बिहार : सुशासन बाबू को फिर याद आई “विशेष दर्जा” की मांग

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विशेष रिपोर्ट : सीमा सिन्हा,
पटना :
लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद भी मतदान का पांचवां चरण पूरा होने तक भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार को “विशेष दर्जा” दिलाने की अपनी मांग याद नहीं आई. लेकिन छठवां चरण बीतते ही इस मांग के लिए वे मुखर हो रहे हैं. जानकारों का मानना है कि अब लोकसभा चुनाव में पार्टी की डगमगाती नैया को संभालने के लिए नीतीश ने फिर पैंतरा बदला है. विरोधी कहते हैं, “नीतीश बिहार में अपना रुतबा खो चुके हैं. अब उनकी वह दबंग छवि भी नहीं बची, जो बिहार की राजनीति में बहुत मायने रखती है.”

सत्ता के लिए साझीदार बदलते-बदलते नीतीश कुमार निरीह बनते जा रहे हैं. लगातार अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मारते-मारते अपना कद अपने हाथों छोटा करते जा रहे हैं. एक समय था, जब नीतीश विपक्ष से प्रधानमंत्री पद के दावेदार हुआ करते थे. उन्हें तो लोग मोदी के विकल्प के रूप में भी देखने लगे थे. लेकिन आज स्थिति ऐसी बदली है कि अब वे अजूबा बन गए हैं.
"विशेष दर्जा"
अब बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के उनके मुद्दे पर ही नजर डालें, नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का स्टैंड पिछले पांच सालों में कुछ इस तरह बदला है-

मार्च 2014 : “हमारा अभियान स्पष्ट है, बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए.”

अगस्त 2015 : “बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देना मोदी सरकार का धोखा.”

अगस्त 2016 : “जब तक बिहार जैसे पिछड़े राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिया जाएगा, राज्य का सही विकास संभव नहीं है.”

अगस्त 2017 : “पीएम मोदी के मुकाबले कोई नहीं”, पार्टी ने इस दौरान विशेष दर्जा के मुद्दे पर अघोषित चुप्पी साधी!

मई 2019 : “ओडिशा के साथ-साथ बिहार और आंध्र प्रदेश को भी मिले विशेष राज्य का दर्जा.”

जदयू के महासचिव और प्रवक्ता के.सी. त्यागी ने इस बार बिहार के साथ-साथ ओडिशा और आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है. पिछले सोमवार को उन्होंने एक बयान जारी कर कहा, “साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद राज्य से प्राकृतिक संसाधनों के भंडार और उद्योग छिन गए. राज्य का विकास जैसे होना चाहिए था, नहीं हुआ. अब समय आ गया है कि केंद्रीय वित्त आयोग इस मुद्दे पर फिर से विचार करे.”

फिलहाल केंद्र और राज्य में समान गठबंधन की सरकार है और लोकसभा चुनाव चल रहे हैं. ऐसे में जदयू के इस बयान से राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं. 19 मई को अंतिम चरण में बिहार की आठ सीटों पर मतदान होने हैं. और नीतीश कुमार के विरोधियों का कहना है कि वो एक बार फिर पलटी मारने की तैयारी कर रहे हैं.

नवंबर 2015 में बिहार में जदयू ने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर राज्य में तीसरी बार सरकार बनाई थी. जुलाई 2017 में जदयू ने आरजेडी का साथ छोड़ एनडीए में फिर से आने का फैसला किया था, तब से इस मांग को लेकर वह चुप रही. चुनाव के आखिरी चरण में जदयू की इस मांग को नीतीश कुमार की दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है.

जानकारों का मानना है कि विशेष राज्य के मुद्दे को फिर से उठना भाजपा को असहज स्थिति में डाल सकता है. क्योंकि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही विशेष दर्जे की मांग को खारिज करते हुए कह चुके हैं कि ऐसी मांगों का दौर समाप्त हो चुका है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राजद का आरोप सही साबित होगा और जदयू भी टीडीपी की राह चलेगी, इस सवाल पर त्यागी कहते हैं, “हम भाजपा के साथ गठबंधन भी रखेंगे और अपनी मांग भी जारी रखेंगे. हमारी यह मांग बहुत पुरानी है. 2004 से यह मांग हम कर रहे हैं. नया प्रसंग नवीन पटनायक के बयान के बाद शुरू हुआ है, हमने अपनी मांग को सिर्फ़ दोहराया है.”

वहीं जानकार इसे “सुविधा की राजनीति” के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि जदयू इन सभी अशंका और आरोपों को खारिज कर रही है और भाजपा के साथ अपने रिश्ते को कायम रखने की प्रतिबद्धता जता रही है.

एक समय था, जब नीतीश कुमार को विपक्ष में प्रधानमंत्री पद का ऐसा दावेदार माना जाता रहा, जिसे लेकर सभी सहमत होते. लेकिन अब तो वे भारतीय जनता पार्टी के कई सहयोगियों में से एक हैं. वे बिहार के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन अपनी सरकार के अगुआ कहलाने भर के रह गए हैं. 68 वर्षीय नीतीश कुमार अब अपने सहयोगी दल भाजपा के आभामंडल में एक कैदी से नजर आने लगे हैं. पिछले ही महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक ही मंच पर उनके बुझे हुए चेहरे ने उनकी दशा जाहिर कर दी.
"विशेष दर्जा"
नीतीश ने मंच से भले ही ‘भारत माता की जय’ के नारे नहीं लगाए और मंच पर खामोश बैठे रहे, लेकिन इससे उनकी शाख में कोई सुधार हुआ हो, ऐसा दिखाई नहीं दिया. मोदी की उस बिहार रैली में नीतीश शांत बैठे रहे, जबकि बाकी लोग वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे.

नीतीश के बयानों में पहले पंच की कोई कमी नहीं थी. अपने विरोधियों और प्रतिद्वंदियों पर उनके तीखे कटाक्ष सुर्खियां भी बनती थीं. लेकिन अब स्वयं कटाक्ष के तीखे बाण झेलते-झेलते वे भावशून्य की स्थिति को प्राप्त होते दिखाई पड़ने लगे हैं.

सत्ता के लिए अपनी सारी कलाबाजियों में कुमार को भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध ईमानदार राजनीतिज्ञ की अपनी छवि धूमिल होती नहीं दिखी. परिश्रम से गढ़ी हुई सुशासन बाबू की उनकी छवि अब बिखरने लगी है. जिस लालू यादव के ‘जंगल राज’ को खत्‍म करने का श्रेय उन्हें मिला था, वही लालू यादव, अब जेल की चाहरदीवारी से भी आए दिन उन्हें घायल कर रहे हैं. लालू के पंचलाइनों के साथ-साथ उनके पुत्र राजग नेता और कभी उनकी सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव बड़ी रैलियों में बेहद चपलता से हास्‍य के साथ उनको निशाना बनाते रहते हैं और उन्‍हें ‘चच्‍चा’ कहकर पुकारते हैं.

2016 में नीतीश कुमार ने राज्‍य में शराब पर प्रतिबंध लगा दिया, जो शायद गुजरात से प्रेरित था और अब वह गलत फैसला माना जा रहा. क्योंकि उनकी ही पार्टी के कई लोग शराब की कालाबाजारी में लिप्‍त पाए गए. दूसरी ओर राज्य के थाने ही अवैध शराब के सप्लायर बन गए.

एक समय था- उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी थे. 2015 में कुमार ने लालू के साथ प्रतिद्वंदिता को खत्म करते हुए उनके और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया. लेकिन 2017 में वे वापस भाजपा के नेतृत्‍व वाले एनडीए में शामिल हो गए. राजनीति में सबसे सख्‍त मोलभाव करने वाला माने जाने वाले अमित शाह ने इस बार लोकसभा चुनाव में भले ही नीतीश के लिए भाजपा जितनी, यानी 17 सीटें छोड़ी हों, लेकिन यह केवल राजनीतिक फायदे के लिए है, न कि एनडीए में नीतीश कुमार के बढ़े हुए दर्जे का प्रतिबिंब है.

लालू की पार्टी के नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, “लालू को जेल में डालकर चुनाव लड़ने से रोका गया है, लेकिन आश्‍चर्य है कि वह अब भी दबंग हैं. लोग ये भी जानते हैं कि नीतीश मोदी से अपनी लड़ाई हार चुके हैं और मतदाता हारे हुए लोगों को पसंद नहीं करता.”

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