सम्पूर्ण क्रांति का उद्घोष, क्यों किया था जेपी ने…?

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सम्पूर्ण क्रांति

आज लहरों में निमंत्रण, तीर पर कैसे रुकूं मैं..?

देश में सम्पूर्ण क्रांति का बीजारोपण करने वाले महान लोकनायक जयप्रकाश नारायण सन 1974 में सम्पूर्ण क्रांति का सिंहनाद किया था, तब उन्होंने कहा था- “सम्पूर्ण क्रांति से मेरा तात्पर्य समाज के सबसे अधिक दबे-कुचले व्यक्ति को सत्ता के शिखर पर देखना है.” लोकनायक ने स्पष्ट किया था कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियां शामिल हैं – राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति. इन सातों क्रांतियों को मिलाकर होती है- सम्पूर्ण क्रांति. पटना के जिस ऐतिहासिक गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आहवान किया था, उस मैदान में उपस्थित लाखों लोगों ने जात-पात, तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लिया था. उसी मैदान में हजारों-हजार ने अपने जनेऊ तोड़ दिए थे. नारा गूंजा था –
जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो.
समाज के प्रवाह को नई दिशा में मोड़ दो.
सम्पूर्ण क्रांति का उनका यह उद्घोष राजनीतिक नहीं, पूर्णतया लोकतंत्र को मजबूती देने वाला और देश के निम्न तबके के लोगों भी सम्मान के साथ जीने के साथ सभी क्षेत्रों में शिखर पर पहुंचाने वाला था. लेकिन इंदिरा गांधी इसे अपना विरोध मान बैठीं. उन्होंने आंदोलन को कुचलने का मार्ग चुन लिया. उन्होंने जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन की तपिश को समझने की कोशिश ही नहीं कीं. अपने विरुद्ध दायर चुनाव याचिका के फैसले को दरकिनार करने के लिए उन्होंने न केवल न्यायपालिका को, बल्कि लोकतंत्र का गला मरोड़ने के लिए देश में आतंरिक आपात काल की घोषणा भी करवा दी. श्रीमती गांधी अपने चापलूसों के “इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया” कथन को सच मान बैठी थीं. और जब 1978 में सत्ता के उसी मद में आम चुनाव की घोषणा कर जनता के बीच आईं, तब भी उन्हें आम लोगों के गुस्से का अंदाजा नहीं हो पाया. देश की जनता की नाराजगी इतनी भयानक थी कि न केवल केन्द्र से, बल्कि राज्यों से भी कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया. अपनी जिस कुर्सी को बचाने के लिए उन्होंने इतना कुचक्र रचा था, वह भी काम नहीं आया, वे स्वयं भी प्रधानमंत्री पद गंवा बैठीं. वयोवृद्ध लेखक डॉ. चन्द्रविजय चतुर्वेदी जी ने अपने इस आलेख में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और उनके सम्पूर्ण क्रांति के उद्घोष की विवेचना की है. ब्लॉग ‘मीडिया स्वराज’ में प्रकाशित उनका यह आलेख जेपी के जन्म दिवस पर प्रस्तुत है… -संपादक

*डॉ. चंद्र विजय चतुर्वेदी
गांधीजी के नेतृत्व में
देश के आजादी की जो लड़ाई लड़ी गई थी, उसके बाद आजाद भारत में संसदीय लोकतंत्र की आवश्यकता भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में मौलिक परिवर्तन लाने के लिए एक सशक्त विकल्प के रूप में महसूस की गई थी.

आजादी के रजत जयंती वर्ष तक आते-आते जनसामान्य यह स्पष्टतः महसूस करने लगा था कि जिस व्यवस्था में वह जी रहा है, क्या वह वास्तव में लोकतांत्रिक है? क्या संसद और विधानसभा लोकतंत्र के वाहक रह पाए हैं? आम आदमी की रोटी और आजादी, राजनीति का शिकार होती चली जा रही है. जो राजनीति आम आदमी की उद्धारक हो सकती थी, वह मात्र एक सत्ता में बने रहने की “तरकीब” बन कर रह गई. लोगों को इस व्यवस्था के बदलाव के लिए एक नायक की तलाश महसूस होने लगी थी.

डॉ. लोहिया के बिना राष्ट्र का विरोध पक्ष सूना होता चला गया था. डॉ. लोहिया की कल्पना थी कि विरोध एक आंदोलन का रूप ले और उन्होंने इस बात की चेष्टा भी की थी कि सभी विरोधी दल सही अर्थों में अपनी भूमिका का निर्वाह करने में, आपस के आरोप – प्रत्यारोप से आगे बढ़कर एक व्यापक मंच पर कुछ कार्यक्रम के साथ एकत्रित हों. सन् 1967 में विपक्षी दलों को जो अवसर मिला था, उसमें वे एकमत होकर जनसामान्य की आकांक्षाओं के लिए कुछ नहीं कर सके. लोहिया का स्वप्न अधूरा ही रह गया. उनके स्वप्न को मूर्त रूप देने के लिए एक नायक की तलाश थी.

कांग्रेस, जिसने गांधी जी को काफी पीछे छोड़ दिया था, उसके अंतर्विरोध को भी एक नायक की तलाश थी. (जो आज भी चल रही है.)

क्रांति के साथ जयप्रकाश जी -जेपी का पुराना लगाव रहा. आजादी के संघर्ष में राष्ट्रीय क्रांति के बाद सामाजिक क्रांति की दिशा में उन्होंने निरंतर कार्य किया. उन्होंने महसूस किया कि लोकतांत्रिक सरकारें लोक के प्रति जिम्मेदार रहने के बदले स्वच्छंद और निरंकुश बनती जा रही हैं. सर्वोदय जैसी सामाजिक संस्थाओं के रचनात्मक कार्य भ्रष्ट व्यवस्था की बलि चढ़ते जा रहे हैं. उस क्रान्ति से भी जे पी का मोहभंग होता जा रहा था.

दिसम्बर ’73 में जेपी, विनोबा जी से मिलने पवनार आश्रम पहुंचे, वहीँ उन्होंने ‘यूथ फार डेमोक्रेसी’ का आह्वान करते हुए देश के नवयुवकों से कहा – दुनिया के कई देशों में विद्यार्थियों ने अपने देश की भाग्य रेखा को बदलने में निर्णायक रूप से हाथ बंटाया है. भारत में भी राष्ट्रीय रंगमंच पर नौजवानों को अपना निर्णायक पार्ट अदा करके लोक शक्ति की सर्वोपरिता सिद्ध करनी चाहिए और पैसा, झूठ और पशुबल के बोलबाले पर विजय प्राप्ति करनी चाहिए. वह घड़ी आ चुकी है.

देश के क्षितिज पर क्रान्ति के बादल मंडराने लगे थे. गुजरात के विद्यार्थियों ने नवनिर्माण समिति के बैनर के तले आंदोलन शरू कर दिया था. फरवरी ’74 में जेपी गुजरात पहुंचे. छात्रों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने बच्चन जी की पंक्ति दोहरायी – ‘आज लहरों में निमंत्रण, तीर पर कैसे रुकूं मैं.’

यहीं से सम्पूर्ण क्रांति का उद्घोष हुआ. गुजरात आंदोलन भले कोई स्वरूप न ग्रहण कर सका हो पर छात्रों ने जनता के व्यापक मांगों के लिए संघर्ष की शुरुआत तो कर ही दी. जेपी ने छात्रों से नवनिर्माण की रूपरेखा तैयार करने की अपील की.

18 मार्च 1974 को बिहार के छात्रों ने विधानसभा का घेराव करने का निर्णय लिया. वह एक कलंक का दिन साबित हुआ. बिहार विधानसभा के सामने सत्याग्रह कर रहे विद्यार्थियों पर अंधाधुंध लाठियां और गोलियां चलाई गईं. पटना शहर में जगह-जगह आगजनी, लूटपाट हुई. अंग्रेजी अखबार ‘सर्च लाइट’ का दफ्तर घंटों जलता रहा.

ऐसा लगा, जैसे सारे शहर में प्रायोजित हिंसा हुई हो. शासक वर्ग की ओर से जयप्रकाश जी और उनसे सम्बंधित संस्थाओं को बदनाम करने का कुचक्र रचा जाने लगा. जेपी ने शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए लोक शिक्षण प्रारम्भ किया. 8 अप्रैल को पटना में शांति मार्च हुआ. 9 अप्रैल को एक आम सभा में जेपी ने घोषणा की- “यह शांतिपूर्ण आंदोलन का प्रारम्भ है. इसके आगे हमें सत्याग्रही की भूमिका में काम करना है. एक सरकार के जाने और दूसरी सरकार के आने भर से हमारा काम चलेगा नहीं. यह तो भूत के जाने और प्रेत के आने जैसी बात होगी. इसलिए हमें समाज की बीमारियों की जड़ में जाना होगा.”

5 जून 1974 भारत के इतिहास का वह अविस्मरणीय दिन है, जब पटना के गांधी मैदान में उपस्थित विशाल जन समुदाय को सम्बोधित करते हुए लोकनायक जेपी ने बिहार विधानसभा को भंग करने की मांग के साथ ही सम्पूर्ण क्रान्ति की उद्घोषणा करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य बहुत दूरगामी है. वह है भारत में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना. नैतिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक क्रांति के माध्यम से अन्याय और शोषण मुक्त समाज की संरचना.

यद्यपि जेपी के समक्ष मुख्य ध्येय था- लोक जागरण और लोक चेतना, पर उन्हें न चाहते हुए भी राज्य शक्ति से संघर्ष करना पड़ा. उन्होंने 1 नवम्बर ’74 को इंदिरा जी से भी मुलाकात की. तमाम मुद्दों पर उनसे विस्तार से चर्चा की, पर बिहार विधानसभा भंग करने के प्रकरण पर इंदिरा जी ने जेपी को ही चुनौती देते हुए कहा –’मैं इस्तीफा देना पसंद करुंगी, पर बिहार विधानसभा भंग करने को तैयार नहीं होउंगी.’ जयप्रकाश जी कहते हैं कि जनता उनके आंदोलन के साथ है तो उन्हें सब्र से काम लेना चाहिए. इस बात का फैसला अगले चुनावों में होगा. जेपी को इंदिरा जी की चुनौती स्वीकार करनी ही पड़ी.

सम्पूर्ण क्रांति के प्रवाह की दिशा बदलने लगी, राजनीतिक दलों के युवा संगठन सक्रियता से छात्र संघर्ष समिति में जुड़ने लगे. मुख्य रूप से समाजवादी युवजन सभा, आरएसएस तथा सर्वोदयी मानसिकता के युवा आंदोलन से जुड़ रहे थे. जिन्हें यह बात विशेष रूप से समझाई जाती थी कि उन्हें सम्पूर्ण क्रान्ति का वाहक बनना है. यह मात्र सत्ता के विरुद्ध संघर्ष नहीं है. पर ‘कैप्चर आफ पावर’ की मानसिकता से राजनीतिक घुट्टी पी चुके लोग मुक्त नहीं हो पाते थे. जेपी राज्य शक्ति पर लोक शक्ति के अंकुश का अलख जगाते देश की युवा शक्ति को जागृत करते रहे.

सन् 1969 में आम आदमी के समक्ष श्रीमती गांधी का स्वरूप एक क्रांतिकारी के रूप में उभरा था. पर धीरे-धीरे वे खुद को स्थायी सत्ता की अधिकारिणी समझ बैठीं. वे न तो जनता के प्रति जवाबदेह रह गईं और न विपक्ष के प्रति. न्यायपालिका और विधायिका के बीच का संतुलन समाप्त होने लगा. नौकरशाह तथा सिविल बुद्धिजीवी वर्ग महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मामलों में निर्णयात्मक भूमिका अदा करने लगे. राज्य की हिंसा से मुक्ति दिलाने के जेपी के प्रयास में सहयोग करने की बजाय श्रीमती गांधी जेपी के साथ संघर्ष में उतर आईं और वे ताकतें जो कभी महात्मा गांधी को फासिस्ट कहती थीं, उनके साथ मिलकर जेपी को फासिस्ट कहने लगी. कांग्रेस के चंद्रशेखर, मोहन धारिया आदि नेताओं के सुझाव को न मानकर श्रीमती गांधी ने अपनी छवि धूमिल ही की.

जन आकांक्षाओं के लिए जेपी सर्व सेवा संघ से भी अलग हो गए. समय की मांग थी कि गांधी के विचारों के अनुयायी विनोबा जी इस सत्याग्रह में आगे आते, पर उन्होंने अपना मौन भंग कर जेपी से एकांत में कहा कि अगर इस संघर्ष में श्रीमती गांधी पीछे नहीं हटतीं तो वे ही पीछे हट जाएं. जेपी के लिए यह आत्मघाती प्रस्ताव था. वे जनाकांक्षाओं के साथ विश्वासघात नहीं कर सकते थे. इसीलिए वे स्वतः सर्वसेवा संघ से हट गए.

12 जून 1975 को अचानक ही सम्पूर्ण क्रांति की धारा में एक नया मोड़ आ गया, जब माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती गांधी के खिलाफ दायर की गई चुनाव याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए चुनाव सम्बन्धी भ्रष्टाचार के लिए इंदिरा जी को दोषी ठहराया और उनका चुनाव रद्द कर देने की घोषणा की. विरोधी दलों को इंदिरा जी के खिलाफ यह बड़ा अस्त्र मिल गया. उन्होंने इंदिरा जी से त्यागपत्र मांगने के लिए दिल्ली में एक प्रदर्शन का आयोजन किया. यद्यपि जेपी ने प्रारम्भ में इस प्रदर्शन में भाग न लेने का मन बनाया था.

विरोधी दल के नेताओं के दबाव में आखिरकार जेपी 23 जून को दिल्ली पहुंचे और उस रैली में शामिल हुए. 25 जून को रामलीला मैदान में आयोजित आम सभा के मुख्य वक्ता जेपी ही थे. श्रीमती गांधी और उनके सलाहकारों ने इस्तीफे की बात को राजनीति समझा. उसे नैतिकता और लोकतान्त्रिक मूल्यों की दृष्टि से नहीं सोचा.

विनाशकाले विपरीत बुद्धि! 26 जून 1975 को इंदिरा जी ने अपने सिंहासन को बचाने के लिए आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी. सम्पूर्ण क्रांति के सेनानियों और विरोधी दलों के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया. लोकतंत्र पर यह घातक प्रहार देश के लिए अविस्मरणीय रहा. ऐसा लगा मानो सम्पूर्ण क्रांति और लोक चेतना की अवधारणा मझधार में ही अटक गई. लेकिन क्रांति एक सतत प्रक्रिया है. इसकी अवधारणा को फलित होने में महीनों नहीं, वर्षों लगते हैं. सन 1974 से अब तक 47 वर्ष के इस अंतराल में देश में आ रहे बदलावों के फलित एक के बाद एक सामने आ रहे है. जयप्रकाश नारायण ने जो बीजारोपण किया था, उस सम्पूर्ण क्रांति के दौर में भारत और भारत की जनता आज आगे बढ़ रही है.

सम्पूर्ण क्रांति
डॉ. चंद्र विजय चतुर्वेदी.

Media Swaraj से साभार

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