आठ महीने टीवी दर्शकों की पॉकेटमारी कर ‘ट्राई चला अब हज करने’

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ट्राई

विदर्भआपला न्यूज,
नागपुर :
टीवी दर्शकों की पॉकेटमारी के बाद अब टेलिकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ब्रॉडकास्ट टैरिफ सिस्टम की सुधार में जुटा है. आठ महीने पहले लोकसभा चुनाव के वक्त, जब ट्राई ने लोगों को “जितने चैनल देखो, उतने के ही पैसे दो” वाला सब्जबाग दिखाना शुरू किया था, तभी लोगों को अंदाजा हो गया था कि ट्राई ब्रॉडकास्टर्स, डीटीएच आपरेटरों और केबल आपरेटरों के साथ मिल कर आम जनता की जेबें काट कर चुनावी चन्दा जुटाने का खेल खेल रहा है. और बाद में फिर सारा टैरिफ सामान्य कर वाहवाही लूटेगा. लोगों की आशंका आज सच होने जा रही है. ट्राई अब चैनलों की कीमत घटाने के लिए 8 महीने पहले लागू किए गए ब्रॉडकास्ट टैरिफ सिस्टम की समीक्षा शुरू कर रहा है.

लोकप्रिय चैनलों की कीमत 19 रुपए रखना अन्यायपूर्ण
नागपुर के सपन जगमोहन पूछते हैं- “क्या ट्राई को यह बात तब समझ में नहीं आई थी कि लोकप्रिय चैनलों की कीमत 19 रुपए रखना अन्यायपूर्ण है? और क्या यह भी पता नहीं था कि लोकप्रिय चैनल वाले अपने दूसरे सड़े हुए चैनलों को अपने बुके में शामिल क्र रहे हैं? “जितने चैनल देखें, उतने की ही कीमत चुकाएं” की ट्राई की “लफ्फाजी” भी टीवी दर्शकों को खूब समझ में आ रही थी.”

ट्राई की इस भ्रष्ट कारगुजारी की जांच हो
उनकी तो मांग है कि “ट्राई की इस भ्रष्ट कारगुजारी” की निष्पक्ष जांच किसी कैग जैसी संस्था से अथवा सुप्रीम कोर्ट के जज से करवाई जाए. इन आठ महीनों में ट्राई ने आम टीवी दर्शकों की जेबें कटवा कर किस-किस को फ़ायदा पहुंचाया है, यह जानने का हक़ हम सभी टीवी दर्शकों का है.

हालांकि यह माना जा रहा है की समीक्षा का लक्ष्य चैनलों के चुनाव को आसान बनाने के साथ कीमत घटाना भी है. बताया जा रहा है कि ट्राई (रेग्युलेटर) ने रेवेन्यू बढ़ाने और कंज्यूमर्स के चॉइस को खत्म करने के लिए नए नियमों के मिसयूज को लेकर ब्रॉडकास्टर्स और केबल ऑपरेटर्स को फटकार भी लगाई है.

जारी किया विस्तृत कंसल्टेशन पेपर, चर्चा होगी 30 सितंबर को
ट्राई ने पिछले शुक्रवार को एक विस्तृत कंसल्टेशन पेपर जारी किया, जिसमें 30 सवाल पूछे गए हैं. इसमें पूछा गया है कि क्या चैनल बुके को अनुमति दी जाए? क्या उपभोक्ताओं को दिए जाने वाले बुके के भीतर छूट पर फिर से विचार किया जाना चाहिए? और क्या बुके में चैनल्स की सीलिंग प्राइस (अभी 19 रुपए) की समीक्षा की जानी चाहिए? कंसल्टेशन पेपर पर प्रतिक्रिया 16 सितंबर तक देनी है और उनपर बहस 30 सितंबर तक हो सकती है.

गौरतलब है कि ट्राई ने केबल और डीटीएच ग्राहकों के लिए 8 महीने पहले नए सिस्टम की शुरुआत की थी. इसके तहत कहा गया था कि ग्राहक अब केवल उन्हीं चैनलों के पैसे देंगे, जिन्हें वे देखते हैं और इससे उनका बिल कम हो जाएगा. इसमें चैनलों की कीमत 0 से लेकर अधिकतम 19 रुपए तक है. इसके बाद अनेक ग्राहकों ने शिकायत की थी कि उनका बिल घटने की बजाय बढ़ गया है.

फटकार लगाने का नाटक
बुके के बाहर पॉप्युलर अ-ला-कार्टे (अलग-अलग) चैनलों को महंगा करके उपभोक्ताओं को निचोड़ने के प्रयास को लेकर ट्राई ने डिस्ट्रीब्यूशन प्लैटफॉर्म ऑपरेटर्स (केबल ऑपरेटर्स और डीटीएच प्रोवाइडर्स) को फटकार लगाने का नाटक करता रहा. ट्राई ने यह भी बताने की कोशिश की है कि चैनलों की कीमतों को दिसंबर 2018 में लागू नए सिस्टम के बाद बदल दिया गया है. लेकिन इसके बाद भी दर्शकों को ट्राई ने यह बताने की जुर्रत नहीं समझी कि बदले हुए कीमत क्या हैं.

ट्राई के सचिव एस.के. गुप्ता आज मान रहे हैं कि ‘ब्रॉडकास्टर्स और डीपीओज़ बड़ी संख्या में बुके ऑफर कर रहे हैं, जो उपभोक्ताओं को दुविधा में डालती है और वे सही चुनाव नहीं कर पाते हैं. वे यह भी मान रहे हैं कि ब्रॉडकास्टर्स द्वारा बुके पर अधिक डिस्काउंट ने उपभोक्ताओं के विकल्प को सीमित कर दिया है और यह यह लचीलेपन का स्पष्ट दुरुपयोग है. इन डिस्काउंट वाले बुके में कुछ लोकप्रिय चैनल्स के साथ कई ऐसे चैनल होते हैं, जिन्हें बहुत कम लोग देखना चाहते हैं, इस तरह वे ओवरऑल व्यूवरशिप नंबर और रेवेन्यू बढ़ाते हैं.

ट्राई को अब लग रहा है कि, ‘ब्रॉडकास्टर्स, उपभोक्ता डिमांड के आधार पर बुके नहीं बना रहे हैं. इसके पीछे मकसद शुद्ध रूप से अधिक रेवेन्यू अर्जित करना है. इनमें उपभोक्ताओं की पसंद का ध्यान नहीं रखा जा रहा है.’ ट्राई अब घड़ियाली आंसू बहाते हुए कह रहा है कि ग्राहकों के पास “चैनल चुनने और केवल उन्हीं का पैसा देने का अधिकार सुरक्षित” है.

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