बड़े अस्पताल दवा के नाम पर भी लूट रहे हैं मरीजों को

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एक ही कंपनी की, एक ही दवा की दो कीमतें, दवा कंपनियों से सांठगांठ

सुविज्ञ सूत्रों से,
गोरखधंधा :
देश के कॉरपोरेट अस्पताल इलाज के नाम पर तो लूट मचा ही रहे हैं, दवा के नाम पर भी मरीजों को खुलेआम लूट रहे हैं. इस गोरखधंधे में देश की नामी-गिरामी और प्रतिष्ठित दवा कंपनियां शामिल हैं. सूत्रों ने बताया कि ये अस्पताल इन दवा कंपनियों से सांठगांठ कर दवाओं की कीमताें में हेराफेरी का धंधा कर रहे हैं. इस पर किसी मरीज के परिजन को शक भी नहीं होता है. सुविज्ञ सूत्रों से पता चला है कि दवा कंपनियां अपने उत्पाद की कीमतों में हेराफेरी करती हैं.
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दवा कंपनियों के साथ सांठगांठ  
ये बड़े और प्रतिष्ठित अस्पताल प्रबंधन बड़ी चालाकी से दवा कंपनियों के साथ ऐसी सांठगांठ करते हैं. इस दुरभिसंधि के तहत कंपनियां एक ही कंपोजिशन की दवाओं की दो तरह की कीमत टैबलेट्स, इंजेक्शंस आदि पर अंकित करती हैं. इनमें एक पर कम कीमत और दूसरी पर दोगुनी या तीनगुनी कीमत दर्ज होती है. इस तरह एक ही दवा की कीमत में 2,500 से 3000 रुपए तक का अंतर देखने को मिलता है. चूंकि यह दोहरी कीमत वाली दवाएं अलग-अलग हैसियत वाले मरीजों के लिए दी जाती हैं, इस कारण आसानी से पकड़ में नहीं आता है. सबसे ज्यादा हेराफेरी एंटीबायोटिक दवाओं (जीवन रक्षक दवाओं) की कीमतों में होती है, जो मरीज को देना बेहद जरूरी होता है.  

दवा कंपनी से पहले ही तय कर लेते हैं मुनाफा
दवा कंपनियां दवाओं की एमआरपी (मैक्सिम रिटेल प्राइस) तय करने से पहले अस्पताल प्रबंधकों से बातचीत करती हैं. दवाओं की बिक्री से मिलनेवाला मुनाफा (मार्जिन) तय होने के बाद एक ही कंपोजिशन वाली दवाओं के लिए दो तरह की कीमतें तय की जाती हैं. इसके बाद प्रोडक्ट तैयार कर अस्पतालों को उसका  स्टॉक भेज दिया जाता है.

मरीज की हैसियत के हिसाब से उपयोग होती है दवा
अस्पताल में दो तरह की दवा आने के बाद मरीज की हैसियत के हिसाब से उसका उपयोग किया जाता है. अस्पताल में अगर ‘आयुष्मान भारत योजना’ के तहत या कोई गरीब मरीज इलाज करा रहा है तो उसके लिए सस्ती एमआरपी (1,089 रुपए) वाली दवा का इस्तेमाल किया जाता है.  वहीं, अगर मरीज के पास हेल्थ इंश्योरेंस कार्ड है या मरीज पैसेवाला है, तो उसी कंपनी की महंगी एमआरपी (3,619 रुपए ) वाली दवा का इस्तेमाल किया जाता है.

इसके अलावा सामान्य बुखार में भी महंगी एमआरपी वाली दवा का उपयोग किया जाता है. पारासिटामोल के इंजेक्शन की वास्तविक कीमत 30 से 40 रुपए होती है, जबकि एमआरपी 350 से 400 रुपए तक होती है.  

क्रिटिकल केयर यूनिट में सबसे ज्यादा महंगी दवाएं
अस्पताल में महंगी दवा का उपयोग सबसे अधिक क्रिटिकल केयर विंग में किया जाता है. यहां मरीज को पता होता है कि बीमारी बड़ी है और मरीज गंभीर है. ऐसे में उसको बताया जाता है कि जान बचाने के लिए  महंगी दवा देनी होगी, जिससे मरीज हर प्रकार का खर्च करने के लिए तैयार हो जाता है.  

दवा कंपनियां एक ही दवा के लिए तैयार करती हैं दो पैकिंग, दोनों की कीमतें अलग-अलग कीमत में होता है 2500 से 3000 रुपए तक का अंतर प्रभात खबर के पास कई कंपनियों की एक ही दवा की दो पैकिंग और उसकी अलग-अलग कीमत से संबंधित साक्ष्य मौजूद हैं.

ऐसे होता है एमआरपी पर खेल  
जैसे एक कंपनी ने एक एंटीबायोटिक दवा (इंजेक्शन) बनाई, जिसमें मॉलिक्यूल और कंपोजीशन एक ही है और उसके बनाने में खर्च भी एक ही आया है. फर्क सिर्फ इतना होता है कि इंजेक्शन के एक पैक में अतिरिक्त सूई डाल दी जाती है. जिसका उत्पादन लागत दो से पांच रुपए होता है.  लेकिन, कंपनी बिना सूई वाले इंजेक्शन की एमआरपी 1,089 रुपए और सूई के साथवाले इंजेक्शन की एमआरपी 3,619 रुपए निर्धारित करती है. यानी ऐसे एमआरपी में 2,500 रुपए का अंतर कर दिया जाता है. इसके बाद दवा की दोनों लॉट अस्पताल काे मुहैया करा दी जाती है.

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