कर्नाटक : तीसरे नंबर की जेडीएस अपना मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में

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बाप-बेटा : एच.डी. देवेगौड़ा और एच.डी. कुमारस्वामी.

बाप की तरह 22 साल बाद बेटे को भी मिल रही सस्ते में सत्ता, तो क्या दूर रह गई भाजपा

बेंगलुरु : इतिहास एक बार फिर 22 साल बाद खुद को दोहरा रहा है, ऐसी परिस्थितियों में पिता एच.डी. देवेगौड़ा बने के प्रधानमंत्री, अब उन्हीं परिस्थितियों ने बेटे एच.डी. कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवाने का काम किया है. कर्नाटक में चुनाव परिणाम आने के साथ ही सत्ता की गाड़ी रिवर्स गेयर में आ गई, जहां सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली भाजपा सत्ता से दूर रह गई, वहीं सबसे कम सीट पाने वाली जेडीएस अपना मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में है.

मात्र 37 सीटों के बूते मुख्यमंत्री बनेंगे कुमारस्वामी
कांग्रेस ने जेडीएस के अध्यक्ष जिन एच.डी. कुमारस्वामी को मात्र 37 सीटों के बाद भी अपने 78 विधायकों का समर्थन कर मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान किया है. कभी उनके पिता भी मात्र 46 सांसदों के बूते देश के प्रधानमंत्री बन बैठे थे.

कभी ऐसे ही चमकी थी देवगौड़ा की किस्मत भी
अब बस इंतजार है तो राज्यपाल के बुलावे का, जिनसे कुमारस्वामी मिलने का वक्त मांग चुके हैं. कुमारस्वामी अगर मुख्यमंत्री बनते हैं तो राजनीति का एक ऐसा संयोग भी सामने आएगा, जो आज से पहले शायद ही देखा गया हो. कुमारस्वामी से पहले उनके पिता एच.डी. देवगौड़ा की किस्मत भी कभी अचानक ऐसे ही चमक उठी थी, जब घर बैठे-बैठे ही देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी उनकी चौखट तक आ पहुंची थी. तब भी सामने भाजपा ही थी और आज भी भाजपा ही है, तब भी समर्थन में कांग्रेस थी और आज भी वही है.

सत्ता की कुर्सी घर बैठे
किस्मत का आलम कुछ ऐसा है कि सत्ता की कुर्सी घर बैठे इन बाप-बेटे की चौखट चूमती रही है. बता दें कि कर्नाटक चुनावों का परिणाम आने से पूर्व जेडीएस पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमार स्वामी ने दावा किया था कि वोकिंगमेकर नहीं किंग बनेंगे. परिणाम सामने आए तो उनकी बात जैसे सच होती भी दिख रही है.

ऐसे पीएम बन गए थे देवगौड़ा
1996 की लोकसभा में कांग्रेस 140 सीटों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी थी, लेकिन बहुमत का जुगाड़ उसके पास भी दूर-दूर तक नहीं था, उसके बाद नंबर था राष्ट्रीय मोर्चे का, जिसके पास कुल 79 सीटें थीं. इस मोर्चे के मुखिया यानि जनता दल के एचडी देवगौडा कुछ दिन पहले ही विधानसभा चुनाव जीतकर कर्नाटक में मजे से अपनी सरकार चला रहे थे. पार्टी के पास लोकसभा के कुल 46 सांसद थे. भाजपा को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस ने बड़ा दांव चला और राष्ट्रीय मोर्चा को बाहर से सम‌र्थन देते हुए सरकार बनाने का ऑफर दिया. प्रस्ताव बड़ा था, ऐसे में देवगौड़ा तुरंत तैयार हो गए और अपने 46, समाजवादी पार्टी के 17, तेलगुदेशम पार्टी के 16 विधायकों के साथ सरकार बनाने का दावा कर दिया. इसके बाद तो कुछ और अन्य पार्टियां भी उनके साथ आ गई, जिसके बाद बना ‘संयुक्त मोर्चा’. जिसमें लेफ्ट के 52, तमिल मनिला कांग्रेस के 20, द्रमुक के 17 और असम गण परिषद के साथ ही कई अन्य छोटी पार्टियों के 19 सांसदों का साथ भी मिल गया.

22 साल बाद एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है इतिहास
इस तरह संयुक्त मोर्चा के कुल सांसदों की संख्या पहुंच गई 192 और कांग्रेस के 140 विधायकों का समर्थन उनके पास पहले से ही था. कुल 332 सांसदों के साथ देवगौड़ा ने देश के प्रधानमंत्री की कमान संभाल ली. हालांकि उनका यह सफर ज्यादा लंबा नहीं चला और सत्ता संघर्ष के बीच कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने देवगौड़ा से समर्थन वापिस ले लिया. नतीजतन 332 दिनों के बाद ही उनकी प्रधानमंत्री के पद वाली पारी का अंत हो गया. 22 साल बाद इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है,सारे किरदार भी वैसे ही हैं और परिस्थितियां भी वही, बस देवगौड़ा की जगह उनके बेटे कुमारस्वामी सामने हैं.

येदियुरप्पा ने भी हार नहीं मानी है
उधर भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी.एस. येदियुरप्पा ने अभी हार नहीं मानी है. उन्हें पूरा भरोसा है की वे राज्य में भाजपा की सरकार बना लेंगे. उन्होंने कहा है कि बुधवार को भाजपा विधायक दल की बैठक में उन्हें नेता चुना जाएगा. इसके बाद वह विधायकों के साथ राज्यपाल से मिल सरकार बनाने की अनुमति की मांग करेंगे. अब देखना है कि राजयपाल कौन सा मार्ग अपनाते हैं.

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