जनादेश को लेकर यूं ही उत्साहित नहीं है विपक्ष..!

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जनादेश

हालात 2004 की तरह के ही हैं, जब ध्वस्त हुआ था ‘इंडिया शायनिंग’ और ‘फील गुड़ फैक्टर’

परिणाम पूर्व विश्लेषण : कल्याण कुमार सिन्हा
लोकसभा चुनाव-2019 के जनादेश आने में अब बस अधिक से अधिक 48 घंटों का वक्त है. तमाम एग्जिट पोल एजेंसियां भाजपा को दुबारा सत्तारूढ़ होने का अनुमान व्यक्त कर चुकी हैं. इससे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और ख़ास कर भारतीय जनता पार्टी में जहां भारी उत्साह है. वहीं विपक्ष भी कम उत्साहित नहीं है.

आशंका और संदेह पैदा करने में जुटा विपक्ष
एग्जिट पोल को एक बार फिर विपक्ष के नेता कोरी गपबाजी बता रहे हैं. साथ ही इन्हें सच होने की आशंका में वे एवीएम और वीवीपैट मशीनों के साथ छेड़छाड़ और उन्हें बदले जाने की आशंका भी प्रचारित करने में जुटे हुए हैं. चुनाव आयोग को भी निशाना बना कर वे पूरी चुनाव प्रक्रिया को भी संदेह के घेरे में लाने से बाज नहीं आ रहे.

…लेकिन कुछ संभावनाएं भी हैं
हालांकि यह कोई नई बात नहीं है. हार की आशंका जब पैदा होती है तब राजनीतिक दल इसी तरह की प्रतिक्रिया देते रहे हैं. लेकिन इस बार विपक्ष हार की आशंकाओं के साथ अपनी कामयाबी के प्रति भी जैसा जोश दिखा रहा है, उसके पीछे कुछ भूतकाल के तथ्य भी हैं. जिस कारण विपक्ष को संभावनाएं भी दिखाई दे रही हैं.

परिस्थितियां 2004 जैसी रही हैं 2019 में भी
एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान 2004 के लोकसभा चुनाव के परिणाम विपक्ष के उत्साह का ठोस आधार है. 2019 का यह लोकसभा चुनाव लगभग उसी 2004 की तरह है, जिसमें विपक्ष आज की तरह बिखरा हुआ था और सत्तारूढ़ एनडीए “इंडिया शायनिंग” और “फील गुड फैक्टर” के अनुरूप अपने सफल शासनकाल से जीत के लिए आश्वस्त था. तमाम एग्जिट पोल कुछ 2019 की तरह ही एनडीए की जीत का संकेत दे रहे थे. लेकिन परिणामों ने सब कुछ ध्वस्त कर दिया और विपक्ष में पड़ी कांग्रेस फिर से अपने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के सहयोगियों के साथ वापस सत्ता पर काबिज होने में सफल रही थी.

तो यह 2019 का आम चुनाव, 2004 के आम चुनाव से बहुत मिलता-जुलता है, जब एनडीए सरकार का चमक-दमक भरा “इंडिया शाइनिंग” अभियान और बहुप्रचारित “फील गुड फैक्टर’ धराशायी हो गया था.

…जनादेश एनडीए की बेदकशाली का था
विश्लेषकों ने आश्चर्य के साथ देखा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के करिश्माई नेतृत्व की कलई भी कैसे उतर गई थी. जनादेश एनडीए की सत्ता से बेदखली का आ गया था. पक्ष-विपक्ष की सीटों ने लोकसभा को त्रिशंकु बना दिया था. लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी कांग्रेस ने पहली बार केंद्र में गठबंधन सरकार बनाई थी.

2004 और 2019 में हैं कई समानताएं…
तब मुख्यधारा की मीडिया से जुड़े विश्लेषकों जरा भी अंदेशा नहीं था कि वाजपेयी सरकार जाने वाली है और एक ऐसी महिला के नेतृत्व में कांग्रेस सामने आने वाली है, जिसे ठीक से हिंदी बोलना भी नहीं आता और वही महिला कांग्रेस को गठबंधन सरकार बनाने लायक हालत में ले आएगी. इस बार भी विश्लेषकों मानना है कि देश में एक बार फिर मोदी सरकार बनने जा रही है. ऐसा होगा या नहीं, यह तो नतीजों से स्पष्ट होगा, मगर अभी इतना तो कहा ही जा सकता है कि 2004 और 2019 के आम चुनाव में कई समानताएं हैं.

1999 में तेरहवीं लोकसभा के लिए आम चुनाव सितंबर-अक्टूबर के दौरान हुए थे. इस लिहाज से 14वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव 2004 में सितंबर-अक्टूबर में होने थे, लेकिन भाजपा और एनडीए के रणनीतिकारों ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को निर्धारित समय से पांच महीने पहले ही चुनाव कराने की सलाह दे डाली थी.

हालात कम बेहतर नहीं थे एनडीए के लिए 2004 के
वाजपेयी को समझाया गया था कि ‘फील गुड फैक्टर’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ के प्रचार अभियान की मदद से एनडीए सत्ता विरोधी लहर को बेअसर कर देगा और स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लेगा. इस सोच का आधार यह था कि एनडीए शासन के दौरान अर्थव्यवस्था मे लगातार वृद्धि दिखाई दी थी. भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार भी बेहतर हालत में था. उसमें 100 अरब डॉलर से अधिक राशि जमा थी, यह उस समय दुनिया मे सातवां सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार था और भारत के लिए एक रिकॉर्ड भी.

सेवा क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में नौकरियां पैदा हुई थीं. इसी सोच के बूते समय से पूर्व चुनाव कराने की घोषणा कर दी गई, 20 अप्रैल से 10 मई 2004 के बीच 4 चरणों में लोकसभा के लिए मतदान हुआ.

टकराव भी वैसा ही था…
2004 आम चुनाव के दौरान दो व्यक्तित्वों (वाजपेयी और सोनिया गांधी) का टकराव अधिक देखा गया, ठीक वैसा ही- जैसा कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच रहा. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए ने उस चुनाव में अपनी सरकार के कामकाज को तो लोगों के सामने पेश किया.

विदेशी मूल और नागरिकता…
लेकिन उससे भी ज्यादा जोर-शोर से उसने सोनिया गांधी के विदेशी मूल को अपने चुनावी अभियान का मुद्दा बनाया. ठीक उसी तरह जैसे इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी ने पूरे नेहरू-गांधी परिवार को अपने निशाने पर रखा. यहां तक कि चुनाव के बीच बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी के माध्यम से राहुल गांधी की नागरिकता का मुद्दा दोबारा उछालने की कोशिश की गई, जिसे सुप्रीम कोर्ट कई साल पहले निबटा चुकी थी.

2004 में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सूखे से निबटने में सरकार की नाकामी, किसानों की आत्महत्या, महंगाई आदि के साथ-साथ 2002 के गुजरात के नरसंहार को एनडीए के सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाया था. इस बार विपक्ष की ओर से नोटबंदी और जीएसटी की विफलता, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, राफेल विमान सौदा, सामाजिक तनाव, संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरा गया.

तब भी विपक्ष एकजुट नहीं था…
आज की तरह उस समय भी न तो विपक्ष एकजुट था और न ही कोई तीसरा ठोस विकल्प मौजूद था. अधिकांश क्षेत्रीय दल तब भी भाजपा के साथ एनडीए के कुनबे में शामिल थे. हालांकि करुणानिधि की डीएमके और रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के मुद्दे पर एनडीए से अलग हो चुकी थी.

दूसरी ओर 2019 की तरह ही कांग्रेस की अगुवाई में भी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी मोर्चा बनाने की कोशिश तो हुई थी, लेकिन यह कोशिश परवान नहीं चढ़ पाई थी. हालांकि कुछ राज्यों में स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच चुनावी तालमेल हो गया था.

2004 और 2019 के इन दो लोकसभा चुनावों की परिस्थितियों और माहौल की समानता के कारण विश्लेषकों में भी संभ्रम बना हुआ है. हालांकि एनडीए समर्थकों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यों को लेकर जरूरत से ज्यादा ही एनडीए की जीत का भरोसा है. लेकिन दूसरी ओर आशंकाओं के बादल भी घुमड़ रहे हैं.

48 घंटे बचे हैं जनादेश आने में
लोकसभा चुनाव- 2019 के लिए पिछले 11 अप्रैल से शुरू हुए मतदान की सर्वाधिक सात चरणों की प्रक्रिया पिछले 19 अप्रैल को समाप्त हो गई है. अब कल सुबह 7 बजे से देश भर में मतगणना के प्रक्रिया भी आरंभ हो जाएगी. संभवतः अगले 48 घंटों में जनादेश भी सामने आ जाएंगे. अब देखना है की मतदाताओं ने क्या फैसला सुनाया है. पीएम नरेंद्र मोदी का नेतृत्व उन्हें भाया है अथवा उन्होंने 2004 दुहराया है.

-कल्याण कुमार सिन्हा

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