देश के विधायिका प्रमुख, न्याय प्रमुख जब भाषा प्रश्न पर हों एक मत..!

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फिर भी भाषायी जटिलता की कुटिलता में फंसी हुई है देश की न्यायिक प्रणाली और न्यायिक फैसले

*कल्याण कुमार सिन्हा-
विश्लेषण : हाल ही में चेन्नई के एक आयोजन में देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) एन.वी. रमना ने भी कहा था कि ‘न्यायिक प्रक्रिया शादी के मंत्रों जैसी जटिल नहीं होनी चाहिए, जिसे लोग समझ ही न सकें.’ इसी बात की पैरवी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में की है.
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पिछले शनिवार, 30 अप्रैल को सम्मलेन का उदघाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘न्याय जनता से जुड़ा हुआ होना चाहिए और जनता की भाषा में होना चाहिए.’ इसी कार्यक्रम में फिर सीजेआई रमना ने भी भारतीय न्याय प्रणाली के भारतीयकरण पर जोर देते हुए उच्चतम और उच्च न्यायालयों में स्थानीय भाषा में कार्यवाही की आवश्यकता को रेखांकित किया.

देश की विधायिका के प्रमुख और दूसरी ओर न्यायपालिका के प्रमुख जब न्यायालयों की भाषा के प्रश्न पर एक मत हों, तब देश की न्याय प्रणाली को देश की 130 करोड़ जनता के साथ जोड़ दिए जाने से और अच्छी बात क्या हो सकती है. देश के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारियों के लिए संबंधित राज्य की भाषा पर कमान अनिवार्य है. न्यायिक सेवा के अधिकारियों और न्यायाधीशों के लिए भी तो यह जरूरी होना चाहिए. वकीलों के लिए तो यह और भी जरूरी है, चाहे वे भारी-भरकम फीस लेने वाले देश की सर्वोच्च अदालत में मुकदमों की पैरवी करने वाले क्यों न हों.

अंग्रेजी की गुलामी…शर्म की बात है..!

देश अंग्रेजों की गुलामी से तो मुक्त हो गया, लेकिन देश की जनता अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त नहीं हो पाई है. शर्म की बात है, अंग्रेजी को आजादी के 74-75 साल बाद भी हुक्मरानों ने देश की वैसी बहुसंख्य जनता पर लाद रखी है, जिनका अंग्रेजी से दूर-दूर तक का भी नाता नहीं है. अंग्रेजी के न्यायिक फैसले अधिकांश मामलों में बरगलाने और गुमराह कर उन्हें धनशोधन का शिकार भी बनाते रहे हैं. जब सीजेआई रमना यह कहते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया ‘शादी के मंत्रों जैसी जटिल’ नहीं होनी चाहिए तो निश्चय ही उनका यह अनुभव सिद्ध ज्ञान रहा होगा कि कैसे अंग्रेजी के माध्यम से चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया जनसाधारण के लिए भयावह होती जा रही है.

भाषा की बात करें तो यह मानना होगा कि देश की लगभग आधी जनसंख्या हिंदीभाषी है. लेकिन हिंदी देश के सभी राज्यों के जनसाधारण की भाषा नहीं है. भाषा तो हमारे देश के राज्य रूपी बागों के अलग-अलग रंगों, खुशबू और अलग-अलग छवि वाले सुंदर-सुंदर फूलों की तरह हैं. हमारे देश में अनेक समृद्ध भाषाएं हैं और उनकी भाषा-भाषी अंग्रेजी के मोहताज नहीं हैं. वहां हिंदी को लादने की जरूरत भी नहीं है, न्यायिक प्रक्रिया में तो बिलकुल ही नहीं. अहिन्दी भाषी राज्यों में हिंदी जानने की इच्छा पैदा करना ही काफी होगा.

संविधान के प्रावधान

संविधान निर्माताओं ने कम से कम 15 वर्षों तक अंग्रेजी में राजकीय कामकाज की भी मंजूरी दी थी. उन्होंने अपेक्षा की थी कि 1965 के बाद अंग्रेजी में कामकाज बंद हो जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. भारतीय संविधान के जानकारों के अनुसार संविधान के 17वें भाग में राजभाषा से संबंधित नौ अनुच्छेदों (343-351) में से एक, अनुच्छेद 348 में स्पष्ट उल्लेख है सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सारी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में होगी.

हालांकि अनुच्छेद 348 (2) के मुताबिक किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से वहां के उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में हिंदी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकता है. परंतु न्यायालय के निर्णय, डिक्री और आदेश फिर भी अंग्रेजी में ही होंगे.

…तब न्यायिक प्रक्रिया की लाचारी बन जाती है

इसी शक्ति का प्रयोग करके भारत के कुछ राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल, बिहार और झारखंड ने अपने-अपने उच्च न्यायालयों में कार्यवाही के लिए हिंदी को प्राधिकृत कर रखा है. देश के सबसे बड़े इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लोग हिंदी में बहस कर सकते हैं, लेकिन वहां जब सुनवाई करने वाले न्यायाधीश हिंदी नहीं समझते हों तो उनकी लाचारी का खयाल रखा जाना जरूरी होता है. विद्वान न्यायाधीशों की ऐसी लाचारी का ध्यान रखना तब न्यायिक प्रक्रिया की लाचारी बन जाती है. देश के अन्य भाषा-भाषी राज्यों में भी शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली भाषा का न्यायालयों में प्रयोग हो रहा है. लेकिन फैसले, डिक्री और आदेश फिर भी अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं.

प्रधानमंत्री द्वारा भी स्थानीय भाषा की पैरवी करने के पीछे यही कारण होगा. भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है. परंतु पूरे देश की एक भाषा होना अत्यंत आवश्यक है, जो विश्व में भारत की पहचान बने. लेकिन यह अंगरेजी तो बिलकुल ही नहीं होनी चाहिए. आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वह सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी ही है. सभी राज्य अपनी-अपनी मातृभाषा के प्रयोग को जरूर बढ़ाएं, लेकिन जरूरी यही है कि साथ में हिंदी भाषा का भी प्रयोग कर देश की एक भाषा के रूप में हिंदी को सशक्त बनाया जाए.

न्याय प्रणाली में अंग्रेजी हावी है

हाल में 37वीं संसदीय राजभाषा समिति की अध्यक्षता करते हुए भी केंद्रीय गृह मंत्री ने हिंदी के पूरे देश में अंग्रेजी के विकल्प के रूप में विकसित करने की वकालत की थी. लेकिन हिंदी आधिकारिक तौर पर राष्ट्रभाषा नहीं है. इसे सिर्फ राजभाषा का दर्जा प्राप्त है. भारतीय संविधान सभा की 12, 13 और 14 सितंबर 1949 की बैठकों में भाषा को लेकर बहस हुई थी. इनमें हिंदी बनाम बंगाली, तेलुगू, संस्कृत और हिंदुस्तानी, देवनागरी लिपि बनाम रोमन लिपि इत्यादि पर चर्चा हुई थी और अंत में तय किया गया था कि देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी भारत की राजभाषा होगी. लेकिन भारतीय न्याय प्रणाली में अंग्रेजी हावी है. हिंदी भाषी राज्यों के अधिकतर न्यायाधीश और वकील हिंदी लिख, पढ़ और बोल सकते हैं, इसके बावजूद वहां अदालतों की कार्यवाही हिंदी में नहीं होती. उच्च न्यायालयों में भी नहीं. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है.

नौकरशाहों के साथ जब भारत के दूरदराज से आने वाले सांसद हिंदी और शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली संबंधित राज्य की सीख कर उस भाषा में राजकीय काम करते हैं, तो न्यायपालिका में इसे क्यों नहीं लागू किया जा सकता? प्रश्न केवल अदालतों में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग से देश के सामान्य नागरिकों का न्याय प्रणाली में भरोसा बढ़ाने और उससे जुड़े होने को महसूस कराने का नहीं है. जरूरी यह है कि देश का जनसाधारण न्यायिक फैसलों और प्रक्रिया से गुमराह होने से बच सके.
 

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