भारत में रविवार की छुट्टी किसने दिलाई? जानिए क्या है उद्देश्य और इतिहास!

यह जानना सुखद लगता है कि मजदूरों के शोषण के विरुद्ध अपने देश में भी कभी किसी भारतीय ने ही आठ वर्षों तक आंदोलन चला कर तत्कालीन अंग्रेज सरकार को बाध्य किया था कि वह मजदूरों को सप्ताह में कम से कम एक दिन का अवकाश घोषित करे

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नारायण मेघाजी लोखंडे.

प्रवीण बागी
हालांकि 137 वर्षों बाद भी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के शोषण में आज भी विशेष कमी नहीं आई है, फिर भी यह जानना सुखद लगता है कि मजदूरों के शोषण के विरुद्ध अपने देश में भी कभी किसी भारतीय ने ही आठ वर्षों तक आंदोलन चला कर तत्कालीन अंग्रेज सरकार को बाध्य किया था कि वह मजदूरों को सप्ताह में कम से कम एक दिन का अवकाश घोषित करे और उस एक छुट्टी के दिन का उसकी मजदूरी अथवा वेतन नहीं काटा जाए. अफसोस की बात तो यह है कि ऐसे महापुरुष को आज भी वामपंथी नेतृत्व के मजदूर आंदोलन के लोग भी याद नहीं करते.

1881 में शुरू किया गया आंदोलन 8 वर्षों बाद रंग लाया

उस महापुरुष के कारण ही देश के मजदूरों और कर्मचारियों के लिए सरकार ने रविवार को साप्ताहिक अवकाश का दिन घोषित करने पर बाध्य हुई. उस महापुरुष का नाम है “नारायण मेघाजी लोखंडे”. लोखंडे जी ने यह आंदोलन 1881 में शुरू किया था. उन्होंने अंग्रेजी सरकार के समक्ष 1881 में ही यह प्रस्ताव रखा था. लेकिन अंग्रेज इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे. अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध उन्होंने इसके लिए जो आंदोलन शुरू किया, वह दिन ब दिन जोर पकड़ता गया और आखिरकार 1889 में अंग्रेजों को रविवार के दिन को साप्ताहिक अवकाश का दिन घोषित करने के लिए मजबूर होना पड़ा. अब तो सप्ताह में दो दिनों के अवकाश की ओर हम बढ़ रहे हैं. यह दो दिन भी समाज के काम कभी आ सकेगा, इसमें संदेह ही है.

समाज के लिए साप्ताहिक अवकाश

नारायण मेघाजी लोखंडे तत्कालीन पुना (अब पुणे) में शिक्षा महर्षि और विख्यात समाजसेवी महात्मा ज्योतिराव फुलेजी के सत्यशोधक समाज आन्दोलन के सक्रीय कार्यकर्ता थे. साथ ही वे कामगार नेता भी थे. अंग्रेजों के समय में सप्ताह के सातों दिन मजदूरों को काम करना पड़ता था. लेकिन नारायण मेघाजी लोखंडे जी का मानना था कि सप्ताह में सात दिन हम अपने परिवार के लिए काम करते हैं, लेकिन जिस समाज की बदौलत हमें नौकरियां मिली हैं, उस समाज की समस्या की ओर ध्यान देने और समस्या दूर करने के लिए हमें एक दिन छुट्टी मिलनी ही चाहिए. उनका मानना था कि मजदूरों, कर्मचारियों के सप्ताह के अवकाश का एक दिन समाजसेवा के लिए होना चाहिए.

मनोरंजन और आराम का दिन बन गया

परिवार की समस्या पर ध्यान देने के साथ ही मजदूर और कर्मचारी अपने समाज के लिए भी काम आ सकें, इस उद्देश्य से लोखंडे जी का यह आंदोलन इस मायने में सफल तो हो गया कि मजदूरों को सप्ताह का एक दिन सवैतनिक अवकाश का मिल गया, लेकिन थोड़े समय बाद ही स्वयं मजदूरों और कर्मचारियों ने ही लोखंडे जी के सपनों को धुसरित करना शुरू कर दिया. अब समाज सेवा की बात गौण होती चली गई है. अब तो 90 प्रतिशत से अधिक मजदूर और कर्मचारी साप्ताहिक अवकाश को मात्र अपने मनोरंजन और आराम का दिन ही मानने लगे हैं.

साप्ताहिक अवकाश पर हमारा हक नहीं, “समाज का हक” है

अनपढ़ लोगों को भले ही लोखंडे जी के इस देन की जानकारी न हो, पढ़े-लिखे लोग भी इसके बारे में या इसके उद्देश्य के बारे में जानने की कोशिश नहीं करते. लोखंडे जी की अपेक्षाओं की जानकारी होना उनके लिए तो संभवतः जरूरी नहीं भी हो, उद्देश्य की परवाह उन्हें कितनी होगी, कहा नहीं जा सकता. साप्ताहिक अवकाश पर अगर समाज का काम मजदूर और कर्मचारी वर्ग द्वारा ईमानदारी से हो तो समाज में भुखमरी, बेरोजगारी, बलात्कार, गरीबी, लाचारी, साम्प्रदायिकता, धार्मिक उन्माद जैसी समस्या का निदान ढूंढना बड़ी बात नहीं हो सकती. इस बात को समझाने का समय पता नहीं कब आएगा, लेकिन सभी को समझना होगा कि साप्ताहिक अवकाश पर हमारा हक नहीं है, इसपर “समाज का हक” है.

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