्यान्वयन के कारण, उन्हें वर्तमान में 500 से 3000 रुपए तक पेंशन मिल रहे हैं. लगभग 30 लाख पेंशनभोगियों को प्रति माह 1000/- रुपए से कम पेंशन मिल रहा है, जो उनके मासिक चिकित्सा खर्च के लिए भी पर्याप्त नहीं है. ये सभी पेंशनभोगी बहुत ही अनिश्चित और कठिन परिस्थितियों में हैं. वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं. राष्ट्रीय हित के लिए काम करने और पूरा जीवन बिताने के बाद भी, उन्हें सुनिश्चित पेंशन, सुनिश्चित सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक न्याय नहीं मिल रहा है. अतः आपसे नेक हस्तक्षेप का अनुरोध है.

1). इस संबंध में भारत सरकार द्वारा विधान –
भारत सरकार ने 1952 में “कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम 1952” अधिनियमित किया। इस अधिनियम के तहत, “भविष्य निधि योजना 1952 का प्रावधान” बनाया गया था. फिर, 1971 में “कर्मचारी परिवार पेंशन योजना 1971” अधिनियमित किया गया. और  1995 की योजना को बंद कर दिया गया. नई पेंशन योजना “कर्मचारी पेंशन योजना 1995” (ईपीएस-95 संक्षेप में) शुरू की गई. अब वर्तमान में यह पेंशन योजना “कर्मचारी पेंशन योजना 1995” प्रचालन में है. हालांकि, भारत सरकार इस पेंशन योजना को ठीक से लागू नहीं कर रही है और इस संबंध में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का पालन भी नहीं कर रही है और परिणामस्वरूप पेंशनभोगियों / श्रमिकों को बार-बार न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर किया जा रहा है और उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है.

2) पेंशनभोगियों के साथ अन्याय
पेंशन योजना के पैरा 11(3) के तहत विकल्प के लिए “कट ऑफ डेट” के नाम पर उच्च पेंशन के लाभ से पेंशनभोगी वंचित थे. इसलिए, हजारों पेंशनभोगियों ने न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया. फिर, विभिन्न उच्च न्यायालयों ने माना कि ऐसी कोई कट ऑफ तिथि नहीं है.

EPFO की 10 याचिकाएं खारिज
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने EPFO द्वारा दायर उसके विरुद्ध दायर लगभग 10 विशेष अनुमति याचिकाओं को खारिज कर दिया है और पेंशन भोगियों के पक्ष में मामलों का फैसला किया है. सरकार के उपरोक्त 10 एसएलपी/अपीलों को खारिज करने के बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने “आर.सी. गुप्ता (2015 की एसएलपी संख्या 33032-33033)” के मामले में कानून की व्याख्या की और 4-10-2016 को पेंशन भोगियों के पक्ष में फैसला सुनाया.

भारत सरकार और MOL&E ने इसके कार्यान्वयन के लिए 27-01-2017 को एक प्रस्ताव को मंजूरी दी और सभी पात्र पेंशनभोगियों को लाभ देने के लिए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (भारत सरकार का एक ट्रस्ट, संक्षेप में EPFO) को निर्देश दिया. फिर, ईपीएफओ ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कार्यान्वयन के लिए दिनांक 23-03-2017 को एक परिपत्र जारी किया और पेंशनभोगियों की पेंशन को संशोधित करना शुरू कर दिया. हालांकि, EPFO ने अपने परिपत्र दिनांक 31-05-2017 के माध्यम से ईपीएस 95 पेंशनरों को छूट प्राप्त स्थापना कर्मचारियों और गैर-छूट वाले स्थापना कर्मचारियों के रूप में भेदभाव किया और उच्चतम न्यायालय के फैसले के उक्त लाभों से छूट प्राप्त स्थापना के पेंशनरों को वंचित कर दिया.

इस परिपत्र दिनांक 31-05-2017 के विरुद्ध, पेंशनभोगियों ने न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया और अब देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 1000 से अधिक मामले और सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 49 मामले हैं. ईपीएफओ द्वारा इन मामलों के लिए बहुत बड़ी राशि खर्च की जा रही है और गरीब वृद्ध पेंशनभोगियों को कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है और उन्हें परेशानी में डाला जा रहा है.

इस अवधि तक छह उच्च न्यायालयों ने 31-05-2017 के इस परिपत्र को अवैध, मनमाना और असंवैधानिक मानते हुए निर्णय लिया और पेंशनभोगियों के पक्ष में निर्णय सुनाया और परिपत्र दिनांक 31-05-2017 को रद्द कर दिया. ये निर्णय इस प्रकार हैं-

उच्च न्यायालयों के निर्णयों की तिथि-
तेलंगाना उच्च न्यायालय- 24-09-2018
राजस्थान उच्च न्यायालय-11-12-2018
मद्रास उच्च न्यायालय -27-03-2019
कर्नाटक उच्च न्यायालय-27-03-2019
दिल्ली हाई कोर्ट -22-05-2019
झारखंड उच्च न्यायालय -10-02-2020

छह उच्च न्यायालयों ने दिनांक 31-05-2017 के परिपत्र को अवैध, मनमाना और असंवैधानिक करार दिया, हालांकि, ईपीएफओ बहुत अडिग है और उक्त परिपत्र को वापस नहीं ले रहा है और परिणामस्वरूप, अदालती मामलों में पेंशनभोगियों का भारी पैसा बर्बाद कर रहा है.

भारत सरकार, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय (MOL & E) को उक्त परिपत्र को तुरंत वापस लेने और अदालती मामलों पर अनावश्यक खर्चों को रोकने और पेंशनभोगियों को न्याय देने की आवश्यकता है. यह आपके संज्ञान में लाना उचित है कि देश के गरीब, वृद्ध, पेंशनभोगी, वरिष्ठ नागरिकों को न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर किया जा रहा है और उनके जीवन के अंतिम छोर पर अत्याचार किया जा रहा है.

3) बिना छूट वाले प्रतिष्ठानों के पेंशनभोगियों के साथ अन्याय
भारत सरकार और EPFO ने आर.सी. गुप्ता के मामले में सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त संदर्भित निर्णय को लागू किया है, बिना छूट वाले प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों के लिए और लगभग 24,000 पेंशनभोगियों की पेंशन मार्च-अप्रैल 2019 तक संशोधित की गई है. तथापि, मई 2019 माह से पेंशनभोगियों की यह संशोधित पेंशन बिना किसी कारण व संबंधित को बिना किसी नोटिस के तथा नैसर्गिक न्याय के प्रधान के विरुद्ध रोक दी गई है. अब, ये पेंशनभोगी बिना पेंशन के हैं और फिर से अदालतों में मामले दर्ज करने के लिए मजबूर हैं.

4) पेंशन योजना में अवैध संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन न करना
भारत सरकार ने जीएसआर 609(ई) दिनांक 22-08-2014 के तहत 1-09-2014 से ईपीएस95  पेंशन योजना में प्रतिकूल संशोधन किए. उनमें से मुख्य संशोधन इस प्रकार हैं-

– वास्तविक वेतन पर उच्च पेंशन के विकल्प का प्रावधान हटा दिया गया है.
– पेंशन के औसत वेतन की गणना के लिए 12 माह के स्थान पर 60 माह का प्रावधान किया गया है.
– रुपए तक की पेंशन योजना की प्रयोज्यता के लिए प्रतिबंध लगाए गए हैं. 15000/- वेतनभोगी कर्मचारी
– सांविधिक सीमा से अधिक कर्मचारियों के वेतन से अंशदान का भुगतान शुरू किया गया है. 1.16% के इस योगदान का भुगतान केंद्र सरकार द्वारा 1-09-2014 से पहले किया जा रहा था.

इन संशोधनों को पूर्वव्यापी रूप से बहुत अवैध रूप से और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ लागू किया जाता है.

माननीय महोदय, हम आपका ध्यान लोकसभा की रिपोर्ट की ओर आकर्षित करना चाहते हैं. यह है- “अधीनस्थ विधान पर समिति (2015 – 2016) सोलहवीं लोकसभा की बारहवीं रिपोर्ट.”

इस संबंध में कर्मचारी पेंशन योजना 1995 में संशोधन का अध्ययन करने के लिए श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया था. यह रिपोर्ट 10-08-2016 को लोकसभा में प्रस्तुत की गई थी.

समिति ने योजना का अध्ययन किया, संशोधनों का अध्ययन किया, श्रम मंत्रालय के अधिकारी के साक्ष्य लिए, इस संबंध में बयान दर्ज किए और फिर इस संबंध में टिप्पणियां/सिफारिशें कीं.

कमिटी ने पाया कि बदलाव के लिए संशोधन – 12 महीने से 60 महीने कर दिया जाना, कर्मचारियों के वेतन से योगदान का भुगतान, उच्च पेंशन के विकल्प को हटाना आदि पूरी तरह से नैसर्गिक न्याय के खिलाफ और मूल भावना के विपरीत हैं.

पूर्व सेवार्थ वृत्ति योजना
कमिटी ने पाया कि संशोधन भूतलक्षी प्रभाव से लागू होते हैं और इसलिए अवैध, मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ हैं. समिति ने पाया कि 1-09-2014 से किए गए संशोधन उन कर्मचारियों पर लागू नहीं हो सकते जो पहले से ही सेवा में थे. अधिक से अधिक, जीएसआर 609 (ई) दिनांक 22-08-2014 के तहत किए गए संशोधन उन कर्मचारियों पर लागू किए जा सकते हैं, जो जीएसआर की तारीख 22-08-2014 के बाद सेवा में शामिल होते हैं.

समिति ने केंद्र सरकार की पेंशन योजना के उदाहरण दिए. केंद्र सरकार ने पहले की पेंशन योजना को बंद कर दिया और केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 1-01-2004 से नई पेंशन योजना (एनपीएस) लाई. यह नई पेंशन योजना एनपीएस 31-12-2003 से पहले सेवा में शामिल हुए कर्मचारियों पर लागू नहीं किया जा सकता है और 31-12-2003 के बाद भर्ती किए गए कर्मचारियों पर लागू किया जा सकता है. उसी के सदृश्य के साथ ईपीएस 95 में किए गए संशोधनों को पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है.

समिति ने उन बैंकों में सावधि जमा का उदाहरण भी दिया है, जहां ब्याज दर में बदलाव नहीं किया जा सकता है. समिति द्वारा इस मामले में संशोधनों के पूर्वव्यापी संचालन को अवैध माना गया था.

कमिटी ने कहा कि भले ही इसे पूर्वव्यापी रूप से संचालित किया गया हो, लेकिन यह कर्मचारियों के हित के लिए हानिकारक नहीं होना चाहिए. इस अवलोकन के समर्थन में, समिति ने भारत सरकार के संसदीय कार्य मंत्रालय में संसदीय प्रक्रिया नियमावली के पैरा 11.7.4 (ii), अध्याय 11 का भी हवाला दिया और दृढ़ता से कहा कि संशोधन पूर्वव्यापी रूप से प्रभावी नहीं किए जा सकते.

यह बहुत आश्चर्य की बात है कि अधीनस्थ विधान संबंधी समिति की इस रिपोर्ट का कोई संज्ञान नहीं लिया गया है और संशोधनों को भारत सरकार द्वारा रद्द नहीं किया जाता है.

(समिति की रिपोर्ट ILO की जानकारी के लिए पत्र के साथ तत्काल संदर्भ के लिए संलग्न भी किया गया है.)

5) जीएसआर 609 (ई) दिनांक 22-08-2014 के तहत इन संशोधनों के खिलाफ, हजारों लोगों ने अदालतों में मामले दायर किए. केरल राज्य में 15,000 पेंशनभोगियों ने केरल उच्च न्यायालय में 507 मामले दायर किए. केरल उच्च न्यायालय ने इन 507 मामलों का फैसला किया और संशोधनों को अवैध, मनमाना और असंवैधानिक करार दिया.

12-10-2018 को केरल उच्च न्यायालय ने पेंशनभोगियों के पक्ष में उक्त मामलों (डब्ल्यूपी 13120/2015, डब्ल्यूपी 602/2015) का फैसला किया और संशोधनों को रद्द कर दिया. केरल उच्च न्यायालय के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय ने EPFO की अपील (SLP No.8658-8659 of 2019) को एक आदेश दिनांक 1-04-2019 द्वारा खारिज करते हुए बरकरार रखा है.

भारत सरकार और MOL & E ने इस निर्णय को लागू करने के बजाय, EPFO के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के दिनांक 1-04-2019 के आदेश के खिलाफ 2019 की समीक्षा याचिका संख्या 1430-1431 दायर की है और भारत सरकार ने स्वयं एक SLP संख्या दायर की है.

2019 के केरल उच्च न्यायालय के उक्त आदेश के विरुद्ध भारत सरकार, MOL & E स्वयं माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लागू करने और वृद्ध वृद्ध गरीब पेंशनरों को न्याय से वंचित करने के लिए अपनी बात रक्षणे से बच रही है. भारत सरकार से इसकी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं है.

यह ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि केरल उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन संशोधनों को अवैध, मनमाना और असंवैधानिक के रूप में तय करने से पहले, अधीनस्थ विधान समिति (स्वयं भारत सरकार द्वारा गठित समिति) ने उक्त संशोधनों को अवैध माना था. हालांकि, भारत सरकार या EPFO ने कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की थी और इस मुद्दे को न्यायालयों द्वारा तय करने के लिए छोड़ दिया था. साथ ही न्यायालयों के निर्णय के बाद भी, भारत सरकार ने उक्त संशोधनों को रद्द नहीं किया है.

समिति ने यह भी उल्लेख किया कि 01-09-2014 के बाद सेवानिवृत्त लोगों को कम पेंशन मिलेगी और उनके हित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. सेवा शर्तों को प्रतिकूल और पूर्वव्यापी रूप से संशोधित नहीं किया जा सकता है. इस प्रकार की नीति “सबका साथ सबका विकास” (समिति रिपोर्ट के पैरा 1.18) के समर्थित दर्शन के विरुद्ध होगी.

6). जैसा कि ऊपर वर्णित है, ईपीएस-95 पेंशन योजना को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है और पेंशनभोगियों को कानून के प्रावधानों के अनुसार उच्च पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है. इतना ही नहीं आर.सी. गुप्ता के मामले में पारित सुप्रीम कोर्ट के 4-10-2016 के फैसले के विरुद्ध भारत सरकार ने 2014 में पेंशन योजना में बहुत ही अवैध संशोधन किए. अधीनस्थ विधानों की समिति, 2015-2016 ने इन संशोधनों को अवैध, मनमाना और असंवैधानिक ठहराया है.

फिर भी,  भारत सरकार ने संशोधनों को रद्द नहीं किया है. फिर, माननीय केरल उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 12-10-२०१८ के माध्यम से इन संशोधनों को अवैध रूप से मनमाना और असंवैधानिक ठहराया और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी 1-04-2019 को EPFO की अपील को खारिज करके इन संशोधनों को अवैध माना है. इसके बाद भी भारत सरकार ने उक्त संशोधनों को रद्द नहीं किया.

बल्कि EPFO ने एक समीक्षा याचिका दायर कर दी है और भारत सरकार ने भी उक्त आदेशों के खिलाफ SLP दायर की है. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की माह दर माह तारीखों के माध्यम से सुनवाई लंबित है.

इसके साथ ही समय की मार झेल रहे वृद्ध पेंशन भोगियों को कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है. भारत सरकार का यह रवैया पूरी तरह से पेंशन भोगियों के हित और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है.

7). “भगतसिंह कोश्यारी समिति” की सिफारिशों का कार्यान्वयन न करना
2014 से पहले, कुछ पेंशनभोगियों को 200-300/- रुपए मासिक पेंशन मिल रहे हैं. 2000- 2001 के आसपास सेवानिवृत्त हुए लोगों की आयु लगभग 80 वर्ष से अधिक हो चुकी है. कम ‘पेंशन योग्य वेतन’ और कम ‘पेंशन योग्य सेवा’ का कारण बताकर उन्हें बहुत कम पेंशन दिया जा रहा था. इन पेंशन भोगियों की बेहद खराब स्थिति को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन सांसद विपक्षी दल (भारतीय जनता पार्टी) के नेता श्री प्रकाश जावड़ेकर ने राज्यसभा में एक याचिका दायर की थी. श्री जावड़ेकर की उक्त याचिका को स्वीकार किया गया.

याचिका 7-11-2012 को स्वीकार की गई थी. भारत सरकार ने तत्कालीन सांसद श्री भगतसिंह कोश्यारी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. श्री जावड़ेकर द्वारा 23-11-2013 को याचिका प्रस्तुत की गई और फिर इसे समिति को स्थानांतरित कर दिया गया.

याचिका में कहा गया था कि ईपीएस-95 पेंशनभोगियों को बहुत कम पेंशन मिल रहा है और इसे बढ़ाकर न्यूनतम पेंशन 3000 रुपए करने की जरूरत है और इसे मूल्य सूचकांक से जोड़ा जाना चाहिए.

समिति ने 3-01-2013 को याचिका पर सुनवाई की. 5-02-2013 को सरकारी अधिकारियों को सुना, 29-07-2013 को अन्य को सुना और 29-08-2013 को मसौदे पर विचार किया. अवलोकन की अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की सितंबर 2013 में.

भारत सरकार को सिफारिशें
कमिटी ने न्यूनतम पेंशन 3000/- रुपए और उसी पर तदनुरूपी महंगाई भत्ते की सिफारिश की. समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिशों की व्यवहार्यता के लिए भी सुझाव दिया.

कमिटी की उक्त सिफारिश के बावजूद भारत सरकार (तत्कालीन कांग्रेस पार्टी सरकार) ने न्यूनतम पेंशन को बढ़ाकर 1000/-.रुपए करने बात कही. जबकि विपक्षी दल (भारतीय जनता पार्टी) डीए और न्यूनतम 3000 रुपए पेंशन की मांग कर रहा था.

फिर, 2014 में संसद के चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार सत्ता में आई. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने चुनावी अवधि में आश्वासन दिया कि यदि उनकी सरकार सत्ता में आती है तो वे भगतसिंह कोश्यारी कमिटी की सिफारिश को लागू करेंगे, न्यूनतम पेंशन को बढ़ाकर 5000/- रुपए करेंगे और इसी के साथ डीए का भुगतान भी करेंगे.

अब, भारतीय जनता पार्टी की सरकार पिछले सात वर्षों से सत्ता में है, लेकिन उसने भगतसिंह कोश्यारी समिति की सिफारिश को लागू नहीं किया है और एक पैसा भी पेंशन में वृद्धि नहीं की है. श्री प्रकाश जावड़ेकर, जिन्होंने याचिका दायर की थी, पिछले सात वर्षों से भारत सरकार में मंत्री हैं, फिर भी अब वे ईएफएस-95 पेंशन के बारे में एक शब्द भी नहीं बोल रहे हैं.

जिस पार्टी ने महंगाई भत्ता सहित न्यूनतम 3000/- रुपए की पेंशन की मांग की है, वह पिछले सात वर्षों से सत्ता में है, हालांकि, निर्वाचित होने से पहले दिए आश्वासन के बाद भी इस पेंशन में वृद्धि नहीं हुई है.

जैसा कि ऊपर कहा गया है, लगभग 30 लाख पेंशन भोगियों को 1000/- रुपए से कम मासिक पेंशन मिल रहा है. जबकि प्रासंगिक रूप से वे बहुत अधिक उम्र के हो चुके हैं, लगभग 80 वर्ष से भी अधिक.

8). पेंशनभोगियों की एक और पीड़ा यह है कि वे पेंशन योजना के सदस्य हैं, वे राज्य सरकार या केंद्र सरकार की कोई अन्य पेंशन पाने के पात्र नहीं हैं और न ही प्राप्त कर रहे हैं, जैसे कि श्रावण बाल पेंशन योजना, संजय गांधी निराधार योजना आदि पेंशन योजनाओं के तहत राज्य सरकारें वयोवृद्धों को पेंशन दे रही हैं.  .

ध्यान देने की बात है कि EPS-95 एकमात्र पेंशन योजना है, जिसे पिछले 20 वर्षों से संशोधित नहीं किया गया है. इस योजना के तहत पेंशन भोगियों को पिछले 20 वर्षों से वही समान पेंशन दिया जा रहा है.

दूसरी ओर, राज्य सरकार की पेंशन, केंद्र सरकार की पेंशन, अन्य पेंशन श्रवण बाल पेंशन योजना, संजय गांधी निराधार योजना आदि को समय-समय पर संशोधित किए जाते हैं. दुर्भाग्य की बात है कि, ईपीएस-95 पेंशन योजना की समीक्षा और इसमें संशोधन नहीं किया जाता है. यह मौलिक का उल्लंघन है.

पेंशनरों के नैसर्गिक अधिकार का हनन  
भुगतान की जा रही पेंशन की राशि चिकित्सा व्यय के लिए और जीवित रहने के लिए भी पर्याप्त नहीं है, जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत उनके जीवन के अधिकार का भी उल्लंघन है.
पेंशन आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से जुड़ी नहीं है और बैंकों की जमा राशि पर बैंकों की ब्याज दरों में कमी ईपीएस-95 के पेंशनरों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है. इस कारण वे बहुत कठिन परिस्थितियों में जी रहे हैं.

ईपीएस-95 के पेंशनरों को इंसान, देश के नागरिक और समुदाय के हिस्से के रूप में मानने के लिए, उन्हें सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक न्याय, सामाजिक स्थिति और जीवन की गरिमा दी जानी चाहिए और इसलिए, आप से (ILO से) हस्तक्षेप कर ईपीएस पेंशन भोगियों को न्याय दिलाने का अनुरोध किया जा रहा है.

ILO से अनुरोध –
ईपीएस पेंशनभोगियों के साथ हो रहे अन्याय और इस गंभीर समस्या पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने और भारत सरकार को निर्देश जारी करने के लिए अनुरोध किया जाता है. ILO से अपेक्षा है कि –

1). पेंशन को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़ने के साथ ईपीएस-95 पेंशन योजना को ठीक से लागू करवाने की कृपा करें

2). सभी पात्र पेंशनभोगियों के मामले में आर.सी. गुप्ता के मामले में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 4-10-2016 को लागू करें और ईपीएफओ द्वारा जारी परिपत्र दिनांक 31-05-2017 को रद्द करें.

3). जीएसआर 609(ई) दिनांक 22-08-2014 के तहत पेंशन योजना में किए गए संशोधनों को रद्द कराएं और माननीय केरल उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 12-10-2018 और माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश दिनांक 1-04-2019 का पालन करवाएं.

4). भगतसिंह कोश्यारी समिति की सिफारिशों को लागू करें.

5). पेंशनरों की अवैध रूप से रोकी गई संशोधित पेंशन को (बिना छूट वाले प्रतिष्ठानों) तुरंत बहाल करें और ब्याज सहित उसका भुगतान करें.  

6). भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भारत सरकार द्वारा दायर SLP और  EPFO द्वारा दायर समीक्षा याचिका को वापस लिया जाए एवं संशोधनों को अलग करते हुए केरल उच्च न्यायालय के आदेश के कार्यान्वयन में देरी न करें.

7). पेंशन भोगियों के हितों के खिलाफ दायर किए गए सभी मामलों/अपीलों को वापस लें और पेंशनभोगियों को अपने जीवन के अंतिम समय में कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर न करें.

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