भाषा नीति और स्थानीय नीति के भंवर में फंसा झारखंड

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भाषा नीति
झारखंड के नक्शे में स्व. कार्तिक उरांव, स्व. एन.इ. होरो स्व. बागुन सुम्ब्रई और नीचे स्व. हनुमान प्रसाद सरावगी.

*कल्याण कुमार सिन्हा-
चक्रव्यूह : स्थानीय नीति (Domicile Policy) और क्षेत्रीय भाषा नीति पर विवाद खड़े कर सत्ता में आई झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार दो वर्षों बाद भी किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाई है. ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति कर, राज्य में टकराव के हालात पैदा कर दिए गए हैं.  

क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से भोजपुरी, मगही, अंगिका, बांग्ला और ओड़िया आदि भाषाओं को बाहरी भाषा बता कर और स्थानीय नीति में 1932 के खतियान के भू-दस्तावेजों के आधार पर झारखंड की नागरिकता तय करने की मंशा राज्य को एक दिशाहीन मार्ग पर ले जाने जैसा है. आदिवासी संगठनों और सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा एवं आजसू की मांग है कि आदिवासी भाषाएं- संथाली, मुंडा, हो, खड़िया, कुड़ुख एवं मूलवासियों की भाषाएं- कुरमाली, खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और उर्दू को ही क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्य किया जाए. हालांकि, उर्दू को क्षेत्रीय भाषा नहीं, द्वितीय राजभाषा लालू राज में बनाया गया था. यह मांग सीधे तौर पर राज्य में सामाजिक सौहार्द के साथ खिलवाड़ है. आज जिन भाषाओं को बाहरी बता कर उन्हें अछूत करार देने खेल खेला जा रहा है, कल इन भाषा के बोलने वालों के साथ आप क्या करना चाहेंगे? उन्हें भी बाहरी बता कर क्या झारखंड से निकाल-बाहर करेंगे?

भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, जो लोगों, समुदाय और समाज को जोड़ने का काम करता है. लेकिन, आश्चर्य है, भाषा को झारखंड राज्य के लोगों को तोड़ने का हथियार बनाया जा रहा है. सरकार में बैठे लोग भी झारखंड की जनता की भावनाओं से खेलने में जुटे हुए हैं. अपनी स्थानीय नीति और क्षेत्रीय भाषा के नाम पर राज्य के एक वर्ग की भाषा को बाहरी बता कर उन्हें न सिर्फ सरकारी नौकरियों से, बल्कि शासन की योजनाओं का लाभ उठाने से भी वंचित करने का यह षड्यंत्र है. इसे एक घृणित कुचेष्टा ही कही जाएगी.

झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) और ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) संगठन तो झारखंड अलग राज्य की मांग से जुड़ने वाले बाद के ही संगठन हैं. झारखंड के लिए आजादी  समय से ही संघर्ष करने वाली वास्तविक राजनीतिक पार्टी तो एन.इ. होरो की झारखंड पार्टी थी. बाद में झारखंड पार्टी से ही अलग हुई बागुन सुम्ब्रुई की हूल झारखंड पार्टी भी अलग राज्य की मांग के लिए संघर्षरत रही.

झारखंड मुक्ति मोर्चा का जब 1970 के दशक में जन्म हुआ, तब वह तो धनबाद और गिरिडीह जिलों में आदिवासी – गैर आदिवासी के खेल में मगन थी. वह तो कांग्रेस पार्टी थी, जो उस वक्त केंद्र और बिहार दोनों में सत्तारूढ़ थी और उसी ने झारखंड में होरो की झारखंड पार्टी के प्रभाव को खत्म करने के उद्देश्य से जेएमएम को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में आगे बढ़ाया और बाद के चुनाव में इसके साथ गठजोड़ कर झारखंड क्षेत्र में अपनी गिरती साख बचाने का इसे माध्यम बनाया था. उस दौरान झारखंड पार्टी को कमजोर करने के लिए और क्या-क्या किए गए, यह एक अलग ही विषय है. इसकी चर्चा फिलहाल आवश्यक नहीं है.

आज स्थानीय नीति में 1932 के खतियान को आधार बनाने और बाहरी भाषा के विरुद्ध आंदोलन खड़ी करने में पूर्व कांग्रेस नेत्री गीताश्री उरांव पूरी मुखरता से आगे चलने की कोशिश कर रही हैं. राज्य की पूर्व मंत्री रह चुकीं गीताश्री जी को इतना तो पता है कि उनके पिता स्व. कार्तिक उरांव झारखंड के बहुत बड़े और सम्मानित आदिवासी नेता थे. कांग्रेस के फायरब्रांड नेता माने जाने वाले स्व. कार्तिक उरांव 1980 के दशक में शुरू हुए झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेताओं के साथ थे. उन्हें यह भी पता होगा को स्व. कार्तिक उरांव जी को झारखंड आंदोलन से अपने कदम, कांग्रेस की नाराजगी के कारण पीछे खींच लेना पड़ा था. बाद में उन्हें केंद्र में मंत्री बना दिया गया था.

उस दौरान अलग झारखंड आंदोलन के लिए कार्तिक उरांव, एन.इ. होरो और बागुन सुम्ब्रुई जैसे दिग्गज आदिवासी नेताओं का एक साथ मिल-बैठ कर चर्चा करना बहुत बड़ी खबर थी. स्व. कार्तिक उरांव के अलग हो जाने से आंदोलन को धक्का तो जरूर लगा था, लेकिन बहुत फर्क नहीं पड़ा था. इसे देखते हुए कांग्रेस ने जेएमएम को आगे बढ़ाया. कांग्रेस के इशारे पर ही असम की आसू की तर्ज पर आदिवासी विद्यार्थियों के संगठन आजसू को अस्तित्व में लाया गया. उन्हें रांची और अन्य जिलों में प्रदर्शन-आंदोलन करने के लिए संसाधन की व्यवस्था कराई गई.

इस दौर में दैनिक ‘आज’ से जुड़े एक पत्रकार के नाते मेरी तीनों दिग्गज नेताओं से मुलाकातें होती रहीं. उस समय स्थानीय नीति या क्षेत्रीय भाषा जैसा स्वाभाविक रूप से कोई मुद्दा नहीं था. लेकिन एक बड़ा प्रश्न झारखंड के गई आदिवासियों के लिए बहुत बड़ा था. वह था छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (सीएनटी). इसके प्रावधानों के कारण राज्य के गैर आदिवासी किसी आदिवासी की जमीन घर अथवा उद्योग-व्यवसाय के लिए नहीं खरीद सकते हैं. ऐसे में यदि झारखंड राज्य बना तो क्या इसमें कोई बदलाव आएगा?

इस प्रश्न पर मेरी पहली चर्चा हूल झारखंड के नेता स्व. बागुन सुम्ब्रुई जी से अपर बाजार स्थित समाजसेवी स्व. हनुमान प्रसाद सरावगी जी के निवास पर उनके समक्ष ही हुई थी. झारखंड आंदोलन की भावी रूपरेखा के सन्दर्भ में चर्चा पर उन्होंने बताया कि आंदोलन में गैर आदिवासियों की भी बड़ी भूमिका है. हम  सक्रिय सहयोग लेंगे. इसपर मैंने सुम्ब्रुई जी से सीधा सवाल किया था- “गैर आदिवासी झारखंड राज्य आंदोलन का समर्थन क्यों करें? सीएनटी एक्ट ने तो उन्हें आगे बढ़ने के मार्ग बंद कर दिए हैं.”

इसके साथ मैंने उन्हें इस ओर भी ध्यान दिलाया कि कैसे सीएनटी एक्ट कैसे झारखंड के आदिवासी समाज के लिए ही शोषण का जरिया बन गया है और कैसे आज के पढ़े-लिखे आदिवासी युवाओं के विकास में भी बाधक है. उस वक्त आदिवासी युवकों द्वारा लघु उद्योग और व्यवसाय के लिए उद्योग विभाग के माध्यम से बैंकों में ऋण के लिए आवेदन किया था. लेकिन बैंकों ने उनके आवेदन खारिज कर दिए थे. क्योंकि ऋण के लिए उन्हें अपनी जमीन मॉर्गेज करनी थी, जो बैंक कर नहीं सकते थे.

भ्रष्ट आदिवासी अफसर और गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासी महिलाओं को रखैल बना कर उनके नाम पर आदिवासी जमीन पर कब्जा करने की बात भी सामने आई. दो-तीन इसके कुछ उदाहरण भी मैंने उनके समक्ष प्रस्तुत किए. सरावगी जी ने भी कई दृष्टांत गिनाए.

यह भी चर्चा निकली कि कैसे भ्रष्ट आदिवासी नेता अपने क्षेत्र की किसी प्रस्तावित बांध अथवा जलाशय योजना के लिए सरकार द्वारा भूमि अधिगृहीत करने से पूर्व आदिवासियों को उनकी जमीन छीन लिए जाने का डर दिखा कर औने-पौने दाम में उनकी जमीन हड़पते हैं और फिर आन्दोलनों का सहारा लेकर उन्हीं जमीन का मुआवजा दर बढ़ावा कर परियोजना के लिए उन्हीं जमीन सरकार को बेच, भारी मुनाफा कमा रहे हैं.

सुम्ब्रुई जी ने भी माना था कि उन्हें भी इन सब की जानकारी है. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि झारखंड अलग राज्य बना तो हम सीएनटी एक्ट में जरूरी बदलाव लाएंगे. इसी मुद्दे पर और इन्हीं उदाहरणों के साथ मैंने कार्तिक उरांव जी और एन.इ. होरो जी से भी अलग-अलग बातें की थी. उन दोनों नेताओं ने माना था कि सीएनटी एक्ट का फायदा आदिवासी जमीन हथियाने के लिए किया जा रहा है. उनका भी मत था कि झारखंड राज्य बनने पर हम आदिवासियों के हित में आवश्यक कदम उठाएंगे. इन तीनों दिग्गजों ने यह भी स्पष्ट आश्वासन दिया था कि राज्य के सभी नागरिकों के हितों का ध्यान रखा जाएगा. उन तीनों आदिवासी नेताओं से बातचीत की खबर और लेख दैनिक ‘आज’ के रांची संस्करण में प्रकाशित भी हुए थे.

दुर्भाग्य की बात है कि इन तीनों दिग्गज झारखंडी नेताओं सहित उस वक्त के अनेक सेंसिबल नेता अब इस दुनिया में नहीं हैं. रह गए हैं तो केवल वे, जो हुड़दंग के सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ पाए और वे, जो इसी हुड़दंग के सहारे सत्ता के गलियारे में अपनी पैठ बनाए रखने को बेताब हैं.

ऐसी समस्या अकेले केवल झारखंड की नहीं है. देश के विकासशील राज्य हों अथवा पिछड़े राज्य, सभी राज्यों में ओछी राजनीति करने और असंवैधानिक मांगों को उछालने और राज्य की जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने का चलन ही बन गया है. ऐसे नेताओं को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि उनके ऐसी ओछी मांग राज्य का सामाजिक सौहार्द बिगाड़ेगा अथवा कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ेगी. सिर्फ सस्ती लोकप्रियता पाने की होड़ है.

झारखंड राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने बाबूराम मरांडी की स्थानीय नीति का क्या हश्र हुआ, उससे सभी वाकिफ हैं. इसके बाद रघुवर दास मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने भी उसमें कुछ हेरफेर कर नई स्थानीय नीति बनाई. उसमें क्षेत्रीय भाषा को भी सरकारी नियुक्तियों के आधार पर क्षेत्रीय भाषाओं के साथ अन्य भाषाओं के लिए 1985 को कट ऑफ डेट माना गया था.रघुवर दास की इस नीति का भी भारी विरोध हुआ और उसी विरोध के सहारे जेएमएम गठबंधन सरकार की मुखिया बन सत्ता में है.

जेएमएम की सरकार ने पिछली सरकार की नीति को अमान्य तो कर दिया, लेकिन जिस 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनाने का सब्जबाग लोगों को दिखाया गया था, आज वह भारी पड़ रहा है. भाषा के मामले में स्थिति और भी बिगड़ी है. पिछले दो वर्षों से अधिक समय बीत गए, जेएमएम सरकार स्थानीय नीति और भाषा नीति पर कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है. उसने पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ अथवा अन्य राज्यों की नीतियों से भी कुछ सीख लेने की जरूरत नहीं समझी.

राज्य के स्कूलों में 26 हजार से अधिक शिक्षकों के पद भरे नहीं जा सके हैं. पुरानी सरकार की नीतियों के आधार पर 18 हजार शिक्षकों की नियुक्ति झारखंड हाईकोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया को असंवैधानिक बता कर रद्द कर दिया था. उसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी पर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आ पाया है. इससे स्पष्ट है कि नीतिगत फैसला संवैधानिक पक्ष अथवा राज्य की जनता के व्यापक हित को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि अपने एजेंडे को अंजाम देने के लिए किया जा रहा है. यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. इससे झारखंड राज्य की न केवल छवि धूमिल होती है, यह राज्य सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए भी घातक है.
भाषा
-कल्याण कुमार सिन्हा.

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