खतरनाक होती जा रही हैं राजनीतिक पार्टियां..!

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खतरनाक

आलेख : कल्याण कुमार सिन्हा,
सीएएए और एनआरसी
के पक्ष-विपक्ष में राजधानी दिल्ली सहित देश के कुछ हिस्सों में जो कुछ चल रहा है, वह ठीक नहीं है. यह भयावह है, देश और समाज के लिए बहुत ही यह खतरनाक खेल चल रहा है. इसके दूरगामी परिणामों के बारे में गंभीरता से चिंतन की जरूरत है. ऐसी चिंगारियों को शोला बनाते देखना हमारी नीयती बनती जा रही है.

एक ओर हमारे राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में लिपटा लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन है, तो दूसरी ओर इसी की आड़ लेकर देश का युवा देश के एक हिस्से को काट कर अलग कर दी जाने वाली तजवीजें पेश कर रहा है. उसे गिरफ्तार कर ऐसी प्रवृति को रोकने की कोशिश हुई तो उसके समर्थन में नारे लगने लगे हैं. मुंबई के आजाद मैदान से रविवार को ऐसा ही एक संकल्प नारे की शक्ल में उभरा- “शरजील तेरे सपनों को, मंजिल तक पहुंचाएंगे.”

दूसरी ओर सीएए (संशोधित नागरिकता कानून) के विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ गोली चलाने की तीसरी घटना सामने आईं. रविवार को फिर देर रात जामिया इस्लामिया के गेट नंबर 5 पर स्कूटी सवार दो अज्ञात युवकों ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर फायरिंग कर दी. हालांकि गोली किसी को लगी नहीं, लेकिन इन सब के साथ ही गंभीर सवाल जरूर उठ खड़े हुए हैं.
खतरनाक
सवाल महज यह नहीं है कि हिंसा का सहारा लेकर लोग इस प्रकार प्रदर्शनकार्यों को डराने और धमकाने की ऐसी कोशिशें कैसे कर रहे हैं? या फिर पुलिस वहां लॉ एंड ऑर्डर कायम रखने के लिए क्या कर रही थी या उन्हें रोक क्यों नहीं पाई? सवाल यह है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा ही क्योंकर हो रही हैं. इसे प्रतिक्रियावादी कार्रवाई मानें कि महज विरोध का विरोध? सवाल यह भी है कि शरजील इमाम और उसके समर्थक ऐसे प्रदर्शनों में अपनी पहचान बना कर देश को तोड़ने तक बात तक क्यों पहुंच रहे हैं? कोई ‘आजादी’ के तख्ते लहरा रहा है. उन्हें कौन सी, कैसी और किसकी आजादी चाहिए, इसका पता नहीं. इस ‘आजादी’ की मांग पर कोई खुश हो रहा है तो कोई बौखला रहा है. अलगाववादियों का समर्थन और आतंकवादियों की फांसी की सजा को गलत ठहराया जा रहा है.  

सवाल यह भी उठता है कि आज देश में जिस प्रकार का माहौल बनाता जा रहा है, वह देश के भविष्य को किस ओर ले जा रहा है. इन सब के लिए जिम्मेदार कौन हैं? सरकार या विपक्ष? जाहिर है, इन प्रश्नों के उत्तर में प्रदर्शनकारी और उनके समर्थक सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं, वहीं दूसरी ओर विरोधी और सत्तापक्ष विपक्षी दलों अलगाववादी सोच रखने वालों के सिर पर ठीकरा फोड़ने का काम कर रहे हैं. दोनों पक्ष के लोग एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने का काम पूरी ताकत के साथ कर कर रहे हैं.

राजनीतिक दल के नेताओं के बयान और भाषण जहरीले होते जा रहे है. मंत्री गोली मारने की बात कर रहा है. ‘बोली नहीं तो गोली’ जैसे बोल सत्ता में बैठे जिम्मेदार नेता की फूट रहे हैं. विपक्ष कीचड़ उछाल रहा है तो सत्ता पक्ष के आक्रामक बोल भी मर्यादाएं तोड़ रहे हैं.

इसका परिणाम क्या निकल रहा है, या क्या निकलने वाला है? कुछ निष्पक्ष लोगों की राय यह भी है कि यह रंगमंच दिल्ली चुनावों को लेकर सजा हुआ है. चुनाव खत्म होते ही सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा. शाहीन बाग की महिलाएं अपने घरों में लौट जाएंगी और जामिया एवं देश के अन्य शिक्षा संस्थानों को इस नाटक का रंगमंच बनाने वाले कलाकार भी अगले किसी दौर तक थोड़ा सुस्ता लेंगे. ऐसी बेचैन और भ्रमित कर देने वाली चालें पहले भी चली जाती रही हैं.

वैसे यह बात सही है कि ऐसे आन्दोलनों, प्रदर्शनों और इनके विरोध की कार्रवाइयों से देश टूटने वाला नहीं है. हमारे देश की भावनात्मक संरचना की बुनावट में सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक के साथ ही संवैधानिक पहलुओं की अद्भुत छटाएं जितनी खूबसूरती से मढ़ी हुई हैं, उसे ऐसे झटकों से उधेड़ देना सरल नहीं हो सकता. अगर ऐसा संभव होता तो आजादी की शुरुआती दिनों में ही ऐसे अनेक झटके देने कोशिशों में देश बिखर सकता था. लेकिन ऐसा यदि उस समय नहीं हो पाया तो अब किसी हाल में ऐसा संभव नहीं हो सकता.

लेकिन ऐसी कोशिशें देश की तरक्की को धीमी जरूर करती हैं. यह खतरनाक इस मायने में भी है कि सामाजिक तानेबाने को बदरंग करने की साजिश के साथ धर्म और जाति को जमीन बना कर सियासी खेल शुरू कर दिया जाता है. देश में परस्पर अविश्वास, विद्वेष और नफरत पैदा कर सियासी फायदे उठाने की कोशिशें हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनती जा रही हैं. इसकी निंदा भी होती है, लेकिन हर बार किसी न किसी राज्य और देश के चुनाव को ध्यान में रखकर इन हथकंडों के इस्तेमाल की रणनीति तैयार की जाती है और पहले से ही इन पर अमल शुरू हो जाता है. इसका फायदा राष्ट्रविरोधी शक्तियां भी उठा रही हैं. हालांकि इसके पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आ पाए हैं, लेकिन लोगों को पता है की हमारी राजनीतिक पार्टियां इसमें विदेशी ताकतों की भी मदद लेने में गुरेज नहीं करतीं.

हम गौर करें तो यह देख कर भय सा होता है कि हमारे राजनीतिक दल कितने खतरनाक होते जा रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में विदेशी सायबर तंत्र की मदद लेने के आरोप-प्रत्यारोप हमें देखने को मिले ही हैं. पिछले दिनों हमारी पार्टियां सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस-किस तरह से करती रही हैं, यह भी सामने आ चुका है. गौर करने की बात है कि हमारे राजनीतिक दल किस कदर समाज को तोड़ने के हथकंडे अपना रहे हैं. यह देश को कौन सी दिशा देने में लगे हैं. सत्ता हासिल करने और सत्ता पर कब्जा जमाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने की इनकी यह प्रवृति क्या खतरनाक नहीं है? क्या ये राजनीतिक पार्टियां हमारे लिए खतरा नहीं बनती जा रहीं?

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