वैधानिक विकास मंडल क्यों? अब विदर्भ राज्य क्यों नहीं?

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वैधानिक विकास मंडलों के कार्यकाल का विस्तार नहीं करने के मंत्रिमंडलीय निर्णय ने दिया है भाजपा को स्वर्णिम अवसर

 
*मोरेश्वर बड़गे-
वैधानिक“बड़गे बोलतोय” दैनिक लोकमत का एक लोकप्रिय स्तम्भ (कॉलम) हुआ करता था. वरिष्ठ पत्रकार मोरेश्वर बड़गे के सेवानिवृत होते ही लोकमत से यह कॉलम लुप्त हो गया. “विदर्भ आपला” के लिए एक बार फिर से बड़गे जी ने अपना यह कॉलम लिखना शुरू किया है. विश्वास है कि उनके मराठी के पाठक (वाचक) वर्ग सहित हिंदी के पाठक भी इसे अपना स्नेह और समर्थन देंगे. -संपादक.  

महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और राज्य की आघाडी सरकार के बीच की लड़ाई ने अब भयानक रूप ले लिया है. विधान परिषद में नियुक्त किए जाने वाले 12 विधायकों के नामों की सूची राज्यपाल द्वारा अवरुद्ध करने का मामला इसकी जड़ में है. इसलिए ग्रैंड अलायंस (आघाड़ी) में अशांति व्याप्त है. इस कारण अब सरकार ने विदर्भ और मराठवाड़ा के वैधानिक विकास बोर्डों की बहाली को रोकने का फैसला कर लिया है.
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स्वर्णिम अवसर दिया है भाजपा को स्वयं आघाड़ी सरकार ने 
सोमवार, 1 मार्च को यह लड़ाई जब विधानसभा में मुखर हुई तो राजनीति गरमाने लगी है. राज्य विधानसभा के अगले चुनाव 2024 में हैं. आघाड़ी सरकार के इस रुख को देखते हुए अगर भाजपा इस समय विदर्भ राज्य की मांग उठाती है तो आश्चर्य की बात नहीं हो सकती. आघाडी सरकार ने ही भाजपा को ऐसा कुछ करने का स्वर्णिम अवसर दिया है. पिछले महागठबंधन (राजग) में शिवसेना के साथ होने के कारण भाजपा को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. सेना द्वारा राजग छोड़ने के साथ, भाजपा अब विदर्भ राज्य की मांग करने के लिए स्वतंत्र हो चुकी है.

राज्य के बजट सत्र के पहले दिन, वैधानिक विकास बोर्डों का मुद्दा उठाया गया था. भाजपा नेता और पूर्व वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को जैसे ही विधानसभा की कार्यवाही शुरू हुई, उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया. मुनगंटीवार ने सरकार से पूछा, वैधानिक विकास बोर्ड कब स्थापित किए जाएंगे? 72 दिन बाद भी कोई फैसला क्यों नहीं हुआ है.

भयावह प्रतिक्रिया उपमुख्यमंत्री अजित पवार की
उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री अजित पवार की प्रतिक्रिया भयावह थी. पवार ने राज्यपाल द्वारा संचालित सरकार की बाधा की ओर विपक्ष का ध्यान आकर्षित किया. पवार ने कहा कि बोर्ड गठन के बारे में नाराज होने का कोई कारण नहीं है. लेकिन हमारी कैबिनेट ने निर्णय लिया है. हम उस दिन बोर्ड की घोषणा करेंगे, जिस दिन गवर्नर सरकार द्वारा भेजे गए 12 विधायकों के नाम की घोषणा विधान परिषद में करने के लिए करेंगे.

अजित पवार के जवाब ने मुनगंटीवार को नाराज कर दिया. उन्होंने पूछा- मंडलों के गठन को कौन रोक रहा है? उनके पास क्या  ऐसा करने के कोइ वैध अधिकार भी हैं? विपक्ष के नेता देवेंद्र फड़णवीस को भी पवार के जवाब पर गुस्सा आ गया. फड़णवीस ने पूछा, क्या आपने 12 विधायकों के लिए विदर्भ और मराठवाड़ा के लाखों लोगों को बंधक बना रखा है? हम अपना अधिकार मांगते हैं. आप से भीख नहीं मांगते. यदि आप नहीं मानते तो आइए लड़ते हैं.

विदर्भ, मराठवाड़ा और शेष महाराष्ट्र को संविधान के अनुच्छेद 371-2 के अनुसार वैधानिक विकास बोर्ड मिले हैं. वह इनका हकदार हैं. नियमों के अनुसार, पिछड़े वर्गों को आबादी के अनुपात में भुगतान किया जाना चाहिए. और राज्यपाल के विवेक पर निर्भर है, देखना है कि ऐसा होता है या नहीं.

हालांकि, 26 साल पहले 1994 में स्थापित किए गए ये बोर्ड हर राज्य सरकार को अतिक्रमण करते दिख रहे थे. इसलिए समय-समय पर उनके किनारे कुंद हो गए. दूसरी ओर धन की कमी के कारण, विधान परिषदों का महत्व समाप्त हो गया है. और आज यह सरकार अब बोर्डों की बहाली के लिए तैयार नहीं है. बोर्डों का कार्यकाल 11 माह पूर्व, 30 अप्रैल 2020 को ही समाप्त हो गया. कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल इनके कार्यकाल का विस्तार करने की मांग कर रहे हैं.

वैधानिक विकास मंडलों के अस्तित्व में नहीं होने के कारण, विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे पिछड़े क्षेत्रों के लिए धन का वितरण बाधित हो रहा है. लेकिन चूंकि पश्चिमी महाराष्ट्र में नेताओं की मानसिकता हमेशा से विदर्भ और मराठवाड़ा विरोधी रहा है. वे इसमें अड़ंगा लगा कर राजनीति चमकाने लग गए हैं. यही कारण है कि यह दोनों विभाग (रीजन) शुरू से ही विकास में पिछड़ते चले गए. सिंचाई और अन्य क्षेत्रों में विकास के लिए बजटीय आवंटन भी पश्चिम महाराष्ट्र के सत्ता में बैठे नेता अपने क्षेत्र के विकास में खर्च करते रहे और इन रीजन्स के विकास के बैकलॉग बढ़ाते ही चले गए.

जब विदर्भ एवं मराठवाड़ा को लोग जगे और पश्चिमी महाराष्ट्र के नेताओं की बदनीयती उजागर कर नाराजगी जताते हुए पृथक विदर्भ राज्य की मांग उठाई तो 26 वर्ष पहले 1994 में तत्कालीन शरद पवार की राज्य की कांग्रेस सरकार ने विदर्भ और मराठवाड़ा के विकास के बैकलॉग दूर करने के उद्देश्य से संविधान के अनुच्छेद 371-2 के अनुसार दोनों रीजन के लिए वैधानिक विकास बोर्डों का गठन किया था. अब राज्यपाल को सबक सिखाने के लिए उन्होंने वैधानिक विकास बोर्डों के कार्यकाल का विस्तार रोकने का मंत्रिमंडल में निर्णय ले लिया है. इसे हद दर्जे का निम्न स्तरीय हथकंडा ही कहा जा सकता है.

भाजपा नेताओं ने तो सदन में वैधानिक विकास मंडलों के मामले में सरकार की कथित बदनीयती पर नाराजगी दिखाई है. लेकिन इससे कुछ भी होने वाला नहीं है. आप लिख लें…! वे लोग मंडलों के विस्तार के लिए कुछ भी नहीं करेंगे..! बिल्कुल नहीं देंगे..! मैं कहता हूं, मंडलों की मांग क्यों करते हो? लेना है तो अलग विदर्भ राज्य क्यों नहीं लेते..? विदर्भ को ऐसे खुदगर्जों से मुक्ति की जरूरत है.

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